आज फिर दर्द उठा दिल के निहाँ ख़ाने में आज फिर लोग सताने को चले आएँगे आज फिर कर्ब के शो'लों को हवा दूँगा मैं और कुछ लोग बुझाने को चले आएँगे आग से आग बुझी है न बुझेगी लेकिन दर्द को आग के दरिया में उतरना होगा आग और दर्द के मेआ'र परखने के लिए इन अँधेरों की फ़सीलों से गुज़रना होगा मैं अँधेरों की रिफ़ाक़त से नहीं हूँ बेज़ार शाम-ए-तन्हाई अँधेरा भी भला लगता है हैफ़ सद हैफ़ कि मुंकिर था ज़माना जिस का आज वो जुर्म मकानों में हुआ लगता है लाख कमरे को टटोला भी मगर कुछ न मिला फ़र्श पर ख़ून की दो-चार लकीरों के सिवा जंग और ज़ुल्म के असरार निहाँ ऐ ज़िंदाँ जान पाएगा भला कौन असीरों के सिवा दर्द दिल है कि भटकती हुई रूहों का जलाल क़त्ल हो कर भी धड़कता है जो वीरानों में मैं सुलगता ही रहा और वो अंदाज़-ए-जुनूँ छुप गया आग लगा कर मिरे अरमानों में
Related Nazm
''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
295 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
180 likes
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
160 likes
More from Chandrabhan Khayal
आवारा-गर्द लम्हे यूँँ बे-क़रार भटकें जैसे परिंद प्यासे दीवाना-वार भटकें बे-जान-ओ-बे-तकल्लुम इक आरज़ू है तन्हा जंगल में जैसे कोई वीरान सी इमारत बस्ती से दूर जैसे ख़ामोशियों का पर्बत ता'ने खड़ा हो ख़ुद को जामिद सदी की सूरत एहसास अपनी लौ पर यूँँ तमतमाए जैसे शो'लों पे चल रहा हो इक बे-लिबास जोगी कहती है अक़्ल हम को जल्वत-पसंद रोगी क्या साधुओं में ऐसी ज्वाला जगी न होगी अक्सर समेटते हैं बिखरे हुए जुनूँ को हम लोग आज भी हैं किस दर्जा ना-मुकम्मल शैताँ सिफ़त शरारे ओढ़े धुएँ के कंबल दोशीज़गी ग़म को झुलसाएँ जब मुसलसल चिंघाड़ती हैं साँसें सीनों में बे-तहाशा जैसे अज़ीम इंसाँ पामाल हो गया हो जैसे हर एक लुट कर कंगाल हो गया हो इक मुख़्तसर सा पल भी सद साल हो गया हो अजगर गुफा में लेटा शीरीनियाँ चबाए और हम ये सूखे पत्ते अब तक बटोरते हैं
Chandrabhan Khayal
0 likes
सब कुछ याद कर रहा हूँ मैं कोई बात भुला देने को और ये कैसी सच्चाई है आज भूलने की कोशिश में सदियों की तारीख़ें अज़बर कर बैठा हूँ मैं हैराँ हूँ मैं हूँ परेशाँ कैसे छुपाऊँ हालत अपनी हर कोशिश ला हासिल मेरी और ये कमरा ये दीवारें खूँटी से लटकी शलवारें ये बे-रौनक़ बूढ़ी रातें फ़र्श पे लिपटी बीती बातें ये सब मुझ पर बोझ बने हैं उफ़ ये कैसा ज़ुल्म है मुझ पर जब भी मैं नंगा होता हूँ मेरे तन पर चादर कोई पड़ी होती है वो भी एक घड़ी होती है जब सीने पर शहर खड़ा हो तब कुछ बे-मा'नी चीख़ों से इक मतलब की चीख़ अचानक मैं हथिया लूँ और किसी ख़ामोश जगह तन्हा गोशे में सारा मतलब छीन झपट कर फ़ौरन उस का गला दबा दूँ मैं शायद कुछ भूल रहा हूँ हाँ मैं सब कुछ भूल चुका हूँ अब तन्हा ख़ाली कमरे में हाथ में नंगा छुरा दबाए दौड़ रहा हूँ भाग रहा हूँ ये भी मुझ को याद नहीं अब सोया हूँ या जाग रहा हूँ क़त्ल के फ़ौरन बा'द मगर फिर वो सब का सब याद रहेगा जिसे भूलने की कोशिश में सदियों की तारीख़ें अज़बर कर बैठा हूँ
Chandrabhan Khayal
0 likes
अगर क़रीब से देखो तो जान लोगी तुम जहाँ है साँप की सूरत वजूद से लिपटा न कारवाँ न मनाज़िल न रहगुज़र न सफ़र हयात जैसे खड़ा हो कोई शजर तन्हा दिलों में प्यास तड़पती है रात दिन अपने भरी हुई है अलम-नाक यास आँखों में सियाह भूतों की मानिंद जाग उठते हैं ये बे-सुकूँ से मनाज़िर उदास आँखों में तुम्हें है ख़ौफ़ कि ज्वाला भड़क उठे न कहीं मैं सोचता हूँ जला दूँ किसी तरह ख़ुद को तुम्हें है फ़िक्र कि जीने का आसरा हो कोई मैं चाहता हूँ मिटा दूँ किसी तरह ख़ुद को रक़ीक़ आग ने सीनों को राख कर डाला वजूद काँप रहे हैं शिकस्त खाए हुए कोई पहाड़ कोई बन तलाश करते हैं दिमाग़ बार-ए-मसाइब का ग़म उठाए हुए पिघल रहे हैं उसूलों के आहनी पैकर हिसार कर्ब की सुलगी हुई फ़सीलों पर कुछ इस तरह हैं शब-ओ-रोज़ गर्द-आलूदा टँगे हूँ जैसे पुराने लिबास कीलों पर अगर क़रीब से देखो तो दिल की बस्ती में न हौसले न उमंगें न गर्मियाँ बाक़ी गुनाहगार फ़ज़ाओं की क़त्ल गाहों में हक़ीक़तों का पता है न दास्ताँ बाक़ी
Chandrabhan Khayal
0 likes
लम्हा लम्हा ख़ूनीं ख़ंजर सदियाँ जीभें हैं साँपों की घाट पे बैठी प्यास की देवी और जादूगर वक़्त की आँखें देख रही हैं मुर्दा घर के इक कमरे के तेज़ धुएँ में एक कुँवारी नंगी औरत चाट रही है अपने ही बे-रंग लहू को मन की आँखें खोल के देखूँ तो क्या देखूँ सब तो सूली पर लटका है सब कुछ लुटा लुटा लगता है कोई चुपके से कहता है नंगी औरत की जांघों में साँप डाल कर मैं सो जाऊँ लेकिन कोई चीख़ रहा है वक़्त की आँखें देख रही हैं लम्हा लम्हा ख़ूनीं ख़ंजर सदियाँ जीभें हैं साँपों की
Chandrabhan Khayal
0 likes
दिलों में दर्द दिमाग़ों में कश्मकश का धुआँ जबीं पे ख़ाक निगाहों में ग़म की तारीकी फ़रेब खाए हैं हम ने फ़रेब खाते हैं फ़रेब दे न सके हम मगर ज़माने को हमें तो फ़िक्र यही है कि कौन आएगा हमारे बा'द लहू के दिए जलाने को वो ज़िंदगी जो सभी को अज़ीज़ होती है हम अहल-ए-ग़म के न यूँँ पास आ सकेगी कभी क़दम क़दम पे जिन्हें जुस्तुजू हो चाहत की उन्हें रफ़ीक़ न दुनिया बना सकेगी कभी ख़ला में ढूँड रहे हैं हम इक मसीहा को हथेलियों पे अक़ीदत के आफ़्ताब लिए शुऊ'र-ओ-होश की दुनिया है एक मुद्दत से नज़र नज़र में नई रौशनी के ख़्वाब लिए वसीअ' दश्त-ए-तमन्ना के सुर्ख़ सीने पर सुलगते दर्द का आँचल न सर्द होगा कभी चराग़-ए-उम्र बुझाना तो ख़ैर मुमकिन है चराग़-ए-जेहद मुसलसल न सर्द होगा कभी धुआँ उगलते अँधेरों में रौशनी भर दें रगों में ख़ून की गर्दिश को तेज़-तर कर दें
Chandrabhan Khayal
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Chandrabhan Khayal.
Similar Moods
More moods that pair well with Chandrabhan Khayal's nazm.







