nazmKuch Alfaaz

ख़ुदा क़सम दिल खो गया है उन में हमारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम उल्फ़त भरी ये आँखें भी करती हैं मस्तियाँ लगता सजा ही लेंगी मुहब्बत की बस्तियाँ आँचल को उन ने ऐसे सँवारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम मौजों के इक उफाॅं में सफ़ीना था इश्क़ का तूफ़ान के फ़ुग़ाँ में सफ़ीना था इश्क़ का लो इस को मिल गया है किनारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम ख़ुश्बू हमारे दिल के गुलिस्ताँ में उड़ रही मदमस्त फ़ज़ा मिल के गुलिस्ताँ में उड़ रही अब मिल गया है दिल को सहारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम हलचल हुई अजीब सी बेताब मैं हुआ फ़ुरक़त के ज़ख़्म खा के यूँँ सुरख़ाब मैं हुआ इतनी कशिश से किस ने पुकारा ख़ुदा क़सम कमसिन अदा बनी है इशारा ख़ुदा क़सम

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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"गले से क्यूँ नहीं मिलते" हबीब आ कर तुम अपने दिल-जले से क्यूँ नहीं मिलते पुराने दोस्त हो तो फिर गले से क्यूँ नहीं मिलते मुझे मालूम है मैं हूँ नहीं लाइक़ तुम्हारे पर तुम्हें दरिया-ए-क़ीर-ए-चाव से लाया किनारे पर उसी अंदाज़ या फिर हौसले से क्यूँ नहीं मिलते ज़वानी बीत जाएगी तो फिर आने से क्या हासिल फिर आ कर के मेरा ये दिल जला जाने से क्या हासिल अभी आ कर के दिलकश मरहले से क्यूँ नहीं मिलते फ़ज़ाओं में तुम्हारी साँसों की हैं ख़ुशबुएँ अब तक तुम्हारी पैरहन-ए-इश्क़ के छुपते निशाँ कब तक पलटकर 'इश्क़-ए-सादिक़ ज़लज़ले से क्यूँ नहीं मिलते

Nityanand Vajpayee

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आप कहते कि उन्नति हुई है फैलती जा रही भुखमरी है आप कहते कि उन्नति हुई है दौर मँहगाइयों का बढ़ा है मौत का भी बिगुल बेसुरा है आर्थिक युद्ध ऐसा अनोखा हर तरफ़ दिख रहा सिर्फ़ धोखा आग सीमाओं पर भी लगी है आप कहते कि उन्नति हुई है रोग बढ़कर मिटाता जनों को बंद भी है सताता जनों को है बुरे हाल में जन सुरक्षा कम हुई राजनीतिक तितिक्षा ऑक्सीजन तलक घट रही है आप कहते कि उन्नति हुई है रोमियो के विरोधी बने तुम लैला मजनूॅं के रोधी बने तुम प्रेम प्रतिबंध तुम ने लगाया कृष्ण राधा तलक को रुलाया इतना प्रतिबन्ध कब लाज़िमी है आप कहते कि उन्नति हुई है नोट-बन्दी ने जनगण हिलाया कालाधन लौट फिर भी न आया आज नीरव व माल्या अडानी लूटते देश का माल पानी झोपडों में ग़रीबी पड़ी है आप कहते कि उन्नति हुई है सब किसानों जवानों दुकानों टपरियों गाँव के घर मकानों टैक्स भरना बहुत है ज़रूरी है विकासों में अब कुछ ही दूरी देवी उत्पाद-शुल्का खड़ी है आप कहते कि उन्नति हुई है दोगुनी आई पाते किसानों वस्तु उत्पाद देती दुकानों टैक्स भरते हुए शौर्यवानों और तलते पकौड़े जवानों सबने ख़ुद ही चुनी बे-बसी है आप कहते कि उन्नति हुई है

Nityanand Vajpayee

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"तन्हाई" मेरी तन्हाई को अंगार बनाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो कितनी मुश्किल से सँभाला है अभी फिर दिल को बीती यादों में रुलाया है अभी फिर दिल को ख़्वाब मिलने का मुझे ऐसे दिखाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो रेत तपती मेरे एहसासों की है धू-धूकर उस पे यादों की अगन जाती जिगर छू-छूकर इस क़दर दिल को मेरे आप जलाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो खिड़कियाँ आप की राहों को निहारा करतीं आहटें आने का जब-जब भी इशारा करतीं मुझ में यूँँ ज्वार मुहब्बत का उठाया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो रोज़ कहते हो कि कल आ के मिलूँगा तुम सेे हो के दुनिया में सफल आ के मिलूँगा तुम सेे अपनी तक़दीर को इतना भी सताया न करो या तो आ जाओ या फिर याद भी आया न करो

Nityanand Vajpayee

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"बाँसुरी" बाँसुरी श्याम की बज उठी है आज यमुना तलक मनचली है राधिका और ललिता विशाखा श्याम सब को मुरलिया सुनाता गोपियों में अजब बेकली है आज यमुना तलक मनचली है बृज निवासी सभी हैं अनोखे प्रेम में खा चुके लाख धोखे आत्मा प्रीति रस में सनी है आज यमुना तलक मनचली है माँ यशोदा तुम्हें हैं बुलाती और नवनीत भी हैं खिलाती कुंभ पर क्यूँ लगे कंकड़ी है आज यमुना तलक मनचली है कालिया नाग की रानियाँ भी गा रहीं कृष्ण की कीर्तियाँ भी कंस की धृष्टता सूखती है आज यमुना तलक मनचली है

Nityanand Vajpayee

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शुभकामनाऍं ईद की बेपनाह ख़ुशियों पर मेरी शुभकामनाऍं स्वीकारो ख़ुश रहो और सब को रहने दो बेवजह ही किसी को मत मारो एक इंसाॅं से दूसरे को यहाँ बस मुहब्बत अता हो बैर हो ख़त्म ऐसे कुछ काम मिल के करते चलो सिर्फ़ नफ़रत को ही न विस्तारो मेरी शुभकामनाऍं स्वीकारो

Nityanand Vajpayee

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