nazmKuch Alfaaz

सोख़्ता-जाँ सोख़्ता-दिल सोख़्ता रूहों के घर में राख गर्द-ए-आतिशीं शोलों के साए नक़्श हैं दीवारों पर मफ़रूक़ चेहरे लौट चलिए अपने सब अरमान ले कर झूट है गुज़रा ज़माना और किसी उजड़े क़बीले की भटकती रूह शायद अपने मुस्तक़बिल का धुँदला सा तसव्वुर बहर-ए-ग़म के दरमियाँ है एक काले कोह की मानिंद ये इमरोज़ अपना कोह जिस पर रक़्स करते हैं सितम-ख़ुर्दा तमन्नाओं के आसेब लौट चलिए अपने सब अरमान ले कर सोचिए तो यूँँ अबस आतिश-कदों में क्यूँँ जलें दिल क्यूँँ रहें हर वक़्त सीनों पर चटानें देखिए तो चंद लुक़्में कुछ किताबें एक बिस्तर एक औरत और किराए का ये ख़ाली तंग कमरा आज अपनी ज़ीस्त का मरकज़ हैं लेकिन तीरगी का ग़म इन्हें भी खा रहा है चार जानिब ज़हर फैला जा रहा है लौट चलिए अपने सब अरमान ले कर अपने सब पैमान ले कर जिस्म ले कर जान ले कर

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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आवारा-गर्द लम्हे यूँँ बे-क़रार भटकें जैसे परिंद प्यासे दीवाना-वार भटकें बे-जान-ओ-बे-तकल्लुम इक आरज़ू है तन्हा जंगल में जैसे कोई वीरान सी इमारत बस्ती से दूर जैसे ख़ामोशियों का पर्बत ता'ने खड़ा हो ख़ुद को जामिद सदी की सूरत एहसास अपनी लौ पर यूँँ तमतमाए जैसे शो'लों पे चल रहा हो इक बे-लिबास जोगी कहती है अक़्ल हम को जल्वत-पसंद रोगी क्या साधुओं में ऐसी ज्वाला जगी न होगी अक्सर समेटते हैं बिखरे हुए जुनूँ को हम लोग आज भी हैं किस दर्जा ना-मुकम्मल शैताँ सिफ़त शरारे ओढ़े धुएँ के कंबल दोशीज़गी ग़म को झुलसाएँ जब मुसलसल चिंघाड़ती हैं साँसें सीनों में बे-तहाशा जैसे अज़ीम इंसाँ पामाल हो गया हो जैसे हर एक लुट कर कंगाल हो गया हो इक मुख़्तसर सा पल भी सद साल हो गया हो अजगर गुफा में लेटा शीरीनियाँ चबाए और हम ये सूखे पत्ते अब तक बटोरते हैं

Chandrabhan Khayal

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फैल कर फिर शब-ए-तारीक हुई बहर-ए-सियाह क़तरा क़तरा लब-ए-तन्हाई से टपके एहसास और पलकों की सलीबों पे वो गुज़रे हुए दिन जैसे खंडरों की फ़सीलों पे टंगा हो इतिहास दफ़्न है राख के अम्बार तले अज़्म की लाश जुस्तुजू उस की करे आज किसे फ़ुर्सत है रौशनी माँग न सूरज से न सितारों से तीरा ओ तार मकानों में बड़ी राहत है अब तो अल्फ़ाज़ के चेहरों की ख़राशें पढ़ कर वक़्त को टाल दिया जाए गदागर की तरह वर्ना वो लम्स जो शबनम से सुबुक-तर था कभी आज फिर सीने पे गिर जाएगा पत्थर की तरह

Chandrabhan Khayal

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दिलों में दर्द दिमाग़ों में कश्मकश का धुआँ जबीं पे ख़ाक निगाहों में ग़म की तारीकी फ़रेब खाए हैं हम ने फ़रेब खाते हैं फ़रेब दे न सके हम मगर ज़माने को हमें तो फ़िक्र यही है कि कौन आएगा हमारे बा'द लहू के दिए जलाने को वो ज़िंदगी जो सभी को अज़ीज़ होती है हम अहल-ए-ग़म के न यूँँ पास आ सकेगी कभी क़दम क़दम पे जिन्हें जुस्तुजू हो चाहत की उन्हें रफ़ीक़ न दुनिया बना सकेगी कभी ख़ला में ढूँड रहे हैं हम इक मसीहा को हथेलियों पे अक़ीदत के आफ़्ताब लिए शुऊ'र-ओ-होश की दुनिया है एक मुद्दत से नज़र नज़र में नई रौशनी के ख़्वाब लिए वसीअ' दश्त-ए-तमन्ना के सुर्ख़ सीने पर सुलगते दर्द का आँचल न सर्द होगा कभी चराग़-ए-उम्र बुझाना तो ख़ैर मुमकिन है चराग़-ए-जेहद मुसलसल न सर्द होगा कभी धुआँ उगलते अँधेरों में रौशनी भर दें रगों में ख़ून की गर्दिश को तेज़-तर कर दें

Chandrabhan Khayal

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लहू-नोश लम्हों के बेदार साए उसे घेर लेंगे सिनानें उठाए तमाज़त-ज़दा शब ज़न-ए-बाकरा सी सिमट जाएगी और भी अपने तन में वो सूरज का साथी अँधेरों के बन में असासा लिए फ़िक्र का अपने फ़न में शुआओं की सूली पे ज़िंदा टंगा है न अब शहर में कोई इतना हज़ीं है ग़ज़बनाक तन्हाइयों को यक़ीं है कि उस के मुक़द्दर में वो ख़ुद नहीं है वो इक इन्फ़िरादी हक़ीक़त का हामी फ़सीलों पे वहम-ओ-गुमाँ की खड़ा है शहर-ज़ाद शबनम से ये पूछता है कि सूरज के सीने में क्या क्या छपा है मगर शाम की सुर्ख़ आँखों ने इस पर हमेशा सुलगती हुई राख डाली तह-ए-आतिश-ए-सुर्ख़-रू वो सवाली कि जिस ने हथेली पे सरसों जमा ली किसी देवता की निगाह-ए-ग़ज़ब से बना अजनबी अपने आबाद घर में कभी इस नगर में कभी उस नगर में कभी बस गया सिर्फ़ दीवार-ओ-दर में वो इक शख़्स तन्हा कि जिस का अभी तक सफ़र है मुसलसल न घर मुस्तक़िल है फ़क़त पास में उस के मासूम दिल है मगर किस क़दर मुज़्तरिब मुज़्महिल है जो शहर-ए-अना में खड़ा सोचता है कहाँ रात काटे कहाँ दिन बिताए हथेली पे दुनिया का नक़्शा बनाए भटकता है वो आज भी चोट खाए अरे गुम-शुदा आदमी आ के मिल जा अरे गुम-शुदा आदमी आ के मिल जा

Chandrabhan Khayal

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अगर क़रीब से देखो तो जान लोगी तुम जहाँ है साँप की सूरत वजूद से लिपटा न कारवाँ न मनाज़िल न रहगुज़र न सफ़र हयात जैसे खड़ा हो कोई शजर तन्हा दिलों में प्यास तड़पती है रात दिन अपने भरी हुई है अलम-नाक यास आँखों में सियाह भूतों की मानिंद जाग उठते हैं ये बे-सुकूँ से मनाज़िर उदास आँखों में तुम्हें है ख़ौफ़ कि ज्वाला भड़क उठे न कहीं मैं सोचता हूँ जला दूँ किसी तरह ख़ुद को तुम्हें है फ़िक्र कि जीने का आसरा हो कोई मैं चाहता हूँ मिटा दूँ किसी तरह ख़ुद को रक़ीक़ आग ने सीनों को राख कर डाला वजूद काँप रहे हैं शिकस्त खाए हुए कोई पहाड़ कोई बन तलाश करते हैं दिमाग़ बार-ए-मसाइब का ग़म उठाए हुए पिघल रहे हैं उसूलों के आहनी पैकर हिसार कर्ब की सुलगी हुई फ़सीलों पर कुछ इस तरह हैं शब-ओ-रोज़ गर्द-आलूदा टँगे हूँ जैसे पुराने लिबास कीलों पर अगर क़रीब से देखो तो दिल की बस्ती में न हौसले न उमंगें न गर्मियाँ बाक़ी गुनाहगार फ़ज़ाओं की क़त्ल गाहों में हक़ीक़तों का पता है न दास्ताँ बाक़ी

Chandrabhan Khayal

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