हरी मस्जिद की हल्की धूप में ताज़ा वज़ू से गीले पाँव और टपकती आस्तीनों की चमक में लोग थे जो सफ़-ब-सफ़ अपना जनाज़ा पढ़ रहे थे सदर दरवाज़े से इक बारूद में डूबा हुआ जन्नत का सट्टा-बाज़ और हूरों का सौदागर अचानक सहव का सज्दा अदा करने को आया और हरी मस्जिद ने अपना रंग बदला क़ुर्मुज़ी दहलीज़ पर जितने भी जूते थे वो ताज़ा ख़ून पर पहले तो तेरे और फिर जमते लहू पर जम गए मैं बचपन में कई मुल्कों के सिक्के और टिकटें जमा करता था बयाज़-ए-ज़हन के तारीक पन्नों पर मैं अब जिस्मों के टुकड़े जमा करता हूँ मिरी एल्बम के सफ़्हों की तहों से ख़ूँ निकलता है मिरी आँखों से रिसता है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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नश्तर ज़ख़्म लगाता है तो नश्तर से खुलवाता हूँ सिलवाता हूँ फनेर नील उतारता है तो मनके में रिसवाता हूँ खिंचवाता हूँ पानी में गर्मी घोलता है तो पानी का ठंडा प्याला मँगवाता हूँ जब शब-ए-ज़िंदा-दारी में मय चढ़ती है तो सुब्ह सुबूही की सीढ़ी लगवाता हूँ औरत चरका देती है तो औरत को बुलवाता हूँ दिखलाता हूँ इक आदत के घाव पे दूसरी आदत बाँधा करता हूँ मैं औरत के ज़ख़्म के ऊपर औरत बाँधा करता हूँ
Waheed Ahmad
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अभी लंगर नहीं डाला तिकोनी बादबाँ की रस्सियाँ ढीली नहीं कीं अभी मस्तूल अपने पाँव के ऊपर खड़ा है सफ़ीने के भरे सीने में साँसों का ज़ख़ीरा सरसराता है अभी हम नाक़िदाना फ़ासले से अजनबी साहिल के तेवर देखते हैं खुजूरों के दरख़्तों में छुपी सरगोशियाँ सुनने की ख़ातिर हम ने अपने कान ज़िंदा कर दिए हैं पहाड़ी में सरकते तीर-अंदाजों के कारोबार पे आँखें लगा दी हैं हमें तुम अपने साहिल पर पज़ीराई के किस अंदाज़ के क़ाबिल समझते हो ये तुम पर है अगर तुम तीर छोड़ोगे तो हम ने अपनी आँखों के सिवा सारा बदन पिघले हुए लोहे के पानी में डुबोया है हमारा हाथ तरकश के खुले मुँह पर धरा है कमाँ की ख़ुश्क और अकड़ी ज़बाँ तो मुद्दतों से तीर चखने के लिए बेचैन है तुम्हें ये इल्म होना चाहिए कि हम जब अपने तीर पे दुश्मन की बाएँ आँख लिखते हैं तो बाएँ आँख होती है कभी अबरू नहीं होता ये तुम पर है अगर तुम हम को सीने से लगाने के लिए साहिल पे आ कर अपने बाज़ू खोल दोगे तो हम भी फड़फड़ाते बादबाँ की रस्सियों को खोल देंगे अगर तुम तीर अंदाज़ों की टोली को पहाड़ी से उतारोगे तो हम भी जिस्म से लिपटा हुआ लोहा गिरा देंगे तुम्हारे हर अमल को हम बड़ी ईमान-दारी से, बड़े इंसाफ़ से रद्द-ए-अमल देंगे तुम्हें ये इल्म होना चाहिए कि आँख के बदले में आँख और दिल के बदले दिल हमारा ज़ाबता है तुम्हारा हुस्न-ए-ज़न है सोच के हर ज़ाविए से सोचना कि हम जो पानी पर खड़े हैं किस पज़ीराई के क़ाबिल हैं मगर कुछ भी करो मद्द-ए-नज़र रखना कि हम मद्द-ए-मुक़ाबिल हैं
Waheed Ahmad
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मैं आख़िर किस की जागत जागता हूँ पपोटों में ये किस पानी का नमकीं ज़ाइक़ा है मिरी पुतली में किस की रात है और कार्निया में कौन से युग का सवेरा है ये दिन भर कौन मिज़्गानी किवाड़ों को मुसलसल खोलता और बंद करता है मिरी तार-ए-नज़र पर बैठ कर आख़िर ज़माने में नज़र किस की उतरती है मैं आँखों से ये किस मंज़र के अंदर भागता हूँ मैं आख़िर किस की जागत जागता हूँ? भला मैं किस का सोना सो रहा हूँ ये रेग-ख़्वाब पर बनते बिगड़ते क्या निशाँ हैं मिरे अंदर तो जितने क़ाफ़िले चलते हैं सारे अजनबी हैं मैं हर इक ख़्वाब में कोई शनासा ढूँडता हूँ ये कैसी औरतें हैं जो सर में रेत का अफ़्शाँ भरे मुझ को जकड़ती हैं जो बाद-अज़-इख़्तिलात आहों से चीख़ों से पिघल कर रेत हो जाती हैं गीली रेत में!! ये बच्चे किस सदी के हैं जो अपने क़हक़हा-आवर खिलौने मेरे हाथों में थमा कर भाग जाते हैं ये किस माबद के जोगी हैं सहीफ़ों की ज़बाँ में बोलते हैं इन के फ़र्ग़ुल फड़फड़ाते हैं हवा में रीश उड़ती है ये मैं किस की ख़ुशी को हँस रहा हूँ किस का रोना रो रहा हूँ भला मैं किस का सोना सो रहा हूँ? मैं आख़िर किस का जीना जी रहा हूँ मैं सहरा का शजर हूँ जिस की शाख़ें घोंसलों से झुक गई हैं किराए का मकाँ हूँ जिस के कमरों में पराए लोग रहते हैं फ़राज़-ए-कोह पर कोई पुराना ग़ार हूँ मैं हवा से गूँजता साया-ज़दा वीराँ खंडर हूँ कभी हूँ ईस्तादा और कभी मिस्मार हूँ मैं फ़सील-ए-शहर हों या साया-ए-दीवार हूँ मैं मिरे अंदर से ही कोई मुझे बतलाए मैं क्या हूँ? मिरे ख़लियों के गीले मरकज़ों में बंद डी-एन-ए मिरे माँ बाप का है जो इस के गिर्द पानी है वो किस बेचैन सय्यारे के सागर से उठा है मैं किस को भोगता हूँ ये आख़िर कौन मुझ में गूँजता है सनसनाता है मैं आख़िर किस का होना हो रहा हूँ
Waheed Ahmad
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(तीसरी दुनिया के तमाम लोगों के नाम) अजब हादसा है कि बचपन में हम जिन खिलौनों से खेले थे अब वो खिलौने हमारे ही हालात से खेलते हैं वो नाज़ुक मुजस्स में वो रंगीन गुड़ियाएँ तय्यारे पिस्तौल फ़ौजी सिपाही कभी जो हमारे इशारों के मोहताज थे आफ़रीं तुझ पे मेयार-ए-गर्दिश कि अब वो खिलौने हमें चाबियाँ भर रहे हैं हमारे मवेशी हमारे ही बाग़ात को चर रहे हैं खिलौनों के इस खेल में हम तो यूँँ खो गए हैं कि हर काम की हम से उम्मीद रख लो अगर कोई तकवे की चाबी घुमा दे तो दाढ़ी बढ़ा लें अगर कोई थोड़ी सी क़ीमत लगा कर किसी शख़्स का घर बता दे तो अगले ही पल में उस की गर्दन उड़ा दें हमारा है क्या हम तो अंधे मुअज़्ज़िन हैं बाज़ू पकड़ के जो गरजे में ले जाओगे तो भी मर्यम की तस्वीर के सामने उँगलियाँ कान में ठूँस लेंगे हमारा है क्या हम तो पत्थर की वो मूर्ती हैं जिसे चाहे सज्दा करो या तमाचा लगा दो मगर वो तो हाथों से छाती छुपाए सदा मुस्कुराती रहेगी
Waheed Ahmad
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वो दस्तकें जो तुम्हारी पोरों ने इन दरों में उंडेल दी हैं वो आज भी इन के चोब-रेशों में जागती हैं तुम्हारे क़दमों की चाप चुप साअ'तों में भी एक एक ज़र्रे में बोलती है तुम्हारे लहजे के मीठे घाव से आज भी मेरे घर का कुड़ेल चटान-सीना छना हुआ है कोई न जाने कि हँसते बसते घरों के अंदर भी घर बने हैं जहाँ मुक़फ़्फ़ल हैं बीते लम्हे सबीह दिन और मलीह रातें ये वाक़िआ' है कि जो इलाक़ा तुम्हारे जल्वों की ज़द में आया उजड़ गया है उजाड़ आँगन तुम्हारी पहचान हैं यहाँ लोग ख़ुद को कैसे शनाख़तेंगे
Waheed Ahmad
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