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अब न कोई फ़रिश्ता आएगा जो हम को तुम को बचायेगा नैतिकता का पाठ पढ़ायेगा अब न उतरेगी आसमानों से कोई रूहानी किताब जो किताबें हैं हमारे पास उन्हीं से काम चलाना होगा हमें अपने अंदर से ही फ़रिश्ता बाहर लाना होगा

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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं

Tehzeeb Hafi

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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"मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं" मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है

Ammar Iqbal

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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये

Rakesh Mahadiuree

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तुम्हीं दिल तुम्हीं धड़कन तुम्हीं साँस हो तुम्हीं तड़पन तुम्हीं से दिन तुम्हीं से रात तुम्हीं मेरी दुनिया तुम्हीं मेरी काइ‌नात तुम्हीं ज़मीं तुम्हीं आसमाँ तुम्हीं मेरा पूरा जहाँ तुम्हीं मंज़िल तुम्हीं रास्ता दुनिया से नहीं कोई वास्ता खो कर ख़ुद को पा लिया है तुझे चाहूँ हर जनम में रब से तुझे

Kumar Rishi

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तुझ में बीते दिन तुझ में बीतीं रातें मेरा ये जीवन तेरी सौगातें सुब्ह की धूप रात की चाँदनी जीवन की डोर तुझी से बाँधनी तुझ सेे शुरू ज़िन्दगी तुझ पे खतम जब तू है साथ फिर ना कोई ग़म ये चार पल का फसाना आना और जाना तुम सेे दिल लगाना रूठना और मनाना चाहतों की कहानी सुन ले मेरी ज़ुबानी तोड़ना फिर जोड़ना मुझ सेे मुँह ना मोड़ना

Kumar Rishi

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ऐ दिल रूक जा थम जा ठहर जा सब्र कर धीरज धर मंज़िल अभी दूर है रास्तों का मज़ा ले यूँँ न ख़ुद को सज़ा दे बस चला चल रूक मत पीछे मत देख जो छूट गया सो छूट गया जो रूठ गया सो रूठ गया बीती बातें भुलाता चल ऐ दिल बस चला चल तेरा वास्ता तेरी मंज़िल से है तेरा ख़ुदा तेरे अंदर है कर उस पर भरोसा बस चला चल बस चला चल

Kumar Rishi

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एक ही सिगरेट से कश लगाते रहे हम दोनों कभी ग़म के तो कभी ख़ुशी के तराने गुनगुनाते रहे हम दोनों तुम्हारे सुर्ख़ गुलाबी लबों पर सिगरेट ऐसे सजती है दिल में मानो हमारे जैसे बाँसुरी बजती है सिगरेट ना हो जैसे कोई गुलाब हो जो तुम ने चूमा है गर्मी के मौसम में भी आज बादल झूमा है तुम्हारे लबों से निकलता जो धुआँ है हमारे लबों को इसने बे-हिसाब छुआ है तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू इस के साथ आई है ना जाने ये कैसी मदहोशी हम पर छाई है बस यूँँ हीं हमारी गोद में बैठी रहो तुम अब कभी हम कश लगाएं कभी तुम कश ये सिगरेट यूँँ हीं सुलगती रहे दिलों में आग यूँँ हीं जलती रहे तुम्हारे इन नर्म गुलाबी होंठो को छू कर सिगरेट बड़ा इतराती है हमारी ओर देख कर हम को बड़ा चिढ़ाती है मग़र सिगरेट की ज़िंदा-दिली देखिए तुम्हारे होंठों से निकलकर हमारे होंठो पे भी आ जाती है!!

Kumar Rishi

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एक ही सिगरेट से कश लगाते रहे हम दोनों कभी ग़म के तो कभी ख़ुशी के तराने गुनगुनाते रहे हम दोनों तुम्हारे सुर्ख़ गुलाबी लबों पर सिगरेट ऐसे सजती है दिल में मानो हमारे जैसे बाँसुरी बजती है सिगरेट ना हो जैसे कोई गुलाब हो जो तुम ने चूमा है गर्मी के मौसम में भी आज बादल झूमा है तुम्हारे लबों से निकलता जो धुआँ है हमारे लबों को इसने बे-हिसाब छुआ है तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू इस के साथ आई है ना जाने ये कैसी मदहोशी हम पर छाई है बस यूँँ हीं हमारी गोद में बैठी रहो तुम अब कभी हम कश लगाएं कभी तुम कश ये सिगरेट यूँँ हीं सुलगती रहे दिलों में आग यूँँ हीं जलती रहे तुम्हारे इन नर्म गुलाबी होंठो को छू कर सिगरेट बड़ा इतराती है हमारी ओर देख कर हम को बड़ा चिढ़ाती है मग़र सिगरेट की ज़िंदा-दिली देखिए तुम्हारे होंठों से निकलकर हमारे होंठो पे भी आ जाती है!!

Kumar Rishi

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