कैसे बनाई तू ने ये काएनात प्यारी हैरान हो रही है अक़्ल-ओ-ख़िरद हमारी कलियाँ महक रही हैं ए'जाज़ है ये तेरा ख़ुशबू कहाँ से आई इक राज़ है ये तेरा बुलबुल के चहचहों ने हैरान कर दिया है इंसाँ के क़हक़हों ने हैरान कर दिया है शश्दर हूँ देख के मैं उड़ते हैं कैसे पंछी दरिया में देखता हूँ जाते हैं कैसे माँझी किस तरह बे-सुतूँ ये तू ने फ़लक बनाया आँचल को तू ने उस के बारों से जगमगाया किस तरह की हैं पैदा बरसात की घटाएँ किस तरह चल रही हैं पुर-कैफ़ ये हवाएँ दरिया पहाड़ जंगल किस तरह बन गए हैं ये बात अक़्ल वाले हर वक़्त सोचते हैं किस तरह तू ने मौला इंसान को बनाया अक्सर मैं सोचता हूँ कैसा है तू ख़ुदाया
Related Nazm
"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
180 likes
राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
73 likes
"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए
Abrar Kashif
46 likes
"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
17 likes
"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
Jaun Elia
44 likes
More from Aadil Aseer Dehlvi
नमाज़ को जो जाओगे ख़ुदा का क़ुर्ब पाओगे कहेंगे तुम को नेक सब मिलेगा तुम को प्यारा रब उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को है मुख़्तसर सी ज़िंदगी नहीं है अच्छी काहिली ख़ुदा का उठ के नाम लो चलो तो सब ये कहो उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को वुज़ू करो वुज़ू करो मगर ध्यान ये रखो वुज़ू से तन भी साफ़ हो वुज़ू से मन भी साफ़ हो उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को सदा रखें ये ध्यान अब कि ख़त्म हो अज़ान जब हर एक काम छोड़ दें ख़ुदा से दिल को जोड़ लें उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को
Aadil Aseer Dehlvi
0 likes
ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है निकलता है मशरिक़ से किस तरह सूरज फ़लक पर चमकता है ये चाँद क्यूँँकर कहाँ से समुंदर में आते हैं तूफ़ाँ उजाला है कैसा ये शम्स-ओ-क़मर पर ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है बहारों का गुल को पता किस तरह है अदा ग़ुंचों को ये चटकने की क्यूँ दी कहाँ से है आया ख़िज़ाँ का ये मौसम घटा को ये ख़ूबी बरसने की क्यूँ दी ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है
Aadil Aseer Dehlvi
1 likes
पढ़ना लिखना सिखाए अच्छी राह बताए बद से हमें बचाए अच्छा बच्चा बनाए भय्या प्यारा प्यारा घंटी ख़ूब बजाए बस्ता भी लटकाए मकतब ले कर जाए जल्दी से पहुँचाए रिक्शा प्यारा प्यारा फूलों पर इतराए ख़ुशबू भी बिखराए घर आँगन महकाए हरियाली भी लाए गमला प्यारा प्यारा भय्या ले कर जाए सर्कस भी दिखलाए लड्डू भी खिलवाए जो चाहो मिल जाए मेला प्यारा प्यारा जब जब ये लहराए सब की शान बढ़ाए जिस के हाथ ये आए आगे बढ़ता जाए झंडा प्यारा प्यारा तारीकी में आए बिस्तर तक पहुँचाए लोरी भी सुनवाये सपने भी दिखलाए सोना प्यारा प्यारा सब को मार भगाए जो देखे डर जाए उल्टी शामत लाए दुश्मन कोई आए डंडा प्यारा प्यारा बारिश में काम आए बाहर ले कर जाए ख़ुद तो भीगा जाए लेकिन हमें बचाए छाता प्यारा प्यारा जगमग रूप दिखाए चंदा रीझा जाए रस्ता भी बतलाए लेकिन हाथ न आए तारा प्यारा प्यारा तल कर मुन्ना खाए ख़ागीना बनवाए सालन में पक जाए मुन्नी को ललचाए अण्डा प्यारा प्यारा जब ये मौसम आए सहत ख़ूब बनाए ढेरों कपड़े लाए फिर भी दूर न जाए जाड़ा प्यारा प्यारा खाना जब भी आए आगे बढ़ कर लाए हम को सब खिलवाए ख़ुद भूका रह जाए चमचा प्यारा प्यारा बाज़ारों में निकले हाथ में सब के लटके जो कुछ भी ये देखे अपने पेट में रखे थैला प्यारा प्यारा मीठा मीठा खाओ मुन्ना बोले लाओ जल्दी से पकवाओ सारा चट कर जाओ हलवा प्यारा प्यारा चाहे कोई बुलाए सब की गोद में जाए देखे तो ललचाए टॉफ़ी बिस्कुट चाय नन्हा प्यारा प्यारा पानी ठंडा कर दे सर पे कटोरा रखे दौड़े आएँ प्यारे जो चाहे वो पी ले मटका प्यारा प्यारा सूरत रंग बिरंगी हालत भी है अच्छी बिस्तर का है साथी आदत में है नर्मी तकिया प्यारा प्यारा गर्मी दूर भगाए ठंडा मौसम लाए थोड़ी बिजली खाए बेहतर काम बनाए पंखा प्यारा प्यारा चम चम चमका जाए बिजली सा लहराए जल्दी जल्दी आए साथ में चलता जाए जूता प्यारा प्यारा सब से पहले जागे पेड़ पे चढ़ के बैठे दीवारों पर भागे कुकड़ूँ कुकड़ूँ चीख़े मुर्ग़ा प्यारा प्यारा घर में दौड़ लगाए बाहर भाग के जाए बिल्ली पर ग़ुर्राए नन्हे को बहलाए कुत्ता प्यारा प्यारा पीठ पे हमें बिठाए सरपट दौड़ के जाए मंज़िल पर पहुँचाए तब जा कर सुसताए घोड़ा प्यारा प्यारा जल्दी से उठ जाए चीख़े और चिल्लाए दाना पत्ते खाए फिर भूका रह जाए बकरा प्यारा प्यारा पिंजरे में पर तोले ठुमक ठुमक कर डोले जब भी मुँह को खोले मीठी बोली बोले तोता पियारे प्यारा रुई को लिपटाए धागा बनता जाए हाथों में बल खाए बल खा कर लहराए तकला प्यारा प्यारा चोरों से लड़ जाए डाकू से टकराए जो भी चाबी लाए उस के बस में आए ताला प्यारा प्यारा सड़कें भी दिखलाए गलियों में ले जाए कौन किधर को जाए भेद ये सब बतलाए नक़्शा प्यारा प्यारा कलियों पर मंड लाए फूलों से बतलाए नाचे झू में गाए मस्ती में लहराए भौंरा प्यारा प्यारा शब को मुँह दिखलाए सूरज से शरमाए बादल में छुप जाए रात होते ही आए चंदा प्यारा प्यारा झील के पास ही बैठे छोटी मछली पकड़े हंस हो कोई जैसे मोती खाने आए बगुला प्यारा प्यारा आँखों से लग जाए राहत ही पहुँचाए काले काले शीशे अब्र के टुकड़ों जैसे चश्मा प्यारा प्यारा मेरा हमदम साथी ऐसा न होगा कोई सूरत भी है प्यारी सीरत भी है अच्छी बस्ता प्यारा प्यारा वक़्त पे सो कर उठे वक़्त पे अपने खेले वक़्त पे पढ़ने जाए अव्वल नंबर आए बच्चा प्यारा प्यारा
Aadil Aseer Dehlvi
1 likes
नादाँ कोई इक रोज़ जो जंगल में गया अख़रोट के बाग़ात का मंज़र देखा है कितना बड़ा पेड़ तो फल छोटा सा ये सोच के वो और भी हैरान हुआ इस इतने बड़े पेड़ पे नन्हा सा फल तरबूज़ यहाँ होता तो क्या अच्छा था तरबूज़ को देखो तो ज़रा सी है बेल क़ुदरत ने दिखाए हैं तमाशे क्या क्या तरबूज़ कहाँ और कहाँ ये अख़रोट क्या भेद है मेरी न समझ में आया इस सोच में था कि इक हवा का झक्कड़ आँधी सा बगूला सा बिफर कर उट्ठा जंगल के दरख़्तों को हिला कर उस ने अख़रोट को नादान के सर पर फेंका सर पर पड़ा अख़रोट तो चीख़ा नादान तरबूज़ जो होता तो मैं मर ही जाता हिकमत से कोई काम नहीं है ख़ाली जिस को भी जहाँ तू ने किया है पैदा उस की जगह उस ने नहीं बेहतर कोई अब राज़ ये मेरी भी समझ में आया
Aadil Aseer Dehlvi
1 likes
होली जब भी आए प्यार की ख़ुशियाँ लाए रंगों के खेलों में मस्ती सी छा जाए ख़ुश हैं दादी नानी बच्चों की नादानी पिचकारी में भर कर फेंक रहे हैं पानी रंग रंगीली होली छैल छबेली होली बच्चे हूँ या बूढे सब की सहेली होली पानी के ग़ुबारे रंगों के नज़ारे बुरा न मानो भय्या लगते हैं क्या प्यारे
Aadil Aseer Dehlvi
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Aadil Aseer Dehlvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Aadil Aseer Dehlvi's nazm.







