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"आशा का दीप" आशा का दीप जलाना तुम आशा का दीप जलाना तुम आँखों में सपने मर जाए होंठों से गाने छिन जाएँ मंजिल की चाहत में तुम सेे जब ऐसा हो रस्ते छिन जाएँ ऐसे में बस हाथ जोड़कर ईश्वर से आस लगाना तुम आशा का दीप जलाना तुम जब आँखों में सूनापन हो खाली-खाली सा मन हो आँखें आँसू का दरिया ओ मुश्किल में जब जीवन हो जब गीत सुनें हम नफ़रत के तब प्यार के गीत सुनाना तुम आशा का दीप जलाना तुम जब ठोकर साथ निभाती हो मंजिल रस्ता भटकाती हो जब सूरज की किरनें भी एक जुगनू से डर जाती हो जब दुनिया छोड़ के जाती हो बस मुझे छोड़ मत जाना तुम आशा का दीप जलाना तुम जब प्रेम पर लगे पहरे हो नफ़रत के घाव गहरे हो सुख की छाया से कोसों दूर दुख के बादल घनेरे हो जब थककर सोऊँ रातों में मेरे स्वप्न में बस आना तुम आशा का दीप जलाना तुम

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....

Ankit Maurya

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"तुम अकेली नहीं हो सहेली" तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मान कर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम से पहले भी ऐसा ही एक ख़्वाब झूठी तस्सली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो तुम से पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है, शाइ'र हवा की हथेली पे लिखी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सेहरा में रम करने वाला हिरन है शोब्दा शास सुब्हो की पहली किरन है, अदब गाहे उलफ़त का मेमार है और ख़ुद अपने ख़्वाबों का ग़द्दार है वो तो शाइ'र है, शाइ'र को बस फ़िक्र लोह क़लम है, उसे कोई दुख है किसी का न ग़म है, वो तो शाइ'र है, शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से? शाइ'र तो ख़ुद शाह सवार-ए-अज़ल है, उसे किस तरह टाल सकता है कोई कि वो तो अटल है, मैं उसे जानती हूँ सहेली, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारो से वापस पलटते हुए मेरी खुरदरी एड़ियों पे लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुयी शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़् में क़सीदी जिन्हें पढ़के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ, वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली मेरी बात मानो, तुम उसे जानती ही नहीं, वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई, उसी की ही एक नज़्म

Tehzeeb Hafi

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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं

Tehzeeb Hafi

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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ

Faiz Ahmad Faiz

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