nazmKuch Alfaaz

तमाम उम्र के सूद ओ ज़ियाँ का बार लिए? हर इंक़लाब ज़माने से मुँह छुपाए हुए हयात ओ मर्ग की सरहद पे नीम-ख़्वाबीदा मैं मुंतज़िर था मसर्रत की कोई धुँदली किरन ज़माँ मकाँ से परे अजनबी जज़ीरों से दम-ए-सहर मुझे ख़्वाबों में ढूँडती आए फ़िशार-ए-वक़्त की सरहद से दूर ले जाए खुली जो आँख तुलू-ए-सहर ने हँस के कहा हिसार-ए-वक़्त से आगे कोई मक़ाम नहीं समझ सको, तो ज़मान ओ मकाँ की क़ैद नहीं समझ सको तो यही ज़ात बे-कराँ भी है

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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रात भर नर्म हवाओं के झोंके वक़्त की मौज रवाँ पर बहते तेरी यादों के सफ़ीने लाए कि जज़ीरों से निकल कर आए गुज़रा वक़्त का दामन था में तिरी यादें तिरे ग़म के साए एक इक हर्फ़-ए-वफ़ा की ख़ुश्बू मौजा-ए-गुल में सिमट कर आए एक इक अहद-ए-वफ़ा का मंज़र ख़्वाब की तरह गुज़रते बादल तेरी क़ुर्बत के महकते हुए पल मेरे दामन से लिपटने आए नींद के बार से बोझल आँखें गर्द-ए-अय्याम से धुँदलाए हुए एक इक नक़्श को हैरत से तकें लेकिन अब उन से मुझे क्या लेना मेरे किस काम के ये नज़राने एक छोड़ी हुई दुनिया के सफ़ीर मेरे ग़म-ख़ाने में फिर क्यूँँ आए दर्द का रिश्ता रिफ़ाक़त की लगन रूह की प्यास मोहब्बत के चलन मैं ने मुँह मोड़ लिया है सब से मैं ने दुनिया के तक़ाज़े समझे अब मेरे पास कोई क्यूँँ आए रात भर नौहा-कुनाँ याद की बिफरी मौजें मेरे ख़ामोश दर ओ बाम से टकराती हैं मेरे सीने के हर इक ज़ख़्म को सहलाती है मुझे एहसास की उस मौत पर सह दे कर सुब्ह के साथ निगूँ सार पलट जाती है

Mahmood Ayaz

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खुली आँखों को कोई बंद कर दो खुली आँखों की वीरानी से हौल आता है कोई इन खुली आँखों को बढ़ कर बंद कर दो ये आँखें इक अनोखी यख़-ज़दा दुनिया की साकित रौशनी में खो गई हैं अब इन आँखों में कोई रंग पैदा है न कोई रंग पिन्हाँ है न कोई अक्स-ए-गुल-बन है न कोई दाग़-ए-हिर्मां है न गंज-ए-शाएगाँ की आरज़ू-ए-बे-निहायत है न रंज-ए-राएगाँ का अक्स-ए-लर्ज़ां है अगर कुछ है तो बस इक यख़-ज़दा नया का नक़्श-ए-जावेदाँ है ये आँखें अब शुआ-ए-आरज़ू की हर किरन से यूँँ गुरेज़ाँ हैं कि पत्थर बन गई हैं ये आँखें मर गई हैं

Mahmood Ayaz

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तुम ने मुझ से कोई इक़रार‌‌‌‌-ए-रिफ़ाक़त न किया ये न कहा तुम से बिछड़ जाऊँ तो ज़िंदा न रहूँ मैं ने तुम्हें ज़ीस्त का सरमाया मिरा हासिल-ए-यक-उम्र-ए-तमन्ना न कहा इस क़दर झूट से दहशत-ज़दा थे हम कि कोई सच न कहा मैं ने बस इतना कहा देखो हम और तुम इस आग का हिस्सा हैं जो ख़ाशाक की मानिंद जलाती है हमें तुम ने बस इतना कहा देखो इस आग में हम दोनों अकेले भी हैं साथी भी हैं और हम करते रहे उम्र-ए-मह-ओ-साल के ज़ख़्मों का शुमार कहकशाँ फीकी है कुछ देर का मेहमान है चाँद डूबती रात में ढलते हुए साए चुप हैं मेरी शिरयानों में यख़-बस्ता लहू हैराँ है अव्वलीं क़ुर्ब की ये आँच कहाँ से आई अजनबी कैसे कहूँ तुम तो मिरे दिल के निहाँ-ख़ाने में सोए हुए हर ख़्वाब का चेहरा निकले

Mahmood Ayaz

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यूँँ रग ओ पय में अजल उतरी है हाथ साकित हैं दुआ क्या माँगे आँख ख़ामोश है, क्या देखेगी होंट ख़्वाबीदा हैं क्या बोलेंगे एक सन्नाटा अबद-ताबा-अबद जोहद-ए-यक-उम्र का हासिल ठहरे दर्द का शो'ला रग-ए-जाँ का लहू जिंस-ए-बे-माया थे बे-माया रहे तीरा ख़ाक उन की ख़रीदार बने निकहत-ए-गुल की तरह आवारा बू-ए-जाँ वुसअत-ए-आफ़ाक़ में गुम यक कफ़-ए-ख़ाक है वो भी कब तक? सुब्ह की ओस से आँखें धो लो कमरे से झाँक के बाहर देखो ऐसे मसरूफ़ तग-ओ-ताज़ हैं सब जैसे कल उन के मुक़द्दर में नहीं मैं तमाशाई हूँ हर मंज़र का जैसे कल मेरे मुक़द्दर में नहीं

Mahmood Ayaz

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गुज़रे हुए माह ओ साल के ग़म तन्हाई शब में जाग उट्ठे हैं उम्र-ए-रफ़्ता की जुस्तुजू में अश्कों के चराग़ जल रहे हैं आसाइश-ए-ज़िंदगी की हसरत माज़ी का नक़्श बन चुकी है हालात की ना-गुज़ीर तल्ख़ी एक एक नफ़स में बस गई है नाकामी-ए-आरज़ू को दिल ने तस्लीम ओ रज़ा के नाम बख़्शे मिलने की ख़ुशी बिछड़ने का ग़म क्या क्या थे फ़रेब-ए-ज़िंदगी के इक उम्र में अब समझ सके हैं ख़ुशियों का फ़ुसूँ गुरेज़ पा है अब तर्क दुआ की मंज़िलें हैं दामान-ए-तलब सिमट चुका है नाकामी-ए-शौक़ मिटते मिटते जीने का शुऊर दे गई है ये ग़म है नवाए शब का हासिल ये दर्द मता-ए-ज़िंदगी है उजड़ी हुई हर रविश चमन की देती है सुराग़ रंग ओ बू का वीरान हैं ज़िंदगी की राहें रौशन है चराग़ आरज़ू का

Mahmood Ayaz

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