दुनिया की मिट्टी सोना उगलती है और मिट्टी का सोना मौत का ज़ेवर बनता है
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
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जब छुआ साथ तुलसी चौरा आँखों में साँसों को खींचे तुम सेे जो वा'दा किया कभी पड़िया जी के पीपल नीचे तुम ने चाहा था ख़ुश रहना ख़ुद ख़ुशी सदा मुझ से सीखे दुनिया भर के संकल्प सतत पूरे होते मुझ में दीखे ख़ुद से अनुबंध किया है अब मन को निर्बंध किया है अब गत-विगत मुक्त हो सकने का सम्पूर्ण प्रबन्ध किया है अब इस नए साल के पहले दिन तुम से बाहर सोचा तो है मन-प्राण सुमरनी छोड़ेंगे सुनते तो हैं होता तो है काफ़ी है।
Kumar Vishwas
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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दो तरह के हैं बदन दो तरह के पैरहन इक सजल बे-रंग रेशम सा लिबास जिस में लिपटा मेरा फ़न जिस में पलते हैं ख़याल इक तरह का पैरहन ताज़ा उजले सूत का जिस में रखा है बदन और मेरे ख़त्त-ओ-ख़ाल पैरहन ऊपर का उतरे तो पहन लूँ मैं किसी दीवार को या गुमाँ को छोड़ कर मैं यक़ीं को ओढ़ लूँ पैरहन अंदर का उतरे और हूँ मैं बे-लिबास आगही को ढूँड कर मैं इस ज़मीं को ओढ़ लूँ
Yameen
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ये साया तो मेरे ही अंदर से निकल कर भाग रहा है माई तुम ये क्या छनकाती हो आधा भाई जाग रहा है
Yameen
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इक ठिठुरती सुब्ह है डाक-ख़ाने की गली में ज़र्द पत्ते उड़ रहे हैं कपकपाती उँगलियों से लिखा ऐडरेस हर कोई पढ़ लेता है दोपहर के बाग़ में दाऊदी फूलों और उस के दरमियाँ नौजवानी के दिनों की एक याद देर तक हँसती रही सह-पहर है और वो कोने वाली शॉप से इक ग़ुबारा ले रही है लफ़्ज़ होंटों से उड़ानें भर रहे हैं शाम की ख़ामोश रह पर वो कोई असरार पहने चल रही है रजनी-गंधा की महक बिखरी हुई है दूर पेड़ों में छुपी दरगाह तक
Yameen
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याद नहीं किया भरे-पुरे बाज़ार से जब मैं ख़ाली ख़ाली लौट आया था और इक फूल तेरे चमकते हाथ पे रख कर मैं ने कहा था तेरी पसंद के रंग का कपड़ा मिल न सके तो मेरे कोट की जेब में रखे नोट की क़ीमत गिर जाती है
Yameen
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रेत हमारे तलवे भौंती है और आँखें लाल करती है झील पर कुछ नज़र नहीं आता चाँद हमारे ख़्वाबों से निकल कर सरहदों पर ढेर हो गया है किनारे पर गिरे बीज आँखें खोलते हैं और फिर हमेशा के लिए मूँद लेते हैं ज़ाफ़रान का खेत इस बार भी बार आवर न हुआ कौन कुरेदे मिट्टी और अपना नसीब तलाश करे ज़मीन को कोई देखता ही नहीं सब आसमान की तरफ़ देखते हैं मगर ये नहीं जानते कि चीख़ चिनार से ऊँची क्यूँ नहीं जाती चाँदनी कोहसारों से फिसलती है और बर्फ़ छतों से शन्गरफ़ी सिलों पर गिरते गिरते कोई लफ़्ज़ बना देती है कोई भी लफ़्ज़ जो ज़बान पर आने से पहले कहीं ख़याल में उगता है जिस के मा'नी पर कोई गवाह नहीं
Yameen
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