नमाज़ को जो जाओगे ख़ुदा का क़ुर्ब पाओगे कहेंगे तुम को नेक सब मिलेगा तुम को प्यारा रब उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को है मुख़्तसर सी ज़िंदगी नहीं है अच्छी काहिली ख़ुदा का उठ के नाम लो चलो तो सब ये कहो उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को वुज़ू करो वुज़ू करो मगर ध्यान ये रखो वुज़ू से तन भी साफ़ हो वुज़ू से मन भी साफ़ हो उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को सदा रखें ये ध्यान अब कि ख़त्म हो अज़ान जब हर एक काम छोड़ दें ख़ुदा से दिल को जोड़ लें उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
ZafarAli Memon
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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
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ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है निकलता है मशरिक़ से किस तरह सूरज फ़लक पर चमकता है ये चाँद क्यूँँकर कहाँ से समुंदर में आते हैं तूफ़ाँ उजाला है कैसा ये शम्स-ओ-क़मर पर ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है बहारों का गुल को पता किस तरह है अदा ग़ुंचों को ये चटकने की क्यूँ दी कहाँ से है आया ख़िज़ाँ का ये मौसम घटा को ये ख़ूबी बरसने की क्यूँ दी ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है
Aadil Aseer Dehlvi
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पढ़ना लिखना सिखाए अच्छी राह बताए बद से हमें बचाए अच्छा बच्चा बनाए भय्या प्यारा प्यारा घंटी ख़ूब बजाए बस्ता भी लटकाए मकतब ले कर जाए जल्दी से पहुँचाए रिक्शा प्यारा प्यारा फूलों पर इतराए ख़ुशबू भी बिखराए घर आँगन महकाए हरियाली भी लाए गमला प्यारा प्यारा भय्या ले कर जाए सर्कस भी दिखलाए लड्डू भी खिलवाए जो चाहो मिल जाए मेला प्यारा प्यारा जब जब ये लहराए सब की शान बढ़ाए जिस के हाथ ये आए आगे बढ़ता जाए झंडा प्यारा प्यारा तारीकी में आए बिस्तर तक पहुँचाए लोरी भी सुनवाये सपने भी दिखलाए सोना प्यारा प्यारा सब को मार भगाए जो देखे डर जाए उल्टी शामत लाए दुश्मन कोई आए डंडा प्यारा प्यारा बारिश में काम आए बाहर ले कर जाए ख़ुद तो भीगा जाए लेकिन हमें बचाए छाता प्यारा प्यारा जगमग रूप दिखाए चंदा रीझा जाए रस्ता भी बतलाए लेकिन हाथ न आए तारा प्यारा प्यारा तल कर मुन्ना खाए ख़ागीना बनवाए सालन में पक जाए मुन्नी को ललचाए अण्डा प्यारा प्यारा जब ये मौसम आए सहत ख़ूब बनाए ढेरों कपड़े लाए फिर भी दूर न जाए जाड़ा प्यारा प्यारा खाना जब भी आए आगे बढ़ कर लाए हम को सब खिलवाए ख़ुद भूका रह जाए चमचा प्यारा प्यारा बाज़ारों में निकले हाथ में सब के लटके जो कुछ भी ये देखे अपने पेट में रखे थैला प्यारा प्यारा मीठा मीठा खाओ मुन्ना बोले लाओ जल्दी से पकवाओ सारा चट कर जाओ हलवा प्यारा प्यारा चाहे कोई बुलाए सब की गोद में जाए देखे तो ललचाए टॉफ़ी बिस्कुट चाय नन्हा प्यारा प्यारा पानी ठंडा कर दे सर पे कटोरा रखे दौड़े आएँ प्यारे जो चाहे वो पी ले मटका प्यारा प्यारा सूरत रंग बिरंगी हालत भी है अच्छी बिस्तर का है साथी आदत में है नर्मी तकिया प्यारा प्यारा गर्मी दूर भगाए ठंडा मौसम लाए थोड़ी बिजली खाए बेहतर काम बनाए पंखा प्यारा प्यारा चम चम चमका जाए बिजली सा लहराए जल्दी जल्दी आए साथ में चलता जाए जूता प्यारा प्यारा सब से पहले जागे पेड़ पे चढ़ के बैठे दीवारों पर भागे कुकड़ूँ कुकड़ूँ चीख़े मुर्ग़ा प्यारा प्यारा घर में दौड़ लगाए बाहर भाग के जाए बिल्ली पर ग़ुर्राए नन्हे को बहलाए कुत्ता प्यारा प्यारा पीठ पे हमें बिठाए सरपट दौड़ के जाए मंज़िल पर पहुँचाए तब जा कर सुसताए घोड़ा प्यारा प्यारा जल्दी से उठ जाए चीख़े और चिल्लाए दाना पत्ते खाए फिर भूका रह जाए बकरा प्यारा प्यारा पिंजरे में पर तोले ठुमक ठुमक कर डोले जब भी मुँह को खोले मीठी बोली बोले तोता पियारे प्यारा रुई को लिपटाए धागा बनता जाए हाथों में बल खाए बल खा कर लहराए तकला प्यारा प्यारा चोरों से लड़ जाए डाकू से टकराए जो भी चाबी लाए उस के बस में आए ताला प्यारा प्यारा सड़कें भी दिखलाए गलियों में ले जाए कौन किधर को जाए भेद ये सब बतलाए नक़्शा प्यारा प्यारा कलियों पर मंड लाए फूलों से बतलाए नाचे झू में गाए मस्ती में लहराए भौंरा प्यारा प्यारा शब को मुँह दिखलाए सूरज से शरमाए बादल में छुप जाए रात होते ही आए चंदा प्यारा प्यारा झील के पास ही बैठे छोटी मछली पकड़े हंस हो कोई जैसे मोती खाने आए बगुला प्यारा प्यारा आँखों से लग जाए राहत ही पहुँचाए काले काले शीशे अब्र के टुकड़ों जैसे चश्मा प्यारा प्यारा मेरा हमदम साथी ऐसा न होगा कोई सूरत भी है प्यारी सीरत भी है अच्छी बस्ता प्यारा प्यारा वक़्त पे सो कर उठे वक़्त पे अपने खेले वक़्त पे पढ़ने जाए अव्वल नंबर आए बच्चा प्यारा प्यारा
Aadil Aseer Dehlvi
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देखो ग़रीब कितनी ज़हमत उठा रहा है गलियों में भीड़ वाली रिक्शा चला रहा है महरूम है अगरचे दुनिया की ने'मतों से हर बोझ ज़िंदगी का हँस कर उठा रहा है बरसात में भी देखो फिरता हुआ सड़क पर रिक्शा भी भीगता है ख़ुद भी नहा रहा है गर्मी की धूप में भी रुकता नहीं है घर में पुर-पेच रास्तों के फेरे लगा रहा है सर्दी से काँपता है कपड़े फटे हुए हैं ठंडी हवा से ख़ुद को कैसे बचा रहा है मस्ती में दौड़ता है रिक्शा लिए सड़क पर नग़्मा कोई सुरीला अब गुनगुना रहा है रिक्शे के पैडलों पर रखे हैं पाँव दोनों आँखें हैं रास्ते पर घंटी बजा रहा है माँ बाप मुंतज़िर हैं घर पर सभी के 'आदिल' बच्चों को अब वो लेने स्कूल जा रहा है
Aadil Aseer Dehlvi
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नादाँ कोई इक रोज़ जो जंगल में गया अख़रोट के बाग़ात का मंज़र देखा है कितना बड़ा पेड़ तो फल छोटा सा ये सोच के वो और भी हैरान हुआ इस इतने बड़े पेड़ पे नन्हा सा फल तरबूज़ यहाँ होता तो क्या अच्छा था तरबूज़ को देखो तो ज़रा सी है बेल क़ुदरत ने दिखाए हैं तमाशे क्या क्या तरबूज़ कहाँ और कहाँ ये अख़रोट क्या भेद है मेरी न समझ में आया इस सोच में था कि इक हवा का झक्कड़ आँधी सा बगूला सा बिफर कर उट्ठा जंगल के दरख़्तों को हिला कर उस ने अख़रोट को नादान के सर पर फेंका सर पर पड़ा अख़रोट तो चीख़ा नादान तरबूज़ जो होता तो मैं मर ही जाता हिकमत से कोई काम नहीं है ख़ाली जिस को भी जहाँ तू ने किया है पैदा उस की जगह उस ने नहीं बेहतर कोई अब राज़ ये मेरी भी समझ में आया
Aadil Aseer Dehlvi
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अक्सर हमारे ख़्वाब में आती हैं टॉफ़ियाँ खुल जाए फिर जो आँख सताती हैं टॉफ़ियाँ तक़रीब घर में हो कोई स्कूल का हो जश्न मौक़ा मिले तो रंग जमाती हैं टॉफ़ियाँ खाएँ मज़े मज़े से बड़े भाई जान भी बाजी भी ख़ूब शौक़ से खाती हैं टॉफ़ियाँ अब्बा भी ले के आते हैं चीज़ें नई नई अम्मी भी मार्किट से तो लाती हैं टॉफ़ियाँ बिल्ली को ख़्वाब क्या नज़र आता है क्या कहीं हम को तो ख़्वाब में नज़र आती हैं टॉफ़ियाँ मैडम हमारी अच्छी हैं स्कूल की सभी अच्छी हैं सब से वो जो खिलाती हैं टॉफ़ियाँ देखें जो टॉफ़ियाँ तो वो हँसते ज़रूर हैं बच्चों को रोते रोते हँसाती हैं टॉफ़ियाँ 'आदिल' हैं हम भी ज़ाइक़े से उन के बा-ख़बर पानी हमारे मुँह में भी लाती हैं टॉफ़ियाँ
Aadil Aseer Dehlvi
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