लहू-नोश लम्हों के बेदार साए उसे घेर लेंगे सिनानें उठाए तमाज़त-ज़दा शब ज़न-ए-बाकरा सी सिमट जाएगी और भी अपने तन में वो सूरज का साथी अँधेरों के बन में असासा लिए फ़िक्र का अपने फ़न में शुआओं की सूली पे ज़िंदा टंगा है न अब शहर में कोई इतना हज़ीं है ग़ज़बनाक तन्हाइयों को यक़ीं है कि उस के मुक़द्दर में वो ख़ुद नहीं है वो इक इन्फ़िरादी हक़ीक़त का हामी फ़सीलों पे वहम-ओ-गुमाँ की खड़ा है शहर-ज़ाद शबनम से ये पूछता है कि सूरज के सीने में क्या क्या छपा है मगर शाम की सुर्ख़ आँखों ने इस पर हमेशा सुलगती हुई राख डाली तह-ए-आतिश-ए-सुर्ख़-रू वो सवाली कि जिस ने हथेली पे सरसों जमा ली किसी देवता की निगाह-ए-ग़ज़ब से बना अजनबी अपने आबाद घर में कभी इस नगर में कभी उस नगर में कभी बस गया सिर्फ़ दीवार-ओ-दर में वो इक शख़्स तन्हा कि जिस का अभी तक सफ़र है मुसलसल न घर मुस्तक़िल है फ़क़त पास में उस के मासूम दिल है मगर किस क़दर मुज़्तरिब मुज़्महिल है जो शहर-ए-अना में खड़ा सोचता है कहाँ रात काटे कहाँ दिन बिताए हथेली पे दुनिया का नक़्शा बनाए भटकता है वो आज भी चोट खाए अरे गुम-शुदा आदमी आ के मिल जा अरे गुम-शुदा आदमी आ के मिल जा
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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क्या लिख दूँ? क्या लिख दूँ इस काग़ज़ पर? कि जब तुम तक ये पहुँचे तो महसूस कर सको सिर्फ़ पढ़ो नहीं क्या लिख दूँ कि ये ख़त सिर्फ़ ख़त ना रह जाए तुम सेे झगड़े और जिरह कर पाए उन बातों के लिए जो तुम्हारे लिए शायद सिर्फ़ बातें होंगीं वो सारे लम्हात जो तुम्हारे लिए महज़ कुछ दिन और कुछ रातें होंगीं क्या लिख दूँ? वो शिकायती तंज़? जो मैं जानता हूँ नज़रअंदाज़ कर दोगे तुम या अपनी सारी यादें सियाही में बाँध कर एक पुड़िया सी बना दूँ? कि जब तुम उसे खोलो तो तुम्हारा ज़ेहन भी महकने लगे उन सेे मेरी तरह
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....
Ankit Maurya
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"दिवाली" मिरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है ये दिवाली है सब को जीने का अंदाज़ देती है हृदय के द्वार पर रह रह के देता है कोई दस्तक बराबर ज़िंदगी आवाज़ पर आवाज़ देती है सिमटता है अँधेरा पाँव फैलाती है दिवाली हँसाए जाती है रजनी हँसे जाती है दिवाली क़तारें देखता हूँ चलते-फिरते माह-पारों की घटाएँ आँचलों की और बरखा है सितारों की वो काले काले गेसू सुर्ख़ होंट और फूल से आरिज़ नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की निगाहों का मुक़द्दर आ के चमकाती है दिवाली पहन कर दीप-माला नाज़ फ़रमाती है दिवाली उजाले का ज़माना है उजाले की जवानी है ये हँसती जगमगाती रात सब रातों की रानी है वही दुनिया है लेकिन हुस्न देखो आज दुनिया का है जब तक रात बाक़ी कह नहीं सकते कि फ़ानी है वो जीवन आज की रात आ के बरसाती है दिवाली पसीना मौत के माथे पे छलकाती है दिवाली सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या गगन की जगमगाहट पड़ गई है आज मद्धम क्यूँँ मुंडेरों और छज्जों पर उतर आए हैं तारे क्या हज़ारों साल गुज़रे फिर भी जब आती है दिवाली महल हो चाहे कुटिया सब पे छा जाती है दिवाली इसी दिन द्रौपदी ने कृष्ण को भाई बनाया था वचन के देने वाले ने वचन अपना निभाया था जनम दिन लक्ष्मी का है भला इस दिन का क्या कहना यही वो दिन है जिस ने राम को राजा बनाया था कई इतिहास को एक साथ दोहराती है दिवाली मोहब्बत पर विजय के फूल बरसाती है दिवाली गले में हार फूलों का चरण में दीप-मालाएँ मुकुट सर पर है मुख पर ज़िंदगी की रूप-रेखाएँ लिए हैं कर में मंगल-घट न क्यूँँ घट घट पे छा जाएँ अगर परतव पड़े मुर्दा-दिलों पर वो भी जी जाएँ अजब अंदाज़ से रह रह के मस़्काती है दिवाली मोहब्बत की लहर नस नस में दौड़ाती है दिवाली तुम्हारा हूँ तुम अपनी बात मुझ से क्यूँँ छुपाते हो मुझे मालूम है जिस के लिए चक्कर लगाते हो बनारस के हो तुम को चाहिए त्यौहार घर करना बुतों को छोड़ कर तुम क्यूँँ इलाहाबाद जाते हो न जाओ ऐसे में बाहर 'नज़ीर' आती है दिवाली ये काशी है यहीं तो रंग दिखलाती है दिवाली
Nazeer Banarasi
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अगर क़रीब से देखो तो जान लोगी तुम जहाँ है साँप की सूरत वजूद से लिपटा न कारवाँ न मनाज़िल न रहगुज़र न सफ़र हयात जैसे खड़ा हो कोई शजर तन्हा दिलों में प्यास तड़पती है रात दिन अपने भरी हुई है अलम-नाक यास आँखों में सियाह भूतों की मानिंद जाग उठते हैं ये बे-सुकूँ से मनाज़िर उदास आँखों में तुम्हें है ख़ौफ़ कि ज्वाला भड़क उठे न कहीं मैं सोचता हूँ जला दूँ किसी तरह ख़ुद को तुम्हें है फ़िक्र कि जीने का आसरा हो कोई मैं चाहता हूँ मिटा दूँ किसी तरह ख़ुद को रक़ीक़ आग ने सीनों को राख कर डाला वजूद काँप रहे हैं शिकस्त खाए हुए कोई पहाड़ कोई बन तलाश करते हैं दिमाग़ बार-ए-मसाइब का ग़म उठाए हुए पिघल रहे हैं उसूलों के आहनी पैकर हिसार कर्ब की सुलगी हुई फ़सीलों पर कुछ इस तरह हैं शब-ओ-रोज़ गर्द-आलूदा टँगे हूँ जैसे पुराने लिबास कीलों पर अगर क़रीब से देखो तो दिल की बस्ती में न हौसले न उमंगें न गर्मियाँ बाक़ी गुनाहगार फ़ज़ाओं की क़त्ल गाहों में हक़ीक़तों का पता है न दास्ताँ बाक़ी
Chandrabhan Khayal
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आवारा-गर्द लम्हे यूँँ बे-क़रार भटकें जैसे परिंद प्यासे दीवाना-वार भटकें बे-जान-ओ-बे-तकल्लुम इक आरज़ू है तन्हा जंगल में जैसे कोई वीरान सी इमारत बस्ती से दूर जैसे ख़ामोशियों का पर्बत ता'ने खड़ा हो ख़ुद को जामिद सदी की सूरत एहसास अपनी लौ पर यूँँ तमतमाए जैसे शो'लों पे चल रहा हो इक बे-लिबास जोगी कहती है अक़्ल हम को जल्वत-पसंद रोगी क्या साधुओं में ऐसी ज्वाला जगी न होगी अक्सर समेटते हैं बिखरे हुए जुनूँ को हम लोग आज भी हैं किस दर्जा ना-मुकम्मल शैताँ सिफ़त शरारे ओढ़े धुएँ के कंबल दोशीज़गी ग़म को झुलसाएँ जब मुसलसल चिंघाड़ती हैं साँसें सीनों में बे-तहाशा जैसे अज़ीम इंसाँ पामाल हो गया हो जैसे हर एक लुट कर कंगाल हो गया हो इक मुख़्तसर सा पल भी सद साल हो गया हो अजगर गुफा में लेटा शीरीनियाँ चबाए और हम ये सूखे पत्ते अब तक बटोरते हैं
Chandrabhan Khayal
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दिलों में दर्द दिमाग़ों में कश्मकश का धुआँ जबीं पे ख़ाक निगाहों में ग़म की तारीकी फ़रेब खाए हैं हम ने फ़रेब खाते हैं फ़रेब दे न सके हम मगर ज़माने को हमें तो फ़िक्र यही है कि कौन आएगा हमारे बा'द लहू के दिए जलाने को वो ज़िंदगी जो सभी को अज़ीज़ होती है हम अहल-ए-ग़म के न यूँँ पास आ सकेगी कभी क़दम क़दम पे जिन्हें जुस्तुजू हो चाहत की उन्हें रफ़ीक़ न दुनिया बना सकेगी कभी ख़ला में ढूँड रहे हैं हम इक मसीहा को हथेलियों पे अक़ीदत के आफ़्ताब लिए शुऊ'र-ओ-होश की दुनिया है एक मुद्दत से नज़र नज़र में नई रौशनी के ख़्वाब लिए वसीअ' दश्त-ए-तमन्ना के सुर्ख़ सीने पर सुलगते दर्द का आँचल न सर्द होगा कभी चराग़-ए-उम्र बुझाना तो ख़ैर मुमकिन है चराग़-ए-जेहद मुसलसल न सर्द होगा कभी धुआँ उगलते अँधेरों में रौशनी भर दें रगों में ख़ून की गर्दिश को तेज़-तर कर दें
Chandrabhan Khayal
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सब कुछ याद कर रहा हूँ मैं कोई बात भुला देने को और ये कैसी सच्चाई है आज भूलने की कोशिश में सदियों की तारीख़ें अज़बर कर बैठा हूँ मैं हैराँ हूँ मैं हूँ परेशाँ कैसे छुपाऊँ हालत अपनी हर कोशिश ला हासिल मेरी और ये कमरा ये दीवारें खूँटी से लटकी शलवारें ये बे-रौनक़ बूढ़ी रातें फ़र्श पे लिपटी बीती बातें ये सब मुझ पर बोझ बने हैं उफ़ ये कैसा ज़ुल्म है मुझ पर जब भी मैं नंगा होता हूँ मेरे तन पर चादर कोई पड़ी होती है वो भी एक घड़ी होती है जब सीने पर शहर खड़ा हो तब कुछ बे-मा'नी चीख़ों से इक मतलब की चीख़ अचानक मैं हथिया लूँ और किसी ख़ामोश जगह तन्हा गोशे में सारा मतलब छीन झपट कर फ़ौरन उस का गला दबा दूँ मैं शायद कुछ भूल रहा हूँ हाँ मैं सब कुछ भूल चुका हूँ अब तन्हा ख़ाली कमरे में हाथ में नंगा छुरा दबाए दौड़ रहा हूँ भाग रहा हूँ ये भी मुझ को याद नहीं अब सोया हूँ या जाग रहा हूँ क़त्ल के फ़ौरन बा'द मगर फिर वो सब का सब याद रहेगा जिसे भूलने की कोशिश में सदियों की तारीख़ें अज़बर कर बैठा हूँ
Chandrabhan Khayal
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सोख़्ता-जाँ सोख़्ता-दिल सोख़्ता रूहों के घर में राख गर्द-ए-आतिशीं शोलों के साए नक़्श हैं दीवारों पर मफ़रूक़ चेहरे लौट चलिए अपने सब अरमान ले कर झूट है गुज़रा ज़माना और किसी उजड़े क़बीले की भटकती रूह शायद अपने मुस्तक़बिल का धुँदला सा तसव्वुर बहर-ए-ग़म के दरमियाँ है एक काले कोह की मानिंद ये इमरोज़ अपना कोह जिस पर रक़्स करते हैं सितम-ख़ुर्दा तमन्नाओं के आसेब लौट चलिए अपने सब अरमान ले कर सोचिए तो यूँँ अबस आतिश-कदों में क्यूँँ जलें दिल क्यूँँ रहें हर वक़्त सीनों पर चटानें देखिए तो चंद लुक़्में कुछ किताबें एक बिस्तर एक औरत और किराए का ये ख़ाली तंग कमरा आज अपनी ज़ीस्त का मरकज़ हैं लेकिन तीरगी का ग़म इन्हें भी खा रहा है चार जानिब ज़हर फैला जा रहा है लौट चलिए अपने सब अरमान ले कर अपने सब पैमान ले कर जिस्म ले कर जान ले कर
Chandrabhan Khayal
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