टेबल लैंप जला रहता है कोना एक जगा रहता है दो लोगों के भी घर में मुझ से कोई न कोई ख़फ़ा रहता है हर दस्तक बेकार हुई है क्या इस घर में ख़ुदा रहता है थमता नहीं है दर्द का ट्रैफिक मेरा ज़ख़्म हरा रहता है हादसे भी होते रहते हैं मेरा दिल भी लगा रहता है
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तड़पता ही नहीं इतना अगर शाइ'र नहीं होता तड़पना क्या? मैं ख़ुश रहता अगर शाइ'र नहीं होता कभी सुनता नहीं इस को ज़माना ग़ौर से यारों अहम किरदार क़िस्से का अगर शाइ'र नहीं होता मुझे सबकी मोहब्बत ने बनाया एक ऑटोग्राफ़ मैं सिग्नेचर ही रह जाता अगर शाइ'र नहीं होता ख़ुदा की रहमतों से मैं मेरी ग़ज़लों का मालिक हूँ कहीं नौकर बना होता अगर शाइ'र नहीं होता मुझे भी घेर लेती फिर किसी दिन मज़हबी बातें सियासत में चला जाता अगर शाइ'र नहीं होता 'नवा', 'ग़ाफ़िल', 'चराग़', 'आशू', 'वरुन आनन्द' और 'ताबिश' 'तनोज' इनसे नहीं मिलता अगर शाइ'र नहीं होता
Tanoj Dadhich
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मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल तू नई सुब्ह के सूरज की है उजली सी किरन मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल अपनी ख़ुशियाँ मिरे आलाम से मंसूब न कर मुझ से मत माँग मिरा नाम मिरे साथ न चल तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह देख ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मिरे साथ न चल मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा 'शकील' टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल
Shakeel Azmi
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समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरी यादों की ख़ुश्बू खिड़कियों में रक़्स करती है तिरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर ज्यूँँ ही क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं हर इक मुफ़्लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं तिरे कूचे से अब मेरा तअ'ल्लुक़ वाजिबी सा है मगर जब भी गुज़रता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर 'वसी' मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
Wasi Shah
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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना
Zubair Ali Tabish
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ये बार-ए-ग़म भी उठाया नहीं बहुत दिन से कि उस ने हम को रुलाया नहीं बहुत दिन से चलो कि ख़ाक उड़ाएँ चलो शराब पिएँ किसी का हिज्र मनाया नहीं बहुत दिन से ये कैफ़ियत है मेरी जान अब तुझे खो कर कि हम ने ख़ुद को भी पाया नहीं बहुत दिन से हर एक शख़्स यहाँ महव-ए-ख़्वाब लगता है किसी ने हम को जगाया नहीं बहुत दिन से ये ख़ौफ़ है कि रगों में लहू न जम जाए तुम्हें गले से लगाया नहीं बहुत दिन से
Azhar Iqbal
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यूँ मैं दिल का ख़याल रखता हूँ इस में तेरा ख़याल रखता हूँ तेरी मर्ज़ी का भी ख़याल नहीं तेरा इतना ख़याल रखता हूँ और मर जाता है वही बीमार जिस का अच्छा ख़याल रखता हूँ तुझ को फिर भी ख़राब होना है फिर भी तेरा ख़याल रखता हूँ
Swapnil Tiwari
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वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ हमारे गाल पे इक किस से हिज्र ख़त्म हुआ फिर एक आग लगी जिस में वस्ल की थी चमक ख़याल-ए-यार की माचिस से हिज्र ख़त्म हुआ था बज़्म-ए-दुनिया में मुश्किल हमारा मिलना सो निकल के आ गए मज्लिस से हिज्र ख़त्म हुआ भली शराब है ये वस्ल नाम है उस का बस एक जाम पिया जिस से हिज्र ख़त्म हुआ तुम्हारे हिज्र में सौ वस्ल से गुज़र कर भी ये सोचता हूँ कहाँ किस से हिज्र ख़त्म हुआ
Swapnil Tiwari
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मज़ाक़ सहना नहीं है हँसी नहीं करनी उदास रहने में कोई कमी नहीं करनी ये ज़िंदगी जो पुकारे तो शक सा होता है कहीं अभी तो मुझे ख़ुद-कुशी नहीं करनी गुनाह-ए-इश्क़ रिहा होते ही करेंगे फिर गवाह बनना नहीं मुख़बिरी नहीं करनी बड़े ही ग़ुस्से में ये कह के उस ने वस्ल किया मुझे तो तुम से कोई बात ही नहीं करनी
Swapnil Tiwari
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नींद से आ कर बैठा है ख़्वाब मिरे घर बैठा है अक्स मिरा आईने में ले कर पत्थर बैठा है पलकें झुकी हैं सहरा की जिस पे समुंदर बैठा है एक बगूला यादों का खा कर चक्कर बैठा है उस की नींदों पर इक ख़्वाब तितली बन कर बैठा है रात की टेबल बुक कर के चाँद डिनर पर बैठा है अँधियारा ख़ामोशी की ओढ़ के चादर बैठा है 'आतिश' धूप गई कब की घर में क्यूँँकर बैठा है
Swapnil Tiwari
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धूप के भीतर छुप कर निकली तारीकी सायों भर निकली रात गिरी थी इक गड्ढे में शाम का हाथ पकड़ कर निकली रोया उस से मिल कर रोया चाहत भेस बदल कर निकली फूल तो फूलों सा होना था तितली कैसी पत्थर निकली सूत हैं घर के हर कोने में मकड़ी पूरी बुन कर निकली ताज़ा-दम होने को उदासी ले कर ग़म का शावर निकली जाँ निकली उस के पहलू में वो ही मेरा मगहर निकली हिज्र की शब से घबराते थे यार यही शब बेहतर निकली जब भी चोर मिरे घर आए एक हँसी ही ज़ेवर निकली 'आतिश' कुंदन रूह मिली है उम्र की आग में जल कर निकली
Swapnil Tiwari
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