nazmKuch Alfaaz

शुभकामनाऍं ईद की बेपनाह ख़ुशियों पर मेरी शुभकामनाऍं स्वीकारो ख़ुश रहो और सब को रहने दो बेवजह ही किसी को मत मारो एक इंसाॅं से दूसरे को यहाँ बस मुहब्बत अता हो बैर हो ख़त्म ऐसे कुछ काम मिल के करते चलो सिर्फ़ नफ़रत को ही न विस्तारो मेरी शुभकामनाऍं स्वीकारो

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"गले से क्यूँ नहीं मिलते" हबीब आ कर तुम अपने दिल-जले से क्यूँ नहीं मिलते पुराने दोस्त हो तो फिर गले से क्यूँ नहीं मिलते मुझे मालूम है मैं हूँ नहीं लाइक़ तुम्हारे पर तुम्हें दरिया-ए-क़ीर-ए-चाव से लाया किनारे पर उसी अंदाज़ या फिर हौसले से क्यूँ नहीं मिलते ज़वानी बीत जाएगी तो फिर आने से क्या हासिल फिर आ कर के मेरा ये दिल जला जाने से क्या हासिल अभी आ कर के दिलकश मरहले से क्यूँ नहीं मिलते फ़ज़ाओं में तुम्हारी साँसों की हैं ख़ुशबुएँ अब तक तुम्हारी पैरहन-ए-इश्क़ के छुपते निशाँ कब तक पलटकर 'इश्क़-ए-सादिक़ ज़लज़ले से क्यूँ नहीं मिलते

Nityanand Vajpayee

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"तन्हाई" मेरी तन्हाई को अंगार बनाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो कितनी मुश्किल से सँभाला है अभी फिर दिल को बीती यादों में रुलाया है अभी फिर दिल को ख़्वाब मिलने का मुझे ऐसे दिखाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो रेत तपती मेरे एहसासों की है धू-धूकर उस पे यादों की अगन जाती जिगर छू-छूकर इस क़दर दिल को मेरे आप जलाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो खिड़कियाँ आप की राहों को निहारा करतीं आहटें आने का जब-जब भी इशारा करतीं मुझ में यूँँ ज्वार मुहब्बत का उठाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो रोज़ कहते हो कि कल आ के मिलूँगा तुम सेे हो के दुनिया में सफल आ के मिलूँगा तुम सेे अपनी तक़दीर को इतना भी सताया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो

Nityanand Vajpayee

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आप कहते कि उन्नति हुई है फैलती जा रही भुखमरी है आप कहते कि उन्नति हुई है दौर मँहगाइयों का बढ़ा है मौत का भी बिगुल बेसुरा है आर्थिक युद्ध ऐसा अनोखा हर तरफ़ दिख रहा सिर्फ़ धोखा आग सीमाओं पर भी लगी है आप कहते कि उन्नति हुई है रोग बढ़कर मिटाता जनों को बंद भी है सताता जनों को है बुरे हाल में जन सुरक्षा कम हुई राजनीतिक तितिक्षा ऑक्सीजन तलक घट रही है आप कहते कि उन्नति हुई है रोमियो के विरोधी बने तुम लैला मजनूॅं के रोधी बने तुम प्रेम प्रतिबंध तुम ने लगाया कृष्ण राधा तलक को रुलाया इतना प्रतिबन्ध कब लाज़िमी है आप कहते कि उन्नति हुई है नोट-बन्दी ने जनगण हिलाया कालाधन लौट फिर भी न आया आज नीरव व माल्या अडानी लूटते देश का माल पानी झोपडों में ग़रीबी पड़ी है आप कहते कि उन्नति हुई है सब किसानों जवानों दुकानों टपरियों गाँव के घर मकानों टैक्स भरना बहुत है ज़रूरी है विकासों में अब कुछ ही दूरी देवी उत्पाद-शुल्का खड़ी है आप कहते कि उन्नति हुई है दोगुनी आई पाते किसानों वस्तु उत्पाद देती दुकानों टैक्स भरते हुए शौर्यवानों और तलते पकौड़े जवानों सबने ख़ुद ही चुनी बे-बसी है आप कहते कि उन्नति हुई है

Nityanand Vajpayee

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दहशत सारी दुनिया में अँधेरा है जहन्नम जैसा हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है जहन्नम जैसा फ़तह बंदूकों ने पाई है सर-ए-नौ देखो सतह दहशत ने बनाई है सर-ए-नौ देखो घर में मौतों का बसेरा है जहन्नम जैसा हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है जहन्नम जैसा कौन इंसान को इंसान का दुश्मन करता कौन बारूद बिछा लाशों पे नर्तन करता दर्द ये किस ने बिखेरा है जहन्नम जैसा हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है जहन्नम जैसा मैं ने किंदील मेरे दिल का जलाया लेकिन कुछ अँधेरे को उजाले से मिटाया लेकिन धुँधला धुँधला सा सवेरा है जहन्नम जैसा हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है जहन्नम जैसा आज दुनिया पे हुकूमात हुए ज़ुल्मों के क़ाबिल-ए-ग़ौर सवालात हुए ज़ुल्मों के बढ़ता आतंक का डेरा है जहन्नम जैसा हर तरफ़ ख़ौफ़ का फेरा है जहन्नम जैसा

Nityanand Vajpayee

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ख़ुदा क़सम दिल खो गया है उन में हमारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम उल्फ़त भरी ये आँखें भी करती हैं मस्तियाँ लगता सजा ही लेंगी मुहब्बत की बस्तियाँ आँचल को उन ने ऐसे सँवारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम मौजों के इक उफाॅं में सफ़ीना था इश्क़ का तूफ़ान के फ़ुग़ाँ में सफ़ीना था इश्क़ का लो इस को मिल गया है किनारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम ख़ुश्बू हमारे दिल के गुलिस्ताँ में उड़ रही मदमस्त फ़ज़ा मिल के गुलिस्ताँ में उड़ रही अब मिल गया है दिल को सहारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम हलचल हुई अजीब सी बेताब मैं हुआ फ़ुरक़त के ज़ख़्म खा के यूँँ सुरख़ाब मैं हुआ इतनी कशिश से किस ने पुकारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम

Nityanand Vajpayee

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