nazmKuch Alfaaz

अबकी पढ़ना तो अखबार पीछे से पढ़ना शायद कुछ काम की चीज़ पढ़ने को मिल जाए खेलों की दुनिया से कोई ख़बर मिल जाए मुख्य पृष्ठ तो डराने के लिए ही छपता हो जैसे दुनिया ही ख़त्म हो जाएगी लगता हो जैसे जो घटना है वो तो है घटना जीवन कैसा हो हम को है चुनना तो बस इतना ही करना अबकी पढ़ना तो अखबार पीछे से पढ़ना

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....

Ankit Maurya

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चल स्टेशन घूमने चलते हैं कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ हम किसी के क्या लगते हैं करेंगे अपनी मनमानी कभी इस प्लेटफार्म पर तो कभी उस प्लेटफार्म पर बैठेंगे पिएँगे गरम चाय गरम समोसे खाएंगे देखेंगे आती जाती ट्रेनों को चढ़ते उतरते मुसाफ़िरों को सुनेंगे कुली की आवाज़ों को देखेंगे ट्रैक पर घूमते आवारा कुत्तों को सुनेंगे रेलगाड़ी की सूचनाओं को पढ़ेंगे लोगों के चेहरे उन की भावनाओं को दृश्य बड़े ही रोचक होते हैं स्टेशन के ज़िन्दगी के हर हाल को दर्शाते हैं जगह-जगह से यात्री यहाँ आते हैं हम भी तो यात्री ही हैं इस दुनिया में बस इस की ट्रेन कभी लेट नहीं होती एक दम समय पर है आती रेलवे जैसी उदघोषणा नहीं करती मग़र काश करती तो कुछ ज़रूरी काम निपटा जाते जो हमारे जाने के बा'द छूट जाते हैं चल स्टेशन घूमने चलते हैं कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ हम किसी के क्या लगते हैं

Kumar Rishi

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तुझ में बीते दिन तुझ में बीतीं रातें मेरा ये जीवन तेरी सौगातें सुब्ह की धूप रात की चाँदनी जीवन की डोर तुझी से बाँधनी तुझ सेे शुरू ज़िन्दगी तुझ पे खतम जब तू है साथ फिर ना कोई ग़म ये चार पल का फसाना आना और जाना तुम सेे दिल लगाना रूठना और मनाना चाहतों की कहानी सुन ले मेरी ज़ुबानी तोड़ना फिर जोड़ना मुझ सेे मुँह ना मोड़ना

Kumar Rishi

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मर जाते हैं हमारी आँखों के सामने हम जिन्हें चाहते हैं जान से ज़्यादा और हम बस देखते ही रह जाते हैं कुछ नहीं कर पाते हैं किसी के माँ बाप किसी के भाई बहन किसी की पत्नी किसी का पति किसी के यार दोस्त सगे सम्बन्धी सब हमारी ही आँखों के सामने ख़त्म हुए चले जा रहे हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं और क्या दुख चाहिए इंसान को इस दुनिया में जो कहते हैं ख़ुद को इस धरती का सब सेे ताकतवर इंसान रोक के दिखा दे एक भी मौत जो अचानक छीन लेती हे प्राण एक नेक इंसान के।

Kumar Rishi

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मुझे मालूम है जब पहली बार उसे छुऊँगा तो हाथ कापेंगे मेरे जिस्म में एक अजीब सा कम्पन्न महसूस होगा दिल की धड़कन थोड़ी बढ़ जाएगी कदम पीछे धकेलेंगे मुझ को साँसें तेज हो जायेंगी मग़र फिर भी मेरे सख़्त हाथ उस के नर्म गालों को छू कर ही दम लेंगे ऐसा मुझे यक़ीं है और कहीं उसे भी!!!

Kumar Rishi

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ऐ दिल रूक जा थम जा ठहर जा सब्र कर धीरज धर मंज़िल अभी दूर है रास्तों का मज़ा ले यूँँ न ख़ुद को सज़ा दे बस चला चल रूक मत पीछे मत देख जो छूट गया सो छूट गया जो रूठ गया सो रूठ गया बीती बातें भुलाता चल ऐ दिल बस चला चल तेरा वास्ता तेरी मंज़िल से है तेरा ख़ुदा तेरे अंदर है कर उस पर भरोसा बस चला चल बस चला चल

Kumar Rishi

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