nazmKuch Alfaaz

"मुख़्तसर नज़्म" ये दर्द-ए-दिल मुख़्तसर नहीं कर सकता मैं अपनी नज़्में मुख़्तसर नहीं कर सकता उस की बाहों में रहे तो मुख़्तसर उस की बातें रहीं तो मुख़्तसर अपनी ख़ुशियाँ भी रहीं हैं मुख़्तसर वक़्त उल्फ़त-ओ-वस्ल का भी तो मुख़्तसर ही रहा अब हिज़्र का दायरां मुख़्तसर नहीं कर सकता दिन रहे तो मुख़्तसर राते रहीं सो मुख़्तसर अपनी ज़िन्दगी भी रही है मुख़्तसर उस के साथ गुज़ारा हर इक लम्हा भी तो मुख़्तसर ही रहा अब दास्तान-ए-मोहब्बत मुख़्तसर नहीं कर सकता मैं अपनी नज़्में मुख़्तसर नहीं कर सकता

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Kumar Vishwas

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"छुटे हुए पुरुष" प्रेम में छुटे हुए कुछ पुरुष पुरुष नहीं रहते वो हो जाते हैं स्त्री वो ख़ुद को भर लेते हैं भावुकता और आँसू से प्रेम में छुटे पुरुष प्राप्त कर कर लेते स्त्रीत्व के उस गुण को जिस में होता है मीरा सा पागलपन राधा सा निःस्वार्थ प्रेम वो चुनते हैं मीरा या राधा हो जाना या हो जाना दोनों ही दोनों हो जाना अत्यधिक दुःखद है उसे सहन करनी होती हैं तब दोनों ही पीड़ा राधा जिस के बगैर कृष्ण नाम अधूरा है परन्तु फिर भी राधा के हिस्से आता है वियोगी जीवन और वो चुन लेती है कृष्ण की यादों के साथ जीवन निर्वाह मीरा जिस के बगैर कृष्ण कोई भगवान नहीं और मीरा को मिलता है तिरस्कृत जीवन और अंतिम स्वांस तक वो चुनती है कृष्ण भक्ति दोनों ही अनंत प्रेम की पर्याय हैं जो बताता है अथाह या निःस्वार्थ प्रेम सदैव एक तरफ़ा रहा है वो नहीं प्राप्त कर पाता रुक्मणि होना राधा की भाँति मीरा ने नहीं स्वीकार किया प्रेमिका बने रहना और उस ने कृष्ण को पति कहा राधा हो जाना दुःखद तो है मीरा हो जाना अत्यंत दुःखद मैं भी तुम्हारे प्रेम में छूटा एक पुरुष हूँ

Navneet Vatsal Sahil

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"तुम भी इक दरिया हो" ज़िन्दगी यूँ भी ख़ूब-सूरत है. किनारे पर बैठे-बैठे दरिया में जाते हुए लोगों को देखते रहना मगर दरिया में न जाना, मौजो को दूर से देखना मगर छूने की कोशिश न करना दिल लाख कहे, "चल हम भी एक बार छूते हैं ना !" मगर मैं जानता हूँ मौज आख़िर को मौज है और दरिया दरिया! तुम भी इक दरिया के जैसी हो मैं किनारे पर ही ठीक हूँ

Navneet Vatsal Sahil

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हिज्र की रातें हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं हिज्र की रातें साँप होती हैं सियाह काले साँप जो शाम ढले बाहर निकलते हैं यादों के बिल से और शुरू कर देते हैं डसना ज़हर जब चढ़ने लगता है जिस्म ठंडा पड़ने लगता है धड़कन कभी इतनी तेज़ कि कमरा गूँजने लग जाए कभी इतनी धीमी कि नब्ज़ टटोलनी पड़ जाए साँसें इतनी बेचैन मानो दिया बुझने को हो और आख़िरी क़तरा बाक़ी हो तेल का दर्द ऐसा दिल में ख़ून के क़तरे आँखों से निकलने लगते हैं पर मौत नहीं आती यका यक आहिस्ता आहिस्ता लाती हैं हर एक ख़्वाहिश और एहसास को मारते हुए अंदरू लाश बनाते हुए हिज्र की रातें साँप होती हैं हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं

Navneet Vatsal Sahil

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"इक जादुई लफ़्ज़" ना आप था ना तुम था ना तू था कभी नाम नहीं लिए हम ने एक दूसरे के फिर भी कितनी बातें होतीं थीं इक लफ़्ज़ था लफ़्ज़ क्या था जान जान और जान था ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था इस में वो सब कुछ था जो हमें एक दूसरे से चाहिए था इस में वो सारे वाइदे थे जो लोग मिलते वक़्त करते हैं वो सारी क़स में थीं जो बिछड़ते वक़्त के लिए थीं ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था जानते हो दोस्त ये लफ़्ज़ महज़ क़स में-ओ-वायदे ही ना था एक वाकया था पूरा हमारी मोहब्बत का ये इक ऐसा लफ़्ज़ था जिस में सांसें थीं जो अकेला सारे ठंडे लफ़्ज़ों के बीच गर्म था ज़िन्दा लफ़्ज़ था इक वही तो गवाह था हम मोहब्बत में कितने सच्चे थे एक ऐसा लफ़्ज़ जिसे बोलते हुए अपना बदन ख़ुश्बूओं की क़बा लगती पेड़ नाचते लगते और हवा बहकती लगती ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था एक ऐसा लफ़्ज़ जिस का सुकून बोलने से ज़्यादा सुनने में आता कानों में मिश्री घोलती उस की आवाज़ के साथ जब ये लफ़्ज़ मिलता बदन सर-सरा उठता कलियाँ ख़ुद ही भँवरो से बोसे लेने को मचल उठतीं लगता मानो ज़िन्दगी दूर तलक सिर्फ़ छाँव है मानो सारी काइ‌नात सिर्फ़ मुझ पर मेहरबान थी अब ऐसे आलम में कभी जान ना पाया ये छाँव सिर्फ़ मुझ पर मेहमान थी पर ये लफ़्ज़ हैराँ हूँ अभी तलक सुनाई देता है

Navneet Vatsal Sahil

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"आख़िरी सर्दी" सब तबाह-ओ-बर्बाद हो जाएगा ये सितम है कि इक दिन कोई तुम पर मरते-मरते मर जाएगा तुम से था वो जो सुरख़ाब चेहरा कि जिस पे तुम मरती थीं बेनूर हो जाएगा मेंरे चश्मों को बीनाई जो तुम ने की थी अता उस को देखना नमी लग जाएगी ज़ंग खा जाएगा एक दिल जिस को बरसों धड़काया तुम ने बेचैन-ओ-बेक़रार रखा वो भी जान क़रार पा जाएगा साँसें जो महकती रहीं हैं अभी तलक सो उन को भी सीने का एक ज़ख़्म खा जाएगा जिस जिस्म को गर्मी-ए-आग़ोश में कितनी सर्दियां तुम ने रखा था इस सर्दी शायद सर्द हो जाएगा असर खो जाएगा और आख़िरश एक लड़का जिस से तुम को निस्बत थी जिस को तुम से निस्बत है हिज़्र तुम्हारा खा जाएगा मर जाएगा एक लड़का बिछड़ कर तुम सेे इस सर्दी सुनो मुझ को ऐसा लगता है मर जाएगा

Navneet Vatsal Sahil

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