nazmKuch Alfaaz

"यादें" आज फिर याद आए वो कुछ याद पुराने अब क्या ही कहें कि कितने हैं प्यारे जैसे दिखते है आसमाँ में वो चाँद-सितारे समझ लो कुछ वैसे ही प्यारे वैसे ही न्यारे वो बचपन की रेल वो बचपन के खेल चाहे वो लुका-छिपी या फिर हो साथ में वो पकड़म-पकड़ाई पर क्या करें सब तो बन कर रह गई हैं बस यादें याद आई वो इक बात जिस सेे होती है आँखों में बरसात वो पापा की डाँट और मनाना भी साथ जिस सेे हम जाते थे डर फिर हम ढूँढ़ने थे लगते माँ का वो आँचल जिस में थे हम महफ़ूज फिर हम देखते थे दूर से ही छिप कर और भी हैं बहुत सी बातें पर क्या करें सब तो बन कर रह गई हैं बस यादें

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"फ़र्क" खोया होता हूँ जब इक कोने में सुलगती आग है जब सीने में तकलीफ होती है जब सोने में और लग जाता हूँ जब रोने में तब समझता हूँ फर्क कैसे है? तेरे होने और न होने में जितनी मशक्कत है तुझे मनाने में उतनी ही सिद्दत है तुझे पाने में फिर क्या हर्ज है बेपनाह चाहने में फिर जो देर करती हो आने में तब समझता हूँ फर्क कैसे है? तेरे होने और न होने में रास न आई जब साथ हमारे होने में पलट कर न देखा तुझे सामने में ग़लती हो गई मुझ सेे अनजाने में अब जो मशक्कत है तेरे मिलने में तब समझता हूँ फर्क कैसे है? तेरे होने और न होने में

Ritesh kumar

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"दूर" जब तुम दूर होते हो थक कर चूर होते हो काम पसंद नहीं पर करने को मजबूर होते हो तब मुझ सेे देखा नहीं जाता पहचान दूसरे की फिर जो बेवजह ही मशहूर होते हो कहते हो वो पसंद नहीं पर उसी के माँग का सिंदूर होते हो तब मुझ सेे देखा नहीं जाता खोये हो तुम अपनी दुनिया में लोगों के लिए मग़रूर होते हो सोचता हूँ कि तुम कुछ कहो फिर भी जो मसरूफ़ होते हो तब मुझ सेे देखा नहीं जाता

Ritesh kumar

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'साथ' बाकी जो है कुछ भी वो बात मेरी सुन लो मेरा तो है कोई नहीं जरा साथ मेरे चल लो एक तुम ही तो अपने हो जरा याद मुझे कर लो जो बात हैं लब पे नहीं उस बात को तुम समझो जी भर के तुम्हें देखूँ इक पल तो मुझे देखो मेरा तो है कोई नहीं जरा साथ मेरे चल लो बाकी जो है कुछ भी वो बात मेरी सुन लो ख़्वाबों की दुनिया से मेरा नहीं कोई नाता बस तुम मिल जाओ मुझे मेरी इतनी सी है आशा ख़्वाबों में जो कहते हो वो ख़्वाब सच्चे कर दो दिल में जो दर्द मेरे उस दर्द को तुम समझो मेरा तो है कोई नहीं जरा साथ मेरे चल लो

Ritesh kumar

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"ऐसा ज़रूरी तो नहीं" तुम दिल की धड़कन हो मरता हूँ तेरी हर अदा पर तू ख़ूब-सूरत ही हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं मैं चाहता हूँ तुझ को और रहोगी हमेशा मेरे दिल में बदले में तू भी मुझ को चाहे ऐसा ज़रूरी तो नहीं दिल नहीं लगता तुम्हारे बिना माना कि जिक्र नहीं करता पर तुम सेे मोहब्बत न हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं बात हो भी जाए फिर भी तुम्हारी याद बहुत आती है तुम बिछर कर ही याद आओ ऐसा ज़रूरी तो नहीं एक दिन रच दूँगा इतिहास तेरी यादों के सहारे तू हर बार साथ ही रहे ऐसा ज़रूरी तो नहीं

Ritesh kumar

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