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फैल कर फिर शब-ए-तारीक हुई बहर-ए-सियाह क़तरा क़तरा लब-ए-तन्हाई से टपके एहसास और पलकों की सलीबों पे वो गुज़रे हुए दिन जैसे खंडरों की फ़सीलों पे टंगा हो इतिहास दफ़्न है राख के अम्बार तले अज़्म की लाश जुस्तुजू उस की करे आज किसे फ़ुर्सत है रौशनी माँग न सूरज से न सितारों से तीरा ओ तार मकानों में बड़ी राहत है अब तो अल्फ़ाज़ के चेहरों की ख़राशें पढ़ कर वक़्त को टाल दिया जाए गदागर की तरह वर्ना वो लम्स जो शबनम से सुबुक-तर था कभी आज फिर सीने पे गिर जाएगा पत्थर की तरह

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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दिलों में दर्द दिमाग़ों में कश्मकश का धुआँ जबीं पे ख़ाक निगाहों में ग़म की तारीकी फ़रेब खाए हैं हम ने फ़रेब खाते हैं फ़रेब दे न सके हम मगर ज़माने को हमें तो फ़िक्र यही है कि कौन आएगा हमारे बा'द लहू के दिए जलाने को वो ज़िंदगी जो सभी को अज़ीज़ होती है हम अहल-ए-ग़म के न यूँँ पास आ सकेगी कभी क़दम क़दम पे जिन्हें जुस्तुजू हो चाहत की उन्हें रफ़ीक़ न दुनिया बना सकेगी कभी ख़ला में ढूँड रहे हैं हम इक मसीहा को हथेलियों पे अक़ीदत के आफ़्ताब लिए शुऊ'र-ओ-होश की दुनिया है एक मुद्दत से नज़र नज़र में नई रौशनी के ख़्वाब लिए वसीअ' दश्त-ए-तमन्ना के सुर्ख़ सीने पर सुलगते दर्द का आँचल न सर्द होगा कभी चराग़-ए-उम्र बुझाना तो ख़ैर मुमकिन है चराग़-ए-जेहद मुसलसल न सर्द होगा कभी धुआँ उगलते अँधेरों में रौशनी भर दें रगों में ख़ून की गर्दिश को तेज़-तर कर दें

Chandrabhan Khayal

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आवारा-गर्द लम्हे यूँँ बे-क़रार भटकें जैसे परिंद प्यासे दीवाना-वार भटकें बे-जान-ओ-बे-तकल्लुम इक आरज़ू है तन्हा जंगल में जैसे कोई वीरान सी इमारत बस्ती से दूर जैसे ख़ामोशियों का पर्बत ता'ने खड़ा हो ख़ुद को जामिद सदी की सूरत एहसास अपनी लौ पर यूँँ तमतमाए जैसे शो'लों पे चल रहा हो इक बे-लिबास जोगी कहती है अक़्ल हम को जल्वत-पसंद रोगी क्या साधुओं में ऐसी ज्वाला जगी न होगी अक्सर समेटते हैं बिखरे हुए जुनूँ को हम लोग आज भी हैं किस दर्जा ना-मुकम्मल शैताँ सिफ़त शरारे ओढ़े धुएँ के कंबल दोशीज़गी ग़म को झुलसाएँ जब मुसलसल चिंघाड़ती हैं साँसें सीनों में बे-तहाशा जैसे अज़ीम इंसाँ पामाल हो गया हो जैसे हर एक लुट कर कंगाल हो गया हो इक मुख़्तसर सा पल भी सद साल हो गया हो अजगर गुफा में लेटा शीरीनियाँ चबाए और हम ये सूखे पत्ते अब तक बटोरते हैं

Chandrabhan Khayal

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अगर क़रीब से देखो तो जान लोगी तुम जहाँ है साँप की सूरत वजूद से लिपटा न कारवाँ न मनाज़िल न रहगुज़र न सफ़र हयात जैसे खड़ा हो कोई शजर तन्हा दिलों में प्यास तड़पती है रात दिन अपने भरी हुई है अलम-नाक यास आँखों में सियाह भूतों की मानिंद जाग उठते हैं ये बे-सुकूँ से मनाज़िर उदास आँखों में तुम्हें है ख़ौफ़ कि ज्वाला भड़क उठे न कहीं मैं सोचता हूँ जला दूँ किसी तरह ख़ुद को तुम्हें है फ़िक्र कि जीने का आसरा हो कोई मैं चाहता हूँ मिटा दूँ किसी तरह ख़ुद को रक़ीक़ आग ने सीनों को राख कर डाला वजूद काँप रहे हैं शिकस्त खाए हुए कोई पहाड़ कोई बन तलाश करते हैं दिमाग़ बार-ए-मसाइब का ग़म उठाए हुए पिघल रहे हैं उसूलों के आहनी पैकर हिसार कर्ब की सुलगी हुई फ़सीलों पर कुछ इस तरह हैं शब-ओ-रोज़ गर्द-आलूदा टँगे हूँ जैसे पुराने लिबास कीलों पर अगर क़रीब से देखो तो दिल की बस्ती में न हौसले न उमंगें न गर्मियाँ बाक़ी गुनाहगार फ़ज़ाओं की क़त्ल गाहों में हक़ीक़तों का पता है न दास्ताँ बाक़ी

Chandrabhan Khayal

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सब कुछ याद कर रहा हूँ मैं कोई बात भुला देने को और ये कैसी सच्चाई है आज भूलने की कोशिश में सदियों की तारीख़ें अज़बर कर बैठा हूँ मैं हैराँ हूँ मैं हूँ परेशाँ कैसे छुपाऊँ हालत अपनी हर कोशिश ला हासिल मेरी और ये कमरा ये दीवारें खूँटी से लटकी शलवारें ये बे-रौनक़ बूढ़ी रातें फ़र्श पे लिपटी बीती बातें ये सब मुझ पर बोझ बने हैं उफ़ ये कैसा ज़ुल्म है मुझ पर जब भी मैं नंगा होता हूँ मेरे तन पर चादर कोई पड़ी होती है वो भी एक घड़ी होती है जब सीने पर शहर खड़ा हो तब कुछ बे-मा'नी चीख़ों से इक मतलब की चीख़ अचानक मैं हथिया लूँ और किसी ख़ामोश जगह तन्हा गोशे में सारा मतलब छीन झपट कर फ़ौरन उस का गला दबा दूँ मैं शायद कुछ भूल रहा हूँ हाँ मैं सब कुछ भूल चुका हूँ अब तन्हा ख़ाली कमरे में हाथ में नंगा छुरा दबाए दौड़ रहा हूँ भाग रहा हूँ ये भी मुझ को याद नहीं अब सोया हूँ या जाग रहा हूँ क़त्ल के फ़ौरन बा'द मगर फिर वो सब का सब याद रहेगा जिसे भूलने की कोशिश में सदियों की तारीख़ें अज़बर कर बैठा हूँ

Chandrabhan Khayal

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आज फिर दर्द उठा दिल के निहाँ ख़ाने में आज फिर लोग सताने को चले आएँगे आज फिर कर्ब के शो'लों को हवा दूँगा मैं और कुछ लोग बुझाने को चले आएँगे आग से आग बुझी है न बुझेगी लेकिन दर्द को आग के दरिया में उतरना होगा आग और दर्द के मेआ'र परखने के लिए इन अँधेरों की फ़सीलों से गुज़रना होगा मैं अँधेरों की रिफ़ाक़त से नहीं हूँ बेज़ार शाम-ए-तन्हाई अँधेरा भी भला लगता है हैफ़ सद हैफ़ कि मुंकिर था ज़माना जिस का आज वो जुर्म मकानों में हुआ लगता है लाख कमरे को टटोला भी मगर कुछ न मिला फ़र्श पर ख़ून की दो-चार लकीरों के सिवा जंग और ज़ुल्म के असरार निहाँ ऐ ज़िंदाँ जान पाएगा भला कौन असीरों के सिवा दर्द दिल है कि भटकती हुई रूहों का जलाल क़त्ल हो कर भी धड़कता है जो वीरानों में मैं सुलगता ही रहा और वो अंदाज़-ए-जुनूँ छुप गया आग लगा कर मिरे अरमानों में

Chandrabhan Khayal

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