nazmKuch Alfaaz

पढ़ना लिखना सिखाए अच्छी राह बताए बद से हमें बचाए अच्छा बच्चा बनाए भय्या प्यारा प्यारा घंटी ख़ूब बजाए बस्ता भी लटकाए मकतब ले कर जाए जल्दी से पहुँचाए रिक्शा प्यारा प्यारा फूलों पर इतराए ख़ुशबू भी बिखराए घर आँगन महकाए हरियाली भी लाए गमला प्यारा प्यारा भय्या ले कर जाए सर्कस भी दिखलाए लड्डू भी खिलवाए जो चाहो मिल जाए मेला प्यारा प्यारा जब जब ये लहराए सब की शान बढ़ाए जिस के हाथ ये आए आगे बढ़ता जाए झंडा प्यारा प्यारा तारीकी में आए बिस्तर तक पहुँचाए लोरी भी सुनवाये सपने भी दिखलाए सोना प्यारा प्यारा सब को मार भगाए जो देखे डर जाए उल्टी शामत लाए दुश्मन कोई आए डंडा प्यारा प्यारा बारिश में काम आए बाहर ले कर जाए ख़ुद तो भीगा जाए लेकिन हमें बचाए छाता प्यारा प्यारा जगमग रूप दिखाए चंदा रीझा जाए रस्ता भी बतलाए लेकिन हाथ न आए तारा प्यारा प्यारा तल कर मुन्ना खाए ख़ागीना बनवाए सालन में पक जाए मुन्नी को ललचाए अण्डा प्यारा प्यारा जब ये मौसम आए सहत ख़ूब बनाए ढेरों कपड़े लाए फिर भी दूर न जाए जाड़ा प्यारा प्यारा खाना जब भी आए आगे बढ़ कर लाए हम को सब खिलवाए ख़ुद भूका रह जाए चमचा प्यारा प्यारा बाज़ारों में निकले हाथ में सब के लटके जो कुछ भी ये देखे अपने पेट में रखे थैला प्यारा प्यारा मीठा मीठा खाओ मुन्ना बोले लाओ जल्दी से पकवाओ सारा चट कर जाओ हलवा प्यारा प्यारा चाहे कोई बुलाए सब की गोद में जाए देखे तो ललचाए टॉफ़ी बिस्कुट चाय नन्हा प्यारा प्यारा पानी ठंडा कर दे सर पे कटोरा रखे दौड़े आएँ प्यारे जो चाहे वो पी ले मटका प्यारा प्यारा सूरत रंग बिरंगी हालत भी है अच्छी बिस्तर का है साथी आदत में है नर्मी तकिया प्यारा प्यारा गर्मी दूर भगाए ठंडा मौसम लाए थोड़ी बिजली खाए बेहतर काम बनाए पंखा प्यारा प्यारा चम चम चमका जाए बिजली सा लहराए जल्दी जल्दी आए साथ में चलता जाए जूता प्यारा प्यारा सब से पहले जागे पेड़ पे चढ़ के बैठे दीवारों पर भागे कुकड़ूँ कुकड़ूँ चीख़े मुर्ग़ा प्यारा प्यारा घर में दौड़ लगाए बाहर भाग के जाए बिल्ली पर ग़ुर्राए नन्हे को बहलाए कुत्ता प्यारा प्यारा पीठ पे हमें बिठाए सरपट दौड़ के जाए मंज़िल पर पहुँचाए तब जा कर सुसताए घोड़ा प्यारा प्यारा जल्दी से उठ जाए चीख़े और चिल्लाए दाना पत्ते खाए फिर भूका रह जाए बकरा प्यारा प्यारा पिंजरे में पर तोले ठुमक ठुमक कर डोले जब भी मुँह को खोले मीठी बोली बोले तोता पियारे प्यारा रुई को लिपटाए धागा बनता जाए हाथों में बल खाए बल खा कर लहराए तकला प्यारा प्यारा चोरों से लड़ जाए डाकू से टकराए जो भी चाबी लाए उस के बस में आए ताला प्यारा प्यारा सड़कें भी दिखलाए गलियों में ले जाए कौन किधर को जाए भेद ये सब बतलाए नक़्शा प्यारा प्यारा कलियों पर मंड लाए फूलों से बतलाए नाचे झू में गाए मस्ती में लहराए भौंरा प्यारा प्यारा शब को मुँह दिखलाए सूरज से शरमाए बादल में छुप जाए रात होते ही आए चंदा प्यारा प्यारा झील के पास ही बैठे छोटी मछली पकड़े हंस हो कोई जैसे मोती खाने आए बगुला प्यारा प्यारा आँखों से लग जाए राहत ही पहुँचाए काले काले शीशे अब्र के टुकड़ों जैसे चश्मा प्यारा प्यारा मेरा हमदम साथी ऐसा न होगा कोई सूरत भी है प्यारी सीरत भी है अच्छी बस्ता प्यारा प्यारा वक़्त पे सो कर उठे वक़्त पे अपने खेले वक़्त पे पढ़ने जाए अव्वल नंबर आए बच्चा प्यारा प्यारा

Related Nazm

"मुझे मेरे पथ पर जाने दो" क्या बस देह से देह मिले उस को ही परिणय मानोगे तुम कब भावों से भावों के गठबंधन को पहचानोगे कभी सिर्फ़ मधुरिम स्मृति के कुछ पल भी वो कर जाते हैं जब दूर बहुत बैठे हो कर भी मन तृप्त हुए भर जाते हैं परिभाषाओं के इस झंझट में मेरी मानो तो मत उलझो जब शाश्वत को पहचान लिया तो शब्द को क्या पहचानोगे विचलित हूँ तनिक मगर मानो तुम से नहीं ख़ुद से रूठा हूँ क्यूँ देख नहीं पाती हो तुम मैं अपनी शाख से टूटा हूँ थोड़ा सा तो मुझ को भी तुम ख़ुद से मिलने-बतियाने दो माना कि राह निराली है मुझे मेरे पथ पर जाने दो

Gulshan

7 likes

भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ

Lal Chand Falak

14 likes

बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज हिमाला के ऊँचे कलस जगमगाए पहाड़ों के चश्मों को सोना बनाया नए बिल नए ज़ोर इन को सिखाए लिबास-ए-ज़री आबशारों ने पाया नशेबी ज़मीनों पे छींटे उड़ाए घने ऊँचे ऊँचे दरख़्तों का मंज़र ये हैं आज सब आब-ए-ज़र में नहाए मगर इन दरख़्तों के साए में ऐ दिल हज़ारों बरस के ये ठिठुरे से पौदे हज़ारों बरस के ये सिमटे से पौदे ये हैं आज भी सर्द बेहाल बे-दम ये हैं आज भी अपने सर को झुकाए अरे ओ नई शान के मेरे सूरज तिरी आब में और भी ताब आए तिरे पास ऐसी भी कोई किरन है जो ऐसे दरख़्तों में भी राह पाए जो ठहरे हुओं को जो सिमटे हुओं को हरारत भी बख़्शे गले भी लगाए बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज हिमाला के ऊँचे कलस जगमगाए फ़ज़ाओं में होने लगी बारिश-ए-ज़र कोई नाज़नीं जैसे अफ़्शाँ छुड़ाए दमकने लगे यूँँ ख़लाओं के ज़र्रे कि तारों की दुनिया को भी रश्क आए हमारे उक़ाबों ने अंगड़ाइयाँ लीं सुनहरी हवाओं में पर फड़फड़ाए फ़ुज़ूँ-तर हुआ नश्शा-ए-कामरानी तजस्सुस की आँखों में डोरे से आए क़दम चूमने बर्क़-ओ-बाद आब-ओ-आतिश ब-सद-शौक़ दौड़े ब-सद-इज्ज़ आए मगर बर्क़ ओ आतिश के साए में ऐ दिल ये सदियों के ख़ुद-रफ़्ता नाशाद ताइर ये सदियों के पर-बस्ता बर्बाद ताइर ये हैं आज भी मुज़्महिल दिल-गिरफ़्ता ये हैं आज भी अपने सर को छुपाए अरे ओ नई शान के मेरे सूरज तिरी आब में और भी ताब आए तिरे पास ऐसी भी कोई किरन है उन्हें पंजा-ए-तेज़ से जो बचाए इन्हें जो नए बाल-ओ-पर आ के बख़्शे इन्हें जो नए सिर से उड़ना सिखाए

Moin Ahsan Jazbi

6 likes

"नाकारा" कौन आया है कोई नहीं आया है पागल तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है अच्छा यूँँ है बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने तेज़-रवी की राह-गुज़र से मेहनत-कोश और काम के दिन की धूल आई है धूप आई है जाने ये किस ध्यान में था मैं आता तो अच्छा कौन आता किस को आना था कौन आता

Jaun Elia

13 likes

"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

111 likes

More from Aadil Aseer Dehlvi

नमाज़ को जो जाओगे ख़ुदा का क़ुर्ब पाओगे कहेंगे तुम को नेक सब मिलेगा तुम को प्यारा रब उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को है मुख़्तसर सी ज़िंदगी नहीं है अच्छी काहिली ख़ुदा का उठ के नाम लो चलो तो सब ये कहो उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को वुज़ू करो वुज़ू करो मगर ध्यान ये रखो वुज़ू से तन भी साफ़ हो वुज़ू से मन भी साफ़ हो उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को सदा रखें ये ध्यान अब कि ख़त्म हो अज़ान जब हर एक काम छोड़ दें ख़ुदा से दिल को जोड़ लें उठो उठो नमाज़ को चलो चलो नमाज़ को

Aadil Aseer Dehlvi

0 likes

ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है निकलता है मशरिक़ से किस तरह सूरज फ़लक पर चमकता है ये चाँद क्यूँँकर कहाँ से समुंदर में आते हैं तूफ़ाँ उजाला है कैसा ये शम्स-ओ-क़मर पर ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है बहारों का गुल को पता किस तरह है अदा ग़ुंचों को ये चटकने की क्यूँ दी कहाँ से है आया ख़िज़ाँ का ये मौसम घटा को ये ख़ूबी बरसने की क्यूँ दी ख़ुदा की ये बातें ख़ुदा जानता है

Aadil Aseer Dehlvi

1 likes

नादाँ कोई इक रोज़ जो जंगल में गया अख़रोट के बाग़ात का मंज़र देखा है कितना बड़ा पेड़ तो फल छोटा सा ये सोच के वो और भी हैरान हुआ इस इतने बड़े पेड़ पे नन्हा सा फल तरबूज़ यहाँ होता तो क्या अच्छा था तरबूज़ को देखो तो ज़रा सी है बेल क़ुदरत ने दिखाए हैं तमाशे क्या क्या तरबूज़ कहाँ और कहाँ ये अख़रोट क्या भेद है मेरी न समझ में आया इस सोच में था कि इक हवा का झक्कड़ आँधी सा बगूला सा बिफर कर उट्ठा जंगल के दरख़्तों को हिला कर उस ने अख़रोट को नादान के सर पर फेंका सर पर पड़ा अख़रोट तो चीख़ा नादान तरबूज़ जो होता तो मैं मर ही जाता हिकमत से कोई काम नहीं है ख़ाली जिस को भी जहाँ तू ने किया है पैदा उस की जगह उस ने नहीं बेहतर कोई अब राज़ ये मेरी भी समझ में आया

Aadil Aseer Dehlvi

1 likes

अक्सर हमारे ख़्वाब में आती हैं टॉफ़ियाँ खुल जाए फिर जो आँख सताती हैं टॉफ़ियाँ तक़रीब घर में हो कोई स्कूल का हो जश्न मौक़ा मिले तो रंग जमाती हैं टॉफ़ियाँ खाएँ मज़े मज़े से बड़े भाई जान भी बाजी भी ख़ूब शौक़ से खाती हैं टॉफ़ियाँ अब्बा भी ले के आते हैं चीज़ें नई नई अम्मी भी मार्किट से तो लाती हैं टॉफ़ियाँ बिल्ली को ख़्वाब क्या नज़र आता है क्या कहीं हम को तो ख़्वाब में नज़र आती हैं टॉफ़ियाँ मैडम हमारी अच्छी हैं स्कूल की सभी अच्छी हैं सब से वो जो खिलाती हैं टॉफ़ियाँ देखें जो टॉफ़ियाँ तो वो हँसते ज़रूर हैं बच्चों को रोते रोते हँसाती हैं टॉफ़ियाँ 'आदिल' हैं हम भी ज़ाइक़े से उन के बा-ख़बर पानी हमारे मुँह में भी लाती हैं टॉफ़ियाँ

Aadil Aseer Dehlvi

1 likes

आओ हम जंगल को बचाएँ पेड़ न काटें पेड़ उगाएँ हर दिल में एहसास ये रख दें बात ये हर इंसाँ को बताएँ पेड़ न काटें आग की ख़ातिर ईंधन कोई और जलाएँ ख़तरे में हैं पेड़ हमारे ख़तरे से हम इन को बचाएँ नई नस्ल की ख़ातिर 'आदिल' आओ हम भी पेड़ लगाएँ

Aadil Aseer Dehlvi

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Aadil Aseer Dehlvi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Aadil Aseer Dehlvi's nazm.