"आख़िरी सर्दी" सब तबाह-ओ-बर्बाद हो जाएगा ये सितम है कि इक दिन कोई तुम पर मरते-मरते मर जाएगा तुम से था वो जो सुरख़ाब चेहरा कि जिस पे तुम मरती थीं बेनूर हो जाएगा मेंरे चश्मों को बीनाई जो तुम ने की थी अता उस को देखना नमी लग जाएगी ज़ंग खा जाएगा एक दिल जिस को बरसों धड़काया तुम ने बेचैन-ओ-बेक़रार रखा वो भी जान क़रार पा जाएगा साँसें जो महकती रहीं हैं अभी तलक सो उन को भी सीने का एक ज़ख़्म खा जाएगा जिस जिस्म को गर्मी-ए-आग़ोश में कितनी सर्दियां तुम ने रखा था इस सर्दी शायद सर्द हो जाएगा असर खो जाएगा और आख़िरश एक लड़का जिस से तुम को निस्बत थी जिस को तुम से निस्बत है हिज़्र तुम्हारा खा जाएगा मर जाएगा एक लड़का बिछड़ कर तुम सेे इस सर्दी सुनो मुझ को ऐसा लगता है मर जाएगा
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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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"नाकारा" कौन आया है कोई नहीं आया है पागल तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है अच्छा यूँँ है बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने तेज़-रवी की राह-गुज़र से मेहनत-कोश और काम के दिन की धूल आई है धूप आई है जाने ये किस ध्यान में था मैं आता तो अच्छा कौन आता किस को आना था कौन आता
Jaun Elia
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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....
Ankit Maurya
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"बचपन की मुहब्बत" तू था मेरे दिल का रहबर तू कितने दिन याद आएगा तू छोड़ गया है मुझ को पर तू कितने दिन याद आएगा हाँ प्यार हुआ था बचपन में इक़रार हुआ था बचपन में सुन बचपन का मेरे दिलबर तू कितना ख़ुश है मेरे बिना ये दिल रोता है तेरे बिना तू था मंज़िल का राह-गुज़र अब प्यार मुहब्बत है ही नहीं रोने के सिवा अब कुछ भी नहीं बस अश्कों से दामन है तर तेरी यादें तड़पाती है उलफ़त में आग लगाती है कब लेगा तू 'दानिश' की ख़बर
Danish Balliavi
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हिज्र की रातें हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं हिज्र की रातें साँप होती हैं सियाह काले साँप जो शाम ढले बाहर निकलते हैं यादों के बिल से और शुरू कर देते हैं डसना ज़हर जब चढ़ने लगता है जिस्म ठंडा पड़ने लगता है धड़कन कभी इतनी तेज़ कि कमरा गूँजने लग जाए कभी इतनी धीमी कि नब्ज़ टटोलनी पड़ जाए साँसें इतनी बेचैन मानो दिया बुझने को हो और आख़िरी क़तरा बाक़ी हो तेल का दर्द ऐसा दिल में ख़ून के क़तरे आँखों से निकलने लगते हैं पर मौत नहीं आती यका यक आहिस्ता आहिस्ता लाती हैं हर एक ख़्वाहिश और एहसास को मारते हुए अंदरू लाश बनाते हुए हिज्र की रातें साँप होती हैं हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं
Navneet Vatsal Sahil
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"छुटे हुए पुरुष" प्रेम में छुटे हुए कुछ पुरुष पुरुष नहीं रहते वो हो जाते हैं स्त्री वो ख़ुद को भर लेते हैं भावुकता और आँसू से प्रेम में छुटे पुरुष प्राप्त कर कर लेते स्त्रीत्व के उस गुण को जिस में होता है मीरा सा पागलपन राधा सा निःस्वार्थ प्रेम वो चुनते हैं मीरा या राधा हो जाना या हो जाना दोनों ही दोनों हो जाना अत्यधिक दुःखद है उसे सहन करनी होती हैं तब दोनों ही पीड़ा राधा जिस के बगैर कृष्ण नाम अधूरा है परन्तु फिर भी राधा के हिस्से आता है वियोगी जीवन और वो चुन लेती है कृष्ण की यादों के साथ जीवन निर्वाह मीरा जिस के बगैर कृष्ण कोई भगवान नहीं और मीरा को मिलता है तिरस्कृत जीवन और अंतिम स्वांस तक वो चुनती है कृष्ण भक्ति दोनों ही अनंत प्रेम की पर्याय हैं जो बताता है अथाह या निःस्वार्थ प्रेम सदैव एक तरफ़ा रहा है वो नहीं प्राप्त कर पाता रुक्मणि होना राधा की भाँति मीरा ने नहीं स्वीकार किया प्रेमिका बने रहना और उस ने कृष्ण को पति कहा राधा हो जाना दुःखद तो है मीरा हो जाना अत्यंत दुःखद मैं भी तुम्हारे प्रेम में छूटा एक पुरुष हूँ
Navneet Vatsal Sahil
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"मुख़्तसर नज़्म" ये दर्द-ए-दिल मुख़्तसर नहीं कर सकता मैं अपनी नज़्में मुख़्तसर नहीं कर सकता उस की बाहों में रहे तो मुख़्तसर उस की बातें रहीं तो मुख़्तसर अपनी ख़ुशियाँ भी रहीं हैं मुख़्तसर वक़्त उल्फ़त-ओ-वस्ल का भी तो मुख़्तसर ही रहा अब हिज़्र का दायरां मुख़्तसर नहीं कर सकता दिन रहे तो मुख़्तसर राते रहीं सो मुख़्तसर अपनी ज़िन्दगी भी रही है मुख़्तसर उस के साथ गुज़ारा हर इक लम्हा भी तो मुख़्तसर ही रहा अब दास्तान-ए-मोहब्बत मुख़्तसर नहीं कर सकता मैं अपनी नज़्में मुख़्तसर नहीं कर सकता
Navneet Vatsal Sahil
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"नाकाम कोशिश" कभी कभी ऐसा भी होता है अक्सर सिगरेट सुलगाकर भूल जाता हूँ मैं और चला जाता हूँ उस बीते हुए वक़्त में हमारी साथ बिताई यादों को समेटने सब कुछ समेटने की नाकाम कोशिश करता हुआ मैं भूल जाता हूँ सिगरेट ! उँगली जला चुकी होती है तब तक
Navneet Vatsal Sahil
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"इक जादुई लफ़्ज़" ना आप था ना तुम था ना तू था कभी नाम नहीं लिए हम ने एक दूसरे के फिर भी कितनी बातें होतीं थीं इक लफ़्ज़ था लफ़्ज़ क्या था जान जान और जान था ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था इस में वो सब कुछ था जो हमें एक दूसरे से चाहिए था इस में वो सारे वाइदे थे जो लोग मिलते वक़्त करते हैं वो सारी क़स में थीं जो बिछड़ते वक़्त के लिए थीं ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था जानते हो दोस्त ये लफ़्ज़ महज़ क़स में-ओ-वायदे ही ना था एक वाकया था पूरा हमारी मोहब्बत का ये इक ऐसा लफ़्ज़ था जिस में सांसें थीं जो अकेला सारे ठंडे लफ़्ज़ों के बीच गर्म था ज़िन्दा लफ़्ज़ था इक वही तो गवाह था हम मोहब्बत में कितने सच्चे थे एक ऐसा लफ़्ज़ जिसे बोलते हुए अपना बदन ख़ुश्बूओं की क़बा लगती पेड़ नाचते लगते और हवा बहकती लगती ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था एक ऐसा लफ़्ज़ जिस का सुकून बोलने से ज़्यादा सुनने में आता कानों में मिश्री घोलती उस की आवाज़ के साथ जब ये लफ़्ज़ मिलता बदन सर-सरा उठता कलियाँ ख़ुद ही भँवरो से बोसे लेने को मचल उठतीं लगता मानो ज़िन्दगी दूर तलक सिर्फ़ छाँव है मानो सारी काइनात सिर्फ़ मुझ पर मेहरबान थी अब ऐसे आलम में कभी जान ना पाया ये छाँव सिर्फ़ मुझ पर मेहमान थी पर ये लफ़्ज़ हैराँ हूँ अभी तलक सुनाई देता है
Navneet Vatsal Sahil
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