ये कैसी लज़्ज़त से जिस्म शल हो रहा है मेरा ये क्या मज़ा है कि जिस से है उज़्व उज़्व बोझल ये कैफ़ क्या है कि साँस रुक रुक के आ रहा है ये मेरी आँखों में कैसे शहवत-भरे अँधेरे उतर रहे हैं लहू के गुम्बद में कोई दर है कि वा हुआ है ये छूटती नब्ज़, रुकती धड़कन, ये हिचकियाँ सी गुलाब ओ काफ़ूर की लपट तेज़ हो गई है ये आबनूसी बदन, ये बाज़ू, कुशादा सीना मिरे लहू में सिमटता सय्याल एक नुक्ते पे आ गया है मिरी नसें आने वाले लम्हे के ध्यान से खिंच के रह गई हैं बस अब तो सरका दो रुख़ पे चादर दिए बुझा दो
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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ज़बानों के रस में ये कैसी महक है ये बोसा कि जिस से मोहब्बत की सहबा की उड़ती है ख़ुश्बू ये बद-मस्त ख़ुश्बू जो गहरा ग़ुनूदा नशा ला रही है ये कैसा नशा है मेरे ज़ेहन के रेज़े रेज़े में एक आँख सी खुल गई है तुम अपनी ज़बाँ मेरे मुँह में रखे जैसे पाताल से मेरी जाँ खींचते हो ये भीगा हुआ गर्म ओ तारीक बोसा अमावस की काली बरसती हुई रात जैसे उमड़ती चली आ रही है कहीं कोई साअत अज़ल से रमीदा मिरी रूह के दश्त में उड़ रही थी वो साअत क़रीं-तर चली आ रही है मुझे ऐसा लगता है तारीकियों के लरज़ते हुए पुल को मैं पार करती चली जा रही हूँ ये पुल ख़त्म होने को है और अब उस के आगे कहीं रौशनी है
Fahmida Riaz
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लाओ हाथ अपना लाओ ज़रा छू के मेरा बदन अपने बच्चे के दिल का धड़कना सुनो नाफ़ के उस तरफ़ उस की जुम्बिश को महसूस करते हो तुम बस यहीं छोड़ दो थोड़ी देर और उस हाथ को मेरे ठंडे बदन पर यहीं छोड़ दो मेरे बे-कल नफ़स को क़रार आ गया मेरे ईसा मिरे दर्द के चारा-गर मेरा हर मू-ए-तन उस हथेली से तस्कीन पाने लगा उस हथेली के नीचे मिरा लाल करवट सी लेने लगा उँगलियों से बदन उस का पहचान लो तुम उसे जान लो चूमने दो मुझे अपनी ये उँगलियाँ उन की हर पोर को चूमने दो मुझे नाख़ुनों को लबों से लगा लूँ ज़रा फूल लाती हुई ये हरी उँगलियाँ मेरी आँखों से आँसू उबलते हुए उन से सींचूँगी में फूल लाती हुई उँगलियों की जड़ें चूमने दो मुझे अपने बाल अपने माथे का चाँद अपने लब ये चमकती हुई काली आँखें मिरे काँपते होंट मेरी छलकती हुई आँख को देख कर कितनी हैरान हैं तुम को मा'लूम क्या तुम को मा'लूम क्या तुम ने जाने मुझे क्या से क्या कर दिया मेरे अंदर अँधेरे का आसेब था या कराँ ता कराँ एक अनमिट ख़ला यूँँही फिरती थी मैं ज़ीस्त के ज़ाइक़े को तरसती हुई दिल में आँसू भरे सब पे हँसती हुई तुम ने अंदर मिरा इस तरह भर दिया फूटती है मिरे जिस्म से रौशनी सब मुक़द्दस किताबें जो नाज़िल हुईं सब पयम्बर जो अब तक उतारे गए सब फ़रिश्ते कि हैं बादलों से परे रंग संगीत सर फूल कलियाँ शजर सुब्ह-दम पेड़ की झूमती डालियाँ उन के मफ़्हूम जो भी बताए गए ख़ाक पर बसने वाले बशर को मसर्रत के जितने भी नग़्में सुनाए गए सब ऋषी सब मुनी अंबिया औलिया ख़ैर के देवता हुस्न नेकी ख़ुदा आज सब पर मुझे ए'तिबार आ गया ए'तिबार आ गया
Fahmida Riaz
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ऐ दिल-ए-काफ़िर इज्ज़ से मुनकिर आज तिरा सर ख़म क्यूँँ है तेरी हटेली शिरयानों में ये बेबस मातम क्यूँँ है आँख तो रोना भूल गई थी फिर हर मंज़र नम क्यूँँ है मत रोको बहने दो आँसू किसी को करते हैं प्रणाम आप झुका है झुकने दो सर छुपा था उस में कोई सलाम शायद उस के हुज़ूर में हो तुम जिस को कहते हैं अंजाम वो हस्ती की सरहद-ए-आख़िर हुआ जहाँ हर सफ़र तमाम बेबस है इंसाँ बेबस है तकती रह गई रोती शाम उठ गया कोई भरी दुनिया से बाक़ी रहे ख़ुदा का नाम या फिर काग़ज़ पर परछाईं मिलेगा जिस को सब्त-ए-दवाम ये टुकड़े इंसानी दिल के शाएर और शाएर का कलाम नाज़ करूँँगी ख़ुश-बख़्ती में मैं ने 'फ़िराक़' को देखा था उजड़े घर में वो तहज़ीबों के संगम पर बैठा था गर्म हम-आग़ोशी सदियों की होगी कितनी प्यार भरी जिस की बाँहों में खेली थी उस की सोच की सुंदरता शे'र का दिल शफ़्फ़ाफ़ था इतना जैसे आईना-ए-तारीख़ क्या भर पूर विसाल था जिस ने उस शाएर को जन्म दिया गर तारीख़ ने पागल हो कर ख़ुद अपना सर फोड़ा है ख़ून उछाला है गलियों में अपना हंडोला तोड़ा है छींट न थी दामन पर उस के कौन घाट धो बैठा था जिसे समझते हो ना-मुम्किन वो उस इंसाँ जैसा था इंसाँ भी इतना मामूली जैसे अपना हम-साया अपने शे'र सुनाना उस का और ख़ुद हैराँ हो जाना बातों में मासूम महक थी आँखों में बेचैन लपक ख़ामोशी के वक़्फ़े यूँँ जैसे उस ने कुछ देखा था पीड़ बहुत झेली थी उस ने इतनी बात तो ज़ाहिर थी लहजा में शोख़ी थी जैसे राख में चमके अँगारा संगम के पानी पर मैं ने देखी थी कैसी तस्वीर उड़ा लहक कर इक जल-पंछी खींच गया पानी पे लकीर जमुना की नीली गहराई भेद भरी चुप से बोझल गँगा के धारे की जुम्बिश उजली ताक़त और बे-कल इस पानी में अक्स डालता आसमान का इक टुकड़ा मिट्टी के बुत हरे नारियल चंदन लगा कोई मुखड़ा वो धारों पर नाव खेता सूखा पंजर माँझी का दान के पैसे गिनता पंडित ताँबा सूरज सांझी का जमुना पर मीनार क़िला के गुम्बद का तिरछा साया पाकिस्तान से आए मुहाजिर गेंदे की टूटी माला पानी में चप्पू की शप शप बातों के टूटे टुकड़े यहीं कहीं पर हम से ओझल सरस्वती भी बहती है जो समझी जो आगे समझूँ छलक रहा है दिल का जाम वो मंज़र जो ख़ुद से बड़ा था उस का घेरा तुम्हारे नाम ये कमरे का माँद उजाला बाहर हूक पपिहे की खिड़की पर बूँदों की दस्तक साँसें भरती ख़ामोशी पूरी बात नहीं बतलाता गूँगे आँसू रो देना तेरी धरती सह न सकेगी इतने हुस्न को खो देना तन्हा और अपाहिज बूढ़े तुझे न मरने देंगे लोग अभी तो जीवन बाँझ नहीं है फिर तुझ को जन्मेंगे लोग
Fahmida Riaz
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मैं आज़िम-ए-मय-ख़ाना थी कल रात कि देखा इक कूचा-ए-पुर-शोर में असहाब-ए-तरीक़त थे दस्त ओ गिरेबाँ ख़ाकम-ब-दहन पेच अमामों के खुले थे फ़तवों की वो बोछाड़ कि तबक़ात थे लर्ज़ां दास्तान-ए-मुबारक में थीं रीशान-ए-मुबारक मू-हा-ए-मुबारक थे फ़ज़ाओं में परेशाँ कहते थे वो बाहम कि हरीफ़ान-ए-सियह-रू कुफ़्फ़ार हैं बद-ख़ू ज़िंदीक़ हैं मलऊन हैं बनते हैं मुसलमाँ हातिफ़ ने कहा रो के कि ऐ रब्ब-ए-समावात! ला-रेब सरासर हैं बजा दोनों के फ़तवात ख़िल्क़त है बहुत उन के अज़ाबों से हिरासाँ अब उन की हों अमवात!
Fahmida Riaz
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दिल में कब से रिम-झिम करती कैसी बरखा बरस रही है इस बरखा के अमृत रस से भीग चुकी मैं भीग चुकी मैं लगती छुपती धूप और बादल ये आकाश के नन्हे बालक खेल रहे हैं हँसते हँसते किलकारी भरते सब्ज़े को शोख़ हवाएँ छेड़ रही हैं मैं भी अपने पँख झटक कर पर ताैलूँ और भरूँ उड़ानें अपने बदन में ख़ुद खो जाऊँ ये तन का आकाश ये धरती धीरे धीरे फैल रही है और मेरे हाथों के पखेरू ये चंचल बेचैन परिंदे एक अनोखे राज़ से बे-कल धरती में कुछ ढूँड रहे हैं ढूँड रहे हैं ऐसे पल को जिस की खोज में दिल रहता है जिस पल धरती मिले गगन से वो पल मेरे तन के बाहर कहीं नहीं है कहीं नहीं है ये पंछी ये नर्म पखेरू जन्मों से धरती के संगी इस काया के ताल किनारे धीरे धीरे ढूँड रहे हैं खोए हुए पल की कंकरियाँ
Fahmida Riaz
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