"ऐसा ज़रूरी तो नहीं" तुम दिल की धड़कन हो मरता हूँ तेरी हर अदा पर तू ख़ूब-सूरत ही हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं मैं चाहता हूँ तुझ को और रहोगी हमेशा मेरे दिल में बदले में तू भी मुझ को चाहे ऐसा ज़रूरी तो नहीं दिल नहीं लगता तुम्हारे बिना माना कि जिक्र नहीं करता पर तुम सेे मोहब्बत न हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं बात हो भी जाए फिर भी तुम्हारी याद बहुत आती है तुम बिछर कर ही याद आओ ऐसा ज़रूरी तो नहीं एक दिन रच दूँगा इतिहास तेरी यादों के सहारे तू हर बार साथ ही रहे ऐसा ज़रूरी तो नहीं
Related Nazm
मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
52 likes
"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
46 likes
क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
42 likes
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
Kaifi Azmi
37 likes
"मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम" मेरी शोहरत मेरा डंका मेरे ए'जाज़ का सुन कर कभी ये न समझ लेना मैं चोटी का लिखारी हूँ मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ मेरी आरत पे बरसों से जो महँगे दाम बिकता है वो तेरे ग़म का सौदा है तेरी आँखें तेरे आँसू तेरी चाहत तेरे जज़्बे यहाँ सेल्फों पे रखे हैं वही तो मैं ने बेचे हैं तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है मगर क्यूँँ मुझ को लगता है मेरे अंदर का ब्योपारी तुम्हीं को बेच आया है मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम
Khalil Ur Rehman Qamar
34 likes
More from Ritesh kumar
"फ़र्क" खोया होता हूँ जब इक कोने में सुलगती आग है जब सीने में तकलीफ होती है जब सोने में और लग जाता हूँ जब रोने में तब समझता हूँ फर्क कैसे है? तेरे होने और न होने में जितनी मशक्कत है तुझे मनाने में उतनी ही सिद्दत है तुझे पाने में फिर क्या हर्ज है बेपनाह चाहने में फिर जो देर करती हो आने में तब समझता हूँ फर्क कैसे है? तेरे होने और न होने में रास न आई जब साथ हमारे होने में पलट कर न देखा तुझे सामने में ग़लती हो गई मुझ सेे अनजाने में अब जो मशक्कत है तेरे मिलने में तब समझता हूँ फर्क कैसे है? तेरे होने और न होने में
Ritesh kumar
2 likes
"दूर" जब तुम दूर होते हो थक कर चूर होते हो काम पसंद नहीं पर करने को मजबूर होते हो तब मुझ सेे देखा नहीं जाता पहचान दूसरे की फिर जो बेवजह ही मशहूर होते हो कहते हो वो पसंद नहीं पर उसी के माँग का सिंदूर होते हो तब मुझ सेे देखा नहीं जाता खोये हो तुम अपनी दुनिया में लोगों के लिए मग़रूर होते हो सोचता हूँ कि तुम कुछ कहो फिर भी जो मसरूफ़ होते हो तब मुझ सेे देखा नहीं जाता
Ritesh kumar
2 likes
'साथ' बाकी जो है कुछ भी वो बात मेरी सुन लो मेरा तो है कोई नहीं जरा साथ मेरे चल लो एक तुम ही तो अपने हो जरा याद मुझे कर लो जो बात हैं लब पे नहीं उस बात को तुम समझो जी भर के तुम्हें देखूँ इक पल तो मुझे देखो मेरा तो है कोई नहीं जरा साथ मेरे चल लो बाकी जो है कुछ भी वो बात मेरी सुन लो ख़्वाबों की दुनिया से मेरा नहीं कोई नाता बस तुम मिल जाओ मुझे मेरी इतनी सी है आशा ख़्वाबों में जो कहते हो वो ख़्वाब सच्चे कर दो दिल में जो दर्द मेरे उस दर्द को तुम समझो मेरा तो है कोई नहीं जरा साथ मेरे चल लो
Ritesh kumar
2 likes
"यादें" आज फिर याद आए वो कुछ याद पुराने अब क्या ही कहें कि कितने हैं प्यारे जैसे दिखते है आसमाँ में वो चाँद-सितारे समझ लो कुछ वैसे ही प्यारे वैसे ही न्यारे वो बचपन की रेल वो बचपन के खेल चाहे वो लुका-छिपी या फिर हो साथ में वो पकड़म-पकड़ाई पर क्या करें सब तो बन कर रह गई हैं बस यादें याद आई वो इक बात जिस सेे होती है आँखों में बरसात वो पापा की डाँट और मनाना भी साथ जिस सेे हम जाते थे डर फिर हम ढूँढ़ने थे लगते माँ का वो आँचल जिस में थे हम महफ़ूज फिर हम देखते थे दूर से ही छिप कर और भी हैं बहुत सी बातें पर क्या करें सब तो बन कर रह गई हैं बस यादें
Ritesh kumar
2 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Ritesh kumar.
Similar Moods
More moods that pair well with Ritesh kumar's nazm.







