nazmKuch Alfaaz

आप कहते कि उन्नति हुई है फैलती जा रही भुखमरी है आप कहते कि उन्नति हुई है दौर मँहगाइयों का बढ़ा है मौत का भी बिगुल बेसुरा है आर्थिक युद्ध ऐसा अनोखा हर तरफ़ दिख रहा सिर्फ़ धोखा आग सीमाओं पर भी लगी है आप कहते कि उन्नति हुई है रोग बढ़कर मिटाता जनों को बंद भी है सताता जनों को है बुरे हाल में जन सुरक्षा कम हुई राजनीतिक तितिक्षा ऑक्सीजन तलक घट रही है आप कहते कि उन्नति हुई है रोमियो के विरोधी बने तुम लैला मजनूॅं के रोधी बने तुम प्रेम प्रतिबंध तुम ने लगाया कृष्ण राधा तलक को रुलाया इतना प्रतिबन्ध कब लाज़िमी है आप कहते कि उन्नति हुई है नोट-बन्दी ने जनगण हिलाया कालाधन लौट फिर भी न आया आज नीरव व माल्या अडानी लूटते देश का माल पानी झोपडों में ग़रीबी पड़ी है आप कहते कि उन्नति हुई है सब किसानों जवानों दुकानों टपरियों गाँव के घर मकानों टैक्स भरना बहुत है ज़रूरी है विकासों में अब कुछ ही दूरी देवी उत्पाद-शुल्का खड़ी है आप कहते कि उन्नति हुई है दोगुनी आई पाते किसानों वस्तु उत्पाद देती दुकानों टैक्स भरते हुए शौर्यवानों और तलते पकौड़े जवानों सबने ख़ुद ही चुनी बे-बसी है आप कहते कि उन्नति हुई है

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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शुभकामनाऍं ईद की बेपनाह ख़ुशियों पर मेरी शुभकामनाऍं स्वीकारो ख़ुश रहो और सब को रहने दो बेवजह ही किसी को मत मारो एक इंसाॅं से दूसरे को यहाँ बस मुहब्बत अता हो बैर हो ख़त्म ऐसे कुछ काम मिल के करते चलो सिर्फ़ नफ़रत को ही न विस्तारो मेरी शुभकामनाऍं स्वीकारो

Nityanand Vajpayee

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"गले से क्यूँ नहीं मिलते" हबीब आ कर तुम अपने दिल-जले से क्यूँ नहीं मिलते पुराने दोस्त हो तो फिर गले से क्यूँ नहीं मिलते मुझे मालूम है मैं हूँ नहीं लाइक़ तुम्हारे पर तुम्हें दरिया-ए-क़ीर-ए-चाव से लाया किनारे पर उसी अंदाज़ या फिर हौसले से क्यूँ नहीं मिलते ज़वानी बीत जाएगी तो फिर आने से क्या हासिल फिर आ कर के मेरा ये दिल जला जाने से क्या हासिल अभी आ कर के दिलकश मरहले से क्यूँ नहीं मिलते फ़ज़ाओं में तुम्हारी साँसों की हैं ख़ुशबुएँ अब तक तुम्हारी पैरहन-ए-इश्क़ के छुपते निशाँ कब तक पलटकर 'इश्क़-ए-सादिक़ ज़लज़ले से क्यूँ नहीं मिलते

Nityanand Vajpayee

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"तन्हाई" मेरी तन्हाई को अंगार बनाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो कितनी मुश्किल से सँभाला है अभी फिर दिल को बीती यादों में रुलाया है अभी फिर दिल को ख़्वाब मिलने का मुझे ऐसे दिखाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो रेत तपती मेरे एहसासों की है धू-धूकर उस पे यादों की अगन जाती जिगर छू-छूकर इस क़दर दिल को मेरे आप जलाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो खिड़कियाँ आप की राहों को निहारा करतीं आहटें आने का जब-जब भी इशारा करतीं मुझ में यूँँ ज्वार मुहब्बत का उठाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो रोज़ कहते हो कि कल आ के मिलूँगा तुम सेे हो के दुनिया में सफल आ के मिलूँगा तुम सेे अपनी तक़दीर को इतना भी सताया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो

Nityanand Vajpayee

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"बाँसुरी" बाँसुरी श्याम की बज उठी है आज यमुना तलक मनचली है राधिका और ललिता विशाखा श्याम सब को मुरलिया सुनाता गोपियों में अजब बेकली है आज यमुना तलक मनचली है बृज निवासी सभी हैं अनोखे प्रेम में खा चुके लाख धोखे आत्मा प्रीति रस में सनी है आज यमुना तलक मनचली है माँ यशोदा तुम्हें हैं बुलाती और नवनीत भी हैं खिलाती कुंभ पर क्यूँ लगे कंकड़ी है आज यमुना तलक मनचली है कालिया नाग की रानियाँ भी गा रहीं कृष्ण की कीर्तियाँ भी कंस की धृष्टता सूखती है आज यमुना तलक मनचली है

Nityanand Vajpayee

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"टूटा दिल" टूटते दिल की जब आवाज़ सुनाएँगे तुम्हें तब मेरे दर्द के अंदाज़ रुलाएँगे तुम्हें मैं ने बोए हैं कई बीज जो अपनेपन के बारिशें इश्क़ की पनपाने उन्हें आएँगी फूल गुलशन में नवेले जो खिलेंगे हिल-मिल तितलियाँ झूम के बहलाने उन्हें आएँगी उस बग़ीचे में मेरी यादों के गाएँगे भँवर शोख़ मासूम नज़ारे भी चिढ़ाएँगे तुम्हें टूटते दिल की जब आवाज़ सुनाएँगे तुम्हें तब मेरे दर्द के अंदाज़ रुलाएँगे तुम्हें फिर अँधेरों में कहीं छुप के जो रोओगे तुम बीच मँझधार में यूँँ छोड़ के जाने के बा'द अपने मतलब के लिए मुझ को किया था रुसवा ख़ून-ए-दिल मेरा सर-ए-आम बहाने के बा'द मैं भले तुम को दुआएँ ही हमेशा दूँगा इन दु'आओं के भी फ़रमान दुखाएँगे तुम्हें टूटते दिल की जब आवाज़ सुनाएँगे तुम्हें तब मेरे दर्द के अंदाज़ रुलाएँगे तुम्हें मेरी साँसों में अभी तक है तुम्हारी ख़ुश्बू और गीतों में सरासर हैं तुम्हारे चर्चे अब तो लोगों की ज़ुबानी भी सुने जा सकते इश्क़ में हद से गुज़रने के हमारे चर्चे लोग अब भूल चुके सारे पुराने क़िस्से इस कहानी में मेरे साथ में लाएँगे तुम्हें टूटते दिल की जब आवाज़ सुनाएँगे तुम्हें तब मेरे दर्द के अंदाज़ रुलाएँगे तुम्हें

Nityanand Vajpayee

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