यूँँ रग ओ पय में अजल उतरी है हाथ साकित हैं दुआ क्या माँगे आँख ख़ामोश है, क्या देखेगी होंट ख़्वाबीदा हैं क्या बोलेंगे एक सन्नाटा अबद-ताबा-अबद जोहद-ए-यक-उम्र का हासिल ठहरे दर्द का शो'ला रग-ए-जाँ का लहू जिंस-ए-बे-माया थे बे-माया रहे तीरा ख़ाक उन की ख़रीदार बने निकहत-ए-गुल की तरह आवारा बू-ए-जाँ वुसअत-ए-आफ़ाक़ में गुम यक कफ़-ए-ख़ाक है वो भी कब तक? सुब्ह की ओस से आँखें धो लो कमरे से झाँक के बाहर देखो ऐसे मसरूफ़ तग-ओ-ताज़ हैं सब जैसे कल उन के मुक़द्दर में नहीं मैं तमाशाई हूँ हर मंज़र का जैसे कल मेरे मुक़द्दर में नहीं
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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खुली आँखों को कोई बंद कर दो खुली आँखों की वीरानी से हौल आता है कोई इन खुली आँखों को बढ़ कर बंद कर दो ये आँखें इक अनोखी यख़-ज़दा दुनिया की साकित रौशनी में खो गई हैं अब इन आँखों में कोई रंग पैदा है न कोई रंग पिन्हाँ है न कोई अक्स-ए-गुल-बन है न कोई दाग़-ए-हिर्मां है न गंज-ए-शाएगाँ की आरज़ू-ए-बे-निहायत है न रंज-ए-राएगाँ का अक्स-ए-लर्ज़ां है अगर कुछ है तो बस इक यख़-ज़दा नया का नक़्श-ए-जावेदाँ है ये आँखें अब शुआ-ए-आरज़ू की हर किरन से यूँँ गुरेज़ाँ हैं कि पत्थर बन गई हैं ये आँखें मर गई हैं
Mahmood Ayaz
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सारे अफ़्क़ार-ओ-अक़ाएद के तिलिस्म सारे असनाम-ए-ख़याल हम ने वो बुत-शिकनी की है कि मिस्मार हैं सब अपने घर बार की महफ़ूज़ फ़सीलें हम ने यूँँ गिराई हैं कि अब दूर-ओ-नज़दीक की हर तुंद हवा सब चराग़ों को बस इक फूँक में गुल कर जाए हम कि हर सिलसिला-ओ-क़ैद की ज़ंजीर से आज़ाद हुए ऐसे मज्लिस के मकीं हैं कि जहाँ कोई दरवाज़ा कोई रौज़न-ए-दीवार नहीं या ख़ुदा कोई ग़म ऐसा कि हर ग़म को सुबुकसार करे कोई आग ऐसी कि हर आग को ख़ाशाक करे कोई मफ़्हूम कोई नक़्श-ए-तमन्ना कि जिसे अपने दिल-ओ-जाँ का लहू नज़्र करूँँ सुर्ख़-रू हो के कहूँ ज़ीस्त की ये मोहलत दो-एक नफ़स इतनी बे-रंग न थी इतनी फ़रोमाया न थी
Mahmood Ayaz
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रात भर नर्म हवाओं के झोंके वक़्त की मौज रवाँ पर बहते तेरी यादों के सफ़ीने लाए कि जज़ीरों से निकल कर आए गुज़रा वक़्त का दामन था में तिरी यादें तिरे ग़म के साए एक इक हर्फ़-ए-वफ़ा की ख़ुश्बू मौजा-ए-गुल में सिमट कर आए एक इक अहद-ए-वफ़ा का मंज़र ख़्वाब की तरह गुज़रते बादल तेरी क़ुर्बत के महकते हुए पल मेरे दामन से लिपटने आए नींद के बार से बोझल आँखें गर्द-ए-अय्याम से धुँदलाए हुए एक इक नक़्श को हैरत से तकें लेकिन अब उन से मुझे क्या लेना मेरे किस काम के ये नज़राने एक छोड़ी हुई दुनिया के सफ़ीर मेरे ग़म-ख़ाने में फिर क्यूँँ आए दर्द का रिश्ता रिफ़ाक़त की लगन रूह की प्यास मोहब्बत के चलन मैं ने मुँह मोड़ लिया है सब से मैं ने दुनिया के तक़ाज़े समझे अब मेरे पास कोई क्यूँँ आए रात भर नौहा-कुनाँ याद की बिफरी मौजें मेरे ख़ामोश दर ओ बाम से टकराती हैं मेरे सीने के हर इक ज़ख़्म को सहलाती है मुझे एहसास की उस मौत पर सह दे कर सुब्ह के साथ निगूँ सार पलट जाती है
Mahmood Ayaz
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तमाम उम्र के सूद ओ ज़ियाँ का बार लिए? हर इंक़लाब ज़माने से मुँह छुपाए हुए हयात ओ मर्ग की सरहद पे नीम-ख़्वाबीदा मैं मुंतज़िर था मसर्रत की कोई धुँदली किरन ज़माँ मकाँ से परे अजनबी जज़ीरों से दम-ए-सहर मुझे ख़्वाबों में ढूँडती आए फ़िशार-ए-वक़्त की सरहद से दूर ले जाए खुली जो आँख तुलू-ए-सहर ने हँस के कहा हिसार-ए-वक़्त से आगे कोई मक़ाम नहीं समझ सको, तो ज़मान ओ मकाँ की क़ैद नहीं समझ सको तो यही ज़ात बे-कराँ भी है
Mahmood Ayaz
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तुम ने मुझ से कोई इक़रार-ए-रिफ़ाक़त न किया ये न कहा तुम से बिछड़ जाऊँ तो ज़िंदा न रहूँ मैं ने तुम्हें ज़ीस्त का सरमाया मिरा हासिल-ए-यक-उम्र-ए-तमन्ना न कहा इस क़दर झूट से दहशत-ज़दा थे हम कि कोई सच न कहा मैं ने बस इतना कहा देखो हम और तुम इस आग का हिस्सा हैं जो ख़ाशाक की मानिंद जलाती है हमें तुम ने बस इतना कहा देखो इस आग में हम दोनों अकेले भी हैं साथी भी हैं और हम करते रहे उम्र-ए-मह-ओ-साल के ज़ख़्मों का शुमार कहकशाँ फीकी है कुछ देर का मेहमान है चाँद डूबती रात में ढलते हुए साए चुप हैं मेरी शिरयानों में यख़-बस्ता लहू हैराँ है अव्वलीं क़ुर्ब की ये आँच कहाँ से आई अजनबी कैसे कहूँ तुम तो मिरे दिल के निहाँ-ख़ाने में सोए हुए हर ख़्वाब का चेहरा निकले
Mahmood Ayaz
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