nazmKuch Alfaaz

एक ही सिगरेट से कश लगाते रहे हम दोनों कभी ग़म के तो कभी ख़ुशी के तराने गुनगुनाते रहे हम दोनों तुम्हारे सुर्ख़ गुलाबी लबों पर सिगरेट ऐसे सजती है दिल में मानो हमारे जैसे बाँसुरी बजती है सिगरेट ना हो जैसे कोई गुलाब हो जो तुम ने चूमा है गर्मी के मौसम में भी आज बादल झूमा है तुम्हारे लबों से निकलता जो धुआँ है हमारे लबों को इसने बे-हिसाब छुआ है तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू इस के साथ आई है ना जाने ये कैसी मदहोशी हम पर छाई है बस यूँँ हीं हमारी गोद में बैठी रहो तुम अब कभी हम कश लगाएं कभी तुम कश ये सिगरेट यूँँ हीं सुलगती रहे दिलों में आग यूँँ हीं जलती रहे तुम्हारे इन नर्म गुलाबी होंठो को छू कर सिगरेट बड़ा इतराती है हमारी ओर देख कर हम को बड़ा चिढ़ाती है मग़र सिगरेट की ज़िंदा-दिली देखिए तुम्हारे होंठों से निकलकर हमारे होंठो पे भी आ जाती है!!

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा

Rakesh Mahadiuree

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ऐ दिल रूक जा थम जा ठहर जा सब्र कर धीरज धर मंज़िल अभी दूर है रास्तों का मज़ा ले यूँँ न ख़ुद को सज़ा दे बस चला चल रूक मत पीछे मत देख जो छूट गया सो छूट गया जो रूठ गया सो रूठ गया बीती बातें भुलाता चल ऐ दिल बस चला चल तेरा वास्ता तेरी मंज़िल से है तेरा ख़ुदा तेरे अंदर है कर उस पर भरोसा बस चला चल बस चला चल

Kumar Rishi

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मर जाते हैं हमारी आँखों के सामने हम जिन्हें चाहते हैं जान से ज़्यादा और हम बस देखते ही रह जाते हैं कुछ नहीं कर पाते हैं किसी के माँ बाप किसी के भाई बहन किसी की पत्नी किसी का पति किसी के यार दोस्त सगे सम्बन्धी सब हमारी ही आँखों के सामने ख़त्म हुए चले जा रहे हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं और क्या दुख चाहिए इंसान को इस दुनिया में जो कहते हैं ख़ुद को इस धरती का सब सेे ताकतवर इंसान रोक के दिखा दे एक भी मौत जो अचानक छीन लेती हे प्राण एक नेक इंसान के।

Kumar Rishi

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चल स्टेशन घूमने चलते हैं कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ हम किसी के क्या लगते हैं करेंगे अपनी मनमानी कभी इस प्लेटफार्म पर तो कभी उस प्लेटफार्म पर बैठेंगे पिएँगे गरम चाय गरम समोसे खाएंगे देखेंगे आती जाती ट्रेनों को चढ़ते उतरते मुसाफ़िरों को सुनेंगे कुली की आवाज़ों को देखेंगे ट्रैक पर घूमते आवारा कुत्तों को सुनेंगे रेलगाड़ी की सूचनाओं को पढ़ेंगे लोगों के चेहरे उन की भावनाओं को दृश्य बड़े ही रोचक होते हैं स्टेशन के ज़िन्दगी के हर हाल को दर्शाते हैं जगह-जगह से यात्री यहाँ आते हैं हम भी तो यात्री ही हैं इस दुनिया में बस इस की ट्रेन कभी लेट नहीं होती एक दम समय पर है आती रेलवे जैसी उदघोषणा नहीं करती मग़र काश करती तो कुछ ज़रूरी काम निपटा जाते जो हमारे जाने के बा'द छूट जाते हैं चल स्टेशन घूमने चलते हैं कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ हम किसी के क्या लगते हैं

Kumar Rishi

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मुझे मालूम है जब पहली बार उसे छुऊँगा तो हाथ कापेंगे मेरे जिस्म में एक अजीब सा कम्पन्न महसूस होगा दिल की धड़कन थोड़ी बढ़ जाएगी कदम पीछे धकेलेंगे मुझ को साँसें तेज हो जायेंगी मग़र फिर भी मेरे सख़्त हाथ उस के नर्म गालों को छू कर ही दम लेंगे ऐसा मुझे यक़ीं है और कहीं उसे भी!!!

Kumar Rishi

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तुझ में बीते दिन तुझ में बीतीं रातें मेरा ये जीवन तेरी सौगातें सुब्ह की धूप रात की चाँदनी जीवन की डोर तुझी से बाँधनी तुझ सेे शुरू ज़िन्दगी तुझ पे खतम जब तू है साथ फिर ना कोई ग़म ये चार पल का फसाना आना और जाना तुम सेे दिल लगाना रूठना और मनाना चाहतों की कहानी सुन ले मेरी ज़ुबानी तोड़ना फिर जोड़ना मुझ सेे मुँह ना मोड़ना

Kumar Rishi

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