लम्हा लम्हा ख़ूनीं ख़ंजर सदियाँ जीभें हैं साँपों की घाट पे बैठी प्यास की देवी और जादूगर वक़्त की आँखें देख रही हैं मुर्दा घर के इक कमरे के तेज़ धुएँ में एक कुँवारी नंगी औरत चाट रही है अपने ही बे-रंग लहू को मन की आँखें खोल के देखूँ तो क्या देखूँ सब तो सूली पर लटका है सब कुछ लुटा लुटा लगता है कोई चुपके से कहता है नंगी औरत की जांघों में साँप डाल कर मैं सो जाऊँ लेकिन कोई चीख़ रहा है वक़्त की आँखें देख रही हैं लम्हा लम्हा ख़ूनीं ख़ंजर सदियाँ जीभें हैं साँपों की
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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अगर क़रीब से देखो तो जान लोगी तुम जहाँ है साँप की सूरत वजूद से लिपटा न कारवाँ न मनाज़िल न रहगुज़र न सफ़र हयात जैसे खड़ा हो कोई शजर तन्हा दिलों में प्यास तड़पती है रात दिन अपने भरी हुई है अलम-नाक यास आँखों में सियाह भूतों की मानिंद जाग उठते हैं ये बे-सुकूँ से मनाज़िर उदास आँखों में तुम्हें है ख़ौफ़ कि ज्वाला भड़क उठे न कहीं मैं सोचता हूँ जला दूँ किसी तरह ख़ुद को तुम्हें है फ़िक्र कि जीने का आसरा हो कोई मैं चाहता हूँ मिटा दूँ किसी तरह ख़ुद को रक़ीक़ आग ने सीनों को राख कर डाला वजूद काँप रहे हैं शिकस्त खाए हुए कोई पहाड़ कोई बन तलाश करते हैं दिमाग़ बार-ए-मसाइब का ग़म उठाए हुए पिघल रहे हैं उसूलों के आहनी पैकर हिसार कर्ब की सुलगी हुई फ़सीलों पर कुछ इस तरह हैं शब-ओ-रोज़ गर्द-आलूदा टँगे हूँ जैसे पुराने लिबास कीलों पर अगर क़रीब से देखो तो दिल की बस्ती में न हौसले न उमंगें न गर्मियाँ बाक़ी गुनाहगार फ़ज़ाओं की क़त्ल गाहों में हक़ीक़तों का पता है न दास्ताँ बाक़ी
Chandrabhan Khayal
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दिलों में दर्द दिमाग़ों में कश्मकश का धुआँ जबीं पे ख़ाक निगाहों में ग़म की तारीकी फ़रेब खाए हैं हम ने फ़रेब खाते हैं फ़रेब दे न सके हम मगर ज़माने को हमें तो फ़िक्र यही है कि कौन आएगा हमारे बा'द लहू के दिए जलाने को वो ज़िंदगी जो सभी को अज़ीज़ होती है हम अहल-ए-ग़म के न यूँँ पास आ सकेगी कभी क़दम क़दम पे जिन्हें जुस्तुजू हो चाहत की उन्हें रफ़ीक़ न दुनिया बना सकेगी कभी ख़ला में ढूँड रहे हैं हम इक मसीहा को हथेलियों पे अक़ीदत के आफ़्ताब लिए शुऊ'र-ओ-होश की दुनिया है एक मुद्दत से नज़र नज़र में नई रौशनी के ख़्वाब लिए वसीअ' दश्त-ए-तमन्ना के सुर्ख़ सीने पर सुलगते दर्द का आँचल न सर्द होगा कभी चराग़-ए-उम्र बुझाना तो ख़ैर मुमकिन है चराग़-ए-जेहद मुसलसल न सर्द होगा कभी धुआँ उगलते अँधेरों में रौशनी भर दें रगों में ख़ून की गर्दिश को तेज़-तर कर दें
Chandrabhan Khayal
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आवारा-गर्द लम्हे यूँँ बे-क़रार भटकें जैसे परिंद प्यासे दीवाना-वार भटकें बे-जान-ओ-बे-तकल्लुम इक आरज़ू है तन्हा जंगल में जैसे कोई वीरान सी इमारत बस्ती से दूर जैसे ख़ामोशियों का पर्बत ता'ने खड़ा हो ख़ुद को जामिद सदी की सूरत एहसास अपनी लौ पर यूँँ तमतमाए जैसे शो'लों पे चल रहा हो इक बे-लिबास जोगी कहती है अक़्ल हम को जल्वत-पसंद रोगी क्या साधुओं में ऐसी ज्वाला जगी न होगी अक्सर समेटते हैं बिखरे हुए जुनूँ को हम लोग आज भी हैं किस दर्जा ना-मुकम्मल शैताँ सिफ़त शरारे ओढ़े धुएँ के कंबल दोशीज़गी ग़म को झुलसाएँ जब मुसलसल चिंघाड़ती हैं साँसें सीनों में बे-तहाशा जैसे अज़ीम इंसाँ पामाल हो गया हो जैसे हर एक लुट कर कंगाल हो गया हो इक मुख़्तसर सा पल भी सद साल हो गया हो अजगर गुफा में लेटा शीरीनियाँ चबाए और हम ये सूखे पत्ते अब तक बटोरते हैं
Chandrabhan Khayal
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लहू-नोश लम्हों के बेदार साए उसे घेर लेंगे सिनानें उठाए तमाज़त-ज़दा शब ज़न-ए-बाकरा सी सिमट जाएगी और भी अपने तन में वो सूरज का साथी अँधेरों के बन में असासा लिए फ़िक्र का अपने फ़न में शुआओं की सूली पे ज़िंदा टंगा है न अब शहर में कोई इतना हज़ीं है ग़ज़बनाक तन्हाइयों को यक़ीं है कि उस के मुक़द्दर में वो ख़ुद नहीं है वो इक इन्फ़िरादी हक़ीक़त का हामी फ़सीलों पे वहम-ओ-गुमाँ की खड़ा है शहर-ज़ाद शबनम से ये पूछता है कि सूरज के सीने में क्या क्या छपा है मगर शाम की सुर्ख़ आँखों ने इस पर हमेशा सुलगती हुई राख डाली तह-ए-आतिश-ए-सुर्ख़-रू वो सवाली कि जिस ने हथेली पे सरसों जमा ली किसी देवता की निगाह-ए-ग़ज़ब से बना अजनबी अपने आबाद घर में कभी इस नगर में कभी उस नगर में कभी बस गया सिर्फ़ दीवार-ओ-दर में वो इक शख़्स तन्हा कि जिस का अभी तक सफ़र है मुसलसल न घर मुस्तक़िल है फ़क़त पास में उस के मासूम दिल है मगर किस क़दर मुज़्तरिब मुज़्महिल है जो शहर-ए-अना में खड़ा सोचता है कहाँ रात काटे कहाँ दिन बिताए हथेली पे दुनिया का नक़्शा बनाए भटकता है वो आज भी चोट खाए अरे गुम-शुदा आदमी आ के मिल जा अरे गुम-शुदा आदमी आ के मिल जा
Chandrabhan Khayal
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आज फिर दर्द उठा दिल के निहाँ ख़ाने में आज फिर लोग सताने को चले आएँगे आज फिर कर्ब के शो'लों को हवा दूँगा मैं और कुछ लोग बुझाने को चले आएँगे आग से आग बुझी है न बुझेगी लेकिन दर्द को आग के दरिया में उतरना होगा आग और दर्द के मेआ'र परखने के लिए इन अँधेरों की फ़सीलों से गुज़रना होगा मैं अँधेरों की रिफ़ाक़त से नहीं हूँ बेज़ार शाम-ए-तन्हाई अँधेरा भी भला लगता है हैफ़ सद हैफ़ कि मुंकिर था ज़माना जिस का आज वो जुर्म मकानों में हुआ लगता है लाख कमरे को टटोला भी मगर कुछ न मिला फ़र्श पर ख़ून की दो-चार लकीरों के सिवा जंग और ज़ुल्म के असरार निहाँ ऐ ज़िंदाँ जान पाएगा भला कौन असीरों के सिवा दर्द दिल है कि भटकती हुई रूहों का जलाल क़त्ल हो कर भी धड़कता है जो वीरानों में मैं सुलगता ही रहा और वो अंदाज़-ए-जुनूँ छुप गया आग लगा कर मिरे अरमानों में
Chandrabhan Khayal
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