nazmKuch Alfaaz

ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है निकलता है मशरिक़ से किस तरह सूरज फ़लक पर चमकता है ये चाँद क्यूँँकर कहाँ से समुंदर में आते हैं तूफ़ाँ उजाला है कैसा ये शम्स-ओ-क़मर पर ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है बहारों का गुल को पता किस तरह है अदा ग़ुंचों को ये चटकने की क्यूँ दी कहाँ से है आया ख़िज़ाँ का ये मौसम घटा को ये ख़ूबी बरसने की क्यूँ दी ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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पढ़ना लिखना सिखाए अच्छी राह बताए बद से हमें बचाए अच्छा बच्चा बनाए भय्या प्यारा प्यारा घंटी ख़ूब बजाए बस्ता भी लटकाए मकतब ले कर जाए जल्दी से पहुँचाए रिक्शा प्यारा प्यारा फूलों पर इतराए ख़ुशबू भी बिखराए घर आँगन महकाए हरियाली भी लाए गमला प्यारा प्यारा भय्या ले कर जाए सर्कस भी दिखलाए लड्डू भी खिलवाए जो चाहो मिल जाए मेला प्यारा प्यारा जब जब ये लहराए सब की शान बढ़ाए जिस के हाथ ये आए आगे बढ़ता जाए झंडा प्यारा प्यारा तारीकी में आए बिस्तर तक पहुँचाए लोरी भी सुनवाये सपने भी दिखलाए सोना प्यारा प्यारा सब को मार भगाए जो देखे डर जाए उल्टी शामत लाए दुश्मन कोई आए डंडा प्यारा प्यारा बारिश में काम आए बाहर ले कर जाए ख़ुद तो भीगा जाए लेकिन हमें बचाए छाता प्यारा प्यारा जगमग रूप दिखाए चंदा रीझा जाए रस्ता भी बतलाए लेकिन हाथ न आए तारा प्यारा प्यारा तल कर मुन्ना खाए ख़ागीना बनवाए सालन में पक जाए मुन्नी को ललचाए अण्डा प्यारा प्यारा जब ये मौसम आए सहत ख़ूब बनाए ढेरों कपड़े लाए फिर भी दूर न जाए जाड़ा प्यारा प्यारा खाना जब भी आए आगे बढ़ कर लाए हम को सब खिलवाए ख़ुद भूका रह जाए चमचा प्यारा प्यारा बाज़ारों में निकले हाथ में सब के लटके जो कुछ भी ये देखे अपने पेट में रखे थैला प्यारा प्यारा मीठा मीठा खाओ मुन्ना बोले लाओ जल्दी से पकवाओ सारा चट कर जाओ हलवा प्यारा प्यारा चाहे कोई बुलाए सब की गोद में जाए देखे तो ललचाए टॉफ़ी बिस्कुट चाय नन्हा प्यारा प्यारा पानी ठंडा कर दे सर पे कटोरा रखे दौड़े आएँ प्यारे जो चाहे वो पी ले मटका प्यारा प्यारा सूरत रंग बिरंगी हालत भी है अच्छी बिस्तर का है साथी आदत में है नर्मी तकिया प्यारा प्यारा गर्मी दूर भगाए ठंडा मौसम लाए थोड़ी बिजली खाए बेहतर काम बनाए पंखा प्यारा प्यारा चम चम चमका जाए बिजली सा लहराए जल्दी जल्दी आए साथ में चलता जाए जूता प्यारा प्यारा सब से पहले जागे पेड़ पे चढ़ के बैठे दीवारों पर भागे कुकड़ूँ कुकड़ूँ चीख़े मुर्ग़ा प्यारा प्यारा घर में दौड़ लगाए बाहर भाग के जाए बिल्ली पर ग़ुर्राए नन्हे को बहलाए कुत्ता प्यारा प्यारा पीठ पे हमें बिठाए सरपट दौड़ के जाए मंज़िल पर पहुँचाए तब जा कर सुसताए घोड़ा प्यारा प्यारा जल्दी से उठ जाए चीख़े और चिल्लाए दाना पत्ते खाए फिर भूका रह जाए बकरा प्यारा प्यारा पिंजरे में पर तोले ठुमक ठुमक कर डोले जब भी मुँह को खोले मीठी बोली बोले तोता पियारे प्यारा रुई को लिपटाए धागा बनता जाए हाथों में बल खाए बल खा कर लहराए तकला प्यारा प्यारा चोरों से लड़ जाए डाकू से टकराए जो भी चाबी लाए उस के बस में आए ताला प्यारा प्यारा सड़कें भी दिखलाए गलियों में ले जाए कौन किधर को जाए भेद ये सब बतलाए नक़्शा प्यारा प्यारा कलियों पर मंड लाए फूलों से बतलाए नाचे झू में गाए मस्ती में लहराए भौंरा प्यारा प्यारा शब को मुँह दिखलाए सूरज से शरमाए बादल में छुप जाए रात होते ही आए चंदा प्यारा प्यारा झील के पास ही बैठे छोटी मछली पकड़े हंस हो कोई जैसे मोती खाने आए बगुला प्यारा प्यारा आँखों से लग जाए राहत ही पहुँचाए काले काले शीशे अब्र के टुकड़ों जैसे चश्मा प्यारा प्यारा मेरा हमदम साथी ऐसा न होगा कोई सूरत भी है प्यारी सीरत भी है अच्छी बस्ता प्यारा प्यारा वक़्त पे सो कर उठे वक़्त पे अपने खेले वक़्त पे पढ़ने जाए अव्वल नंबर आए बच्चा प्यारा प्यारा

Aadil Aseer Dehlvi

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नमाज़ को जो जाओगे ख़ुदा का क़ुर्ब पाओगे कहेंगे तुम को नेक सब मिलेगा तुम को प्यारा रब उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को है मुख़्तसर सी ज़िंदगी नहीं है अच्छी काहिली ख़ुदा का उठ के नाम लो चलो तो सब ये कहो उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को वुज़ू करो वुज़ू करो मगर ध्यान ये रखो वुज़ू से तन भी साफ़ हो वुज़ू से मन भी साफ़ हो उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को सदा रखें ये ध्यान अब कि ख़त्म हो अज़ान जब हर एक काम छोड़ दें ख़ुदा से दिल को जोड़ लें उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को

Aadil Aseer Dehlvi

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नादाँ कोई इक रोज़ जो जंगल में गया अख़रोट के बाग़ात का मंज़र देखा है कितना बड़ा पेड़ तो फल छोटा सा ये सोच के वो और भी हैरान हुआ इस इतने बड़े पेड़ पे नन्हा सा फल तरबूज़ यहाँ होता तो क्या अच्छा था तरबूज़ को देखो तो ज़रा सी है बेल क़ुदरत ने दिखाए हैं तमाशे क्या क्या तरबूज़ कहाँ और कहाँ ये अख़रोट क्या भेद है मेरी न समझ में आया इस सोच में था कि इक हवा का झक्कड़ आँधी सा बगूला सा बिफर कर उट्ठा जंगल के दरख़्तों को हिला कर उस ने अख़रोट को नादान के सर पर फेंका सर पर पड़ा अख़रोट तो चीख़ा नादान तरबूज़ जो होता तो मैं मर ही जाता हिकमत से कोई काम नहीं है ख़ाली जिस को भी जहाँ तू ने किया है पैदा उस की जगह उस ने नहीं बेहतर कोई अब राज़ ये मेरी भी समझ में आया

Aadil Aseer Dehlvi

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होली जब भी आए प्यार की ख़ुशियाँ लाए रंगों के खेलों में मस्ती सी छा जाए ख़ुश हैं दादी नानी बच्चों की नादानी पिचकारी में भर कर फेंक रहे हैं पानी रंग रंगीली होली छैल छबेली होली बच्चे हूँ या बूढे सब की सहेली होली पानी के ग़ुबारे रंगों के नज़ारे बुरा न मानो भय्या लगते हैं क्या प्यारे

Aadil Aseer Dehlvi

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अक्सर हमारे ख़्वाब में आती हैं टॉफ़ियाँ खुल जाए फिर जो आँख सताती हैं टॉफ़ियाँ तक़रीब घर में हो कोई स्कूल का हो जश्न मौक़ा मिले तो रंग जमाती हैं टॉफ़ियाँ खाएँ मज़े मज़े से बड़े भाई जान भी बाजी भी ख़ूब शौक़ से खाती हैं टॉफ़ियाँ अब्बा भी ले के आते हैं चीज़ें नई नई अम्मी भी मार्किट से तो लाती हैं टॉफ़ियाँ बिल्ली को ख़्वाब क्या नज़र आता है क्या कहीं हम को तो ख़्वाब में नज़र आती हैं टॉफ़ियाँ मैडम हमारी अच्छी हैं स्कूल की सभी अच्छी हैं सब से वो जो खिलाती हैं टॉफ़ियाँ देखें जो टॉफ़ियाँ तो वो हँसते ज़रूर हैं बच्चों को रोते रोते हँसाती हैं टॉफ़ियाँ 'आदिल' हैं हम भी ज़ाइक़े से उन के बा-ख़बर पानी हमारे मुँह में भी लाती हैं टॉफ़ियाँ

Aadil Aseer Dehlvi

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