न जाने सरगोशियों में कितनी कहानियाँ अन-कही हैं अब तक बरहना दीवार पर टँगे पुर-कशिश कैलेंडर में दाएरे का निशान उम्र-ए-गुरेज़-पा को दवाम के ख़्वाब दे गया है जिस में सुलगते सय्यारे गेसुओं के घने ख़ुनुक साए ढूँडते हैं गुलाब-साँसों से जैसे शादाबियों की तख़्लीक़ हो रही है वो झुक के फूलों में अपने भीगे बदन की ख़ुशबू को बाँटती है चमन से जाती बहार इक टोकरी में महफ़ूज़ हो गई है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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गुम हुए यूँँ कि कभी मेरे शनासा ही न थे कुछ लिखा होता तुम्हें मुझ से शिकायत क्या है ख़बर कब आए हो कैसे सुनाओ प्यारे क्या ख़बर लाए हो यारों की हिकायत क्या है उस ने ये कुछ न कहा और कहा तो इतना खेल दिल-चस्प है नज़्ज़ारे करो और फिर एक ख़ला एक गिराँ-बार ख़मोशी की अज़िय्यत ले कर मैं ये कहता हुआ उठ आया कि हाँ खेल है दिलचस्प बहुत
Wali Alam Shaheen
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खेत प्यासे हैं फ़ज़ा हाँफती है जा-ब-जा उखड़ी जड़ें चाटती इक गाए के सूखे हुए मटियाले खुरों की मानिंद फट गई है जो ज़मीं उस में उगी झाड़ियाँ बे-बर्ग-ओ-समर रहती हैं मौसम हो कोई किसी फ़ालिज-ज़दा बीमार के अकड़े हुए पंजे की तरह टहनियाँ सोए फ़लक देखती फ़रियाद-कुनाँ हैं कब से महज़ फ़रियाद से ऐ दोस्त मगर क्या होगा जोड़ता रहता है मौसम की विरासत से दिलों को जो किसी मेज़-नुमा शय ये कई दिन से पड़ा चाए-ख़ाने का फटा सा अख़बार इक नज़र आओ इसे देख तो लें हाल ऐसा है कि अब जो भी हो अच्छा होगा
Wali Alam Shaheen
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मूँद कर आँखें बड़े ही ध्यान से मैं ने पीछे की तरफ़ हौज़ के पानी में सिक्के फेंकते ही इक ज़रा सी छेड़ की अपने दिल-ए-ख़ुश-फ़हम से ऐ बावले अब तो हो जाएगी पूरी ख़ैर से तेरी मुराद सह-पहर की धूप में हौज़ के झरने में सिक्के सात रंगों में चमकते यूँँ दिखाई दे रहे थे जैसे हम आवाज़ हो कर सब उड़ाते हों मिरे दिल का मज़ाक़ जैसे आपस में ही कर रक्खा हो बरपा मेरी नम-ख़ुर्दा हथेली के सितारों ने फ़साद
Wali Alam Shaheen
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पहले रातें इतनी लंबी कब होती थीं जो भी हिसाब और खेल हुआ करता था सब मौसम का था रोज़-ओ-शब की हर साअ'त का इक जैसा पैमाना था अपने मिलने वाले सारे झूटे सच्चे यारों से इक मुस्तहकम याराना था लेकिन अपने दर्द की सम्तों की पहचान न रखने वाले दिल ये सोचना था हर ख़्वाब की क़ीमत होती है और अब इन दो आँखों में इतने तरह तरह के दुनिया भर के ख़्वाब भरे हैं इन में से इक इक को गिन कर सब के मुनासिब दाम चुकाना इस के लिए तो दो सदियाँ भी कम होंगी कंगले इतनी नक़दी कहाँ से आएगी
Wali Alam Shaheen
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मिट्टी की दीवार पे इक खूँटी से लटकी मेरी यादों की ज़म्बील जिस में छुपे थे रंग-बिरंगे कपड़ों के बोसीदा कतरन गोल गोल सी नन्ही मुन्नी कर धनियों के दाने इक अमरूद की डाली काट के बाबा ने जो बनाई थी वो टेढ़ी-मेढ़ी एक ग़ुलैल नीले पीले मटियाले और लाल परों की ढेरी चौड़े मुँह का इक मुँह ज़ोर सा काठ का अड़ियल घोड़ा अपनी अकड़ में खाता हुआ बग्घी वाले का कोड़ा इतनी मुद्दत बा'द जो खोली मैं ने वो ज़म्बील इक नन्हा इस में से निकल कर जैसे सरपट भागा देखता था पीछा ही वो अपना और न अपना आगा और उलझता जाता जितना खुलता लिपटा धागा जैसे भयानक सपने देखे कई दिनों का जागा अब के फिर वो नज़र आया तो सरगोशी में पूछूँगा तुम तो मेरे यार थे फिर क्यूँँ सालों साल नहीं मिलने को अपने शुऊ'र की हैरानी का बोझ उठाए जाने कितनी कठिन राहों से गुज़रते हो जग वालों पर हँसते हो या छुप छुप आहें भरते हो बस्ती छोड़ के जंगल जंगल रैन बसेरा करते हो या फिर इक पाताल की निचली तह में उतर जा मरते हो शायद तुम भी गौतम हो और अपने आप से डरते हो
Wali Alam Shaheen
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