ghazalKuch Alfaaz

वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए रात दिन सूरत को देखा कीजिए चाँदनी रातों में इक इक फूल को बे-ख़ुदी कहती है सज्दा कीजिए जो तमन्ना बर न आए उम्र भर उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर चाँदनी रातों में रोया कीजिए पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो बे-ख़ुदी तू ही बता क्या कीजिए हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे क्यूँँ किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए आप ही ने दर्द-ए-दिल बख़्शा हमें आप ही इस का मुदावा कीजिए कहते हैं 'अख़्तर' वो सुन कर मेरे शे'र इस तरह हम को न रुस्वा कीजिए

Related Ghazal

सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

140 likes

चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

105 likes

ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

102 likes

तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

81 likes

मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

73 likes

More from Akhtar Shirani

ग़म-ए-ज़माना नहीं इक अज़ाब है साक़ी शराब ला मिरी हालत ख़राब है साक़ी शबाब के लिए तौबा अज़ाब है साक़ी शराब ला मुझे पास-ए-शबाब है साक़ी उठा पियाला कि गुलशन पे फिर बरसने लगी वो मय कि जिस का क़दह माहताब है साक़ी निकाल पर्दा-ए-मीना से दुख़्तर-ए-रज़ को घटा में किस लिए ये माहताब है साक़ी तू वाइ'ज़ों की न सुन मय-कशों की ख़िदमत कर गुनह सवाब की ख़ातिर सवाब है साक़ी ज़माने-भर के ग़मों को है दावत-ए-ग़र्रा कि एक जाम में सब का जवाब है साक़ी कलाम जिस का है मे'राज 'हाफ़िज़'-ओ-'ख़य्याम' यही वो 'अख़्तर'-ए-ख़ाना-ख़राब है साक़ी

Akhtar Shirani

0 likes

ला पिला साक़ी शराब-ए-अर्ग़वानी फिर कहाँ ज़िंदगानी फिर कहाँ नादाँ जवानी फिर कहाँ दो घड़ी मिल बैठने को भी ग़नीमत जानिए उम्र फ़ानी ही सही ये उम्र-ए-फ़ानी फिर कहाँ आ कि हम भी इक तराना झूम कर गाते चलें इस चमन के ताएरों की हम-ज़बानी फिर कहाँ है ज़माना इश्क़-ए-सलमा में गँवा दे ज़िंदगी ये ज़माना फिर कहाँ ये ज़िंदगानी फिर कहाँ एक ही बस्ती में हैं आसाँ है मिलना आ मिलो क्या ख़बर ले जाए दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ फ़स्ल-ए-गुल जाने को है दौर-ए-ख़िज़ाँ आने को है ये चमन ये बुलबुलें ये नग़्मा-ख़्वानी फिर कहाँ फूल चुन जी खोल कर ऐश-ओ-तरब के फूल चुन मौसम-ए-गुल फिर कहाँ फस्ल-ए-जवानी फिर कहाँ आख़िरी रात आ गई जी भर के मिल लें आज तो तुम से मिलने देगा दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ आज आए हो तो सुनते जाओ ये ताज़ा ग़ज़ल वर्ना 'अख़्तर' फिर कहाँ ये शेर-ख़्वानी फिर कहाँ

Akhtar Shirani

1 likes

ज़मान-ए-हिज्र मिटे दौर-ए-वस्ल-ए-यार आए इलाही अब तो ख़िज़ाँ जाए और बहार आए सितम-ज़रीफ़ी-ए-फ़ितरत ये क्या मुअ'म्मा है कि जिस कली को भी सूंघूँ मैं बू-ए-यार आए चमन की हर कली आमादा-ए-तबस्सुम है बहार बन के मिरी जान-ए-नौ-बहार आए हैं तिश्ना-काम हम उन बादलों से पूछे कोई कहाँ बहार की परियों के तख़्त उतार आए तिरे ख़याल की बे-ताबियाँ मआ'ज़-अल्लाह कि एक बार भुलाएँ तो लाख बार आए वो आएँ यूँँ मिरे आग़ोश-ए-इश्क़ में 'अख़्तर' कि जैसे आँखों में इक ख़्वाब-ए-बे-क़रार आए

Akhtar Shirani

0 likes

याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो अपनी और मेरी जवानी को न बर्बाद करो शर्म रोने भी न दे बेकली सोने भी न दे इस तरह तो मिरी रातों को न बर्बाद करो हद है पीने की कि ख़ुद पीर-ए-मुग़ाँ कहता है इस बुरी तरह जवानी को न बर्बाद करो याद आते हो बहुत दिल से भुलाने वालो तुम हमें याद करो तुम हमें क्यूँँ याद करो आसमाँ रुत्बा महल अपने बनाने वालो दिल का उजड़ा हुआ घर भी कोई आबाद करो हम कभी आएँ तिरे घर मगर आएँगे ज़रूर तुम ने ये वा'दा किया था कि नहीं याद करो चाँदनी रात में गुल-गश्त को जब जाते थे आह अज़रा कभी उस वक़्त को भी याद करो मैं भी शाइस्ता-ए-अल्ताफ़-ए-सितम हूँ शायद मेरे होते हुए क्यूँँ ग़ैर पे बेदाद करो सदक़े उस शोख़ के 'अख़्तर' ये लिखा है जिस ने इश्क़ में अपनी जवानी को न बर्बाद करो

Akhtar Shirani

0 likes

न तुम्हारा हुस्न जवाँ रहा न हमारा इश्क़ जवाँ रहा न वो तुम रहे न वो हम रहे जो रहा तो ग़म का समाँ रहा न वो बाग़ हैं न घटाएँ हैं न वो फूल हैं न फ़ज़ाएँ हैं न वो निकहतें न हवाएँ हैं न वो बे-ख़ुदी का समाँ रहा न वो दिल है अब न जवानियाँ न वो आशिक़ी की कहानियाँ न वो ग़म न अश्क-फ़िशानियाँ न वो दर्द-ए-दिल का निशाँ रहा न चमन है वो न बहार है न वो बुलबुलें न हज़ार है यही चार-सम्त पुकार है न वो रुत है अब न समाँ रहा न वो उम्र है न मसर्रतें न वो ऐश है न वो इशरतें न वो आरज़ूएँ न हसरतें न ख़ुशी का नाम-ओ-निशाँ रहा न निशाँ है साक़ी-ओ-जाम का न वो बादा-हा-ए-चमन-अदा न मुग़न्निया रही महव-ए-साज़ न साज़ मस्त-ए-फ़ुग़ाँ रहा ये बहार-ए-गुलशन-ए-आब-ओ-गिल है फ़ना असर तो हों क्यूँँ ख़जिल वो गुल-ए-फ़सुर्दा है मेरा दिल कि हमेशा नज़्र-ए-ख़िज़ाँ रहा नहीं सब्र साक़िया ला भी दे क़दह-ए-बहार उठा भी दे अभी सिन है ला के पिला भी दे कि हमेशा कौन जवाँ रहा कहूँ क्या कि रंज-रसीदा हूँ मैं ब-रंग-ए-अब्र रमीदा हूँ नफ़स-ए-शमीम-ए-परीदा हूँ कि रहा तबाह जहाँ रहा असर-ए-बहार-ए-ख़िज़ाँ असर है कि है फ़सुर्दा मिरी नज़र न हवा-ए-इशरत-ए-बाल-ओ-पर न जुनून-ए-बाग़-ए-जिनाँ रहा मैं गुल-ए-रमीदा-ए-रंग-ओ-बू तू बहार-ए-मय-कदा-ए-नुमू मैं हमेशा खस्ता-ए-आरज़ू तू हमेशा ऐश-ए-जवाँ रहा न सुकून-ए-दिल न क़रार-ए-जाँ न क़याम-ए-सब्र कोई ज़माँ ये सरिश्क-ए-ग़म का है कारवाँ कि यूँँही हमेशा रवाँ रहा तू मता-ए-गुल-कद-ए-नज़र गुल-ए-नौ-बहार-ए-बहिश्त-असर मैं वो अंदलीब-ए-शिकस्ता पर कि हमेशा महव-ए-फ़ुग़ाँ रहा न वो सोज़-ओ-साज़-ए-दरूँ है अब न वो चश्म-ए-गुल-कदा-ए-गूँ है अब न वो सर है अब न जुनूँ है अब न वो ज़ौक़-ए-शो'ला-चकाँ रहा है फ़लक की बदली हुई नज़र कहीं किसी से 'अख़्तर'-ए-नाला-गर कि मैं उस के जौर-ए-अलम-असर से हमेशा महव-ए-फ़ुग़ाँ रहा

Akhtar Shirani

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Akhtar Shirani.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Akhtar Shirani's ghazal.