nazmKuch Alfaaz

नश्तर ज़ख़्म लगाता है तो नश्तर से खुलवाता हूँ सिलवाता हूँ फनेर नील उतारता है तो मनके में रिसवाता हूँ खिंचवाता हूँ पानी में गर्मी घोलता है तो पानी का ठंडा प्याला मँगवाता हूँ जब शब-ए-ज़िंदा-दारी में मय चढ़ती है तो सुब्ह सुबूही की सीढ़ी लगवाता हूँ औरत चरका देती है तो औरत को बुलवाता हूँ दिखलाता हूँ इक आदत के घाव पे दूसरी आदत बाँधा करता हूँ मैं औरत के ज़ख़्म के ऊपर औरत बाँधा करता हूँ

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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हरी मस्जिद की हल्की धूप में ताज़ा वज़ू से गीले पाँव और टपकती आस्तीनों की चमक में लोग थे जो सफ़-ब-सफ़ अपना जनाज़ा पढ़ रहे थे सदर दरवाज़े से इक बारूद में डूबा हुआ जन्नत का सट्टा-बाज़ और हूरों का सौदागर अचानक सहव का सज्दा अदा करने को आया और हरी मस्जिद ने अपना रंग बदला क़ुर्मुज़ी दहलीज़ पर जितने भी जूते थे वो ताज़ा ख़ून पर पहले तो तेरे और फिर जमते लहू पर जम गए मैं बचपन में कई मुल्कों के सिक्के और टिकटें जमा करता था बयाज़-ए-ज़हन के तारीक पन्नों पर मैं अब जिस्मों के टुकड़े जमा करता हूँ मिरी एल्बम के सफ़्हों की तहों से ख़ूँ निकलता है मिरी आँखों से रिसता है

Waheed Ahmad

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(तीसरी दुनिया के तमाम लोगों के नाम) अजब हादसा है कि बचपन में हम जिन खिलौनों से खेले थे अब वो खिलौने हमारे ही हालात से खेलते हैं वो नाज़ुक मुजस्स में वो रंगीन गुड़ियाएँ तय्यारे पिस्तौल फ़ौजी सिपाही कभी जो हमारे इशारों के मोहताज थे आफ़रीं तुझ पे मेयार-ए-गर्दिश कि अब वो खिलौने हमें चाबियाँ भर रहे हैं हमारे मवेशी हमारे ही बाग़ात को चर रहे हैं खिलौनों के इस खेल में हम तो यूँँ खो गए हैं कि हर काम की हम से उम्मीद रख लो अगर कोई तकवे की चाबी घुमा दे तो दाढ़ी बढ़ा लें अगर कोई थोड़ी सी क़ीमत लगा कर किसी शख़्स का घर बता दे तो अगले ही पल में उस की गर्दन उड़ा दें हमारा है क्या हम तो अंधे मुअज़्ज़िन हैं बाज़ू पकड़ के जो गरजे में ले जाओगे तो भी मर्यम की तस्वीर के सामने उँगलियाँ कान में ठूँस लेंगे हमारा है क्या हम तो पत्थर की वो मूर्ती हैं जिसे चाहे सज्दा करो या तमाचा लगा दो मगर वो तो हाथों से छाती छुपाए सदा मुस्कुराती रहेगी

Waheed Ahmad

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मैं आख़िर किस की जागत जागता हूँ पपोटों में ये किस पानी का नमकीं ज़ाइक़ा है मिरी पुतली में किस की रात है और कार्निया में कौन से युग का सवेरा है ये दिन भर कौन मिज़्गानी किवाड़ों को मुसलसल खोलता और बंद करता है मिरी तार-ए-नज़र पर बैठ कर आख़िर ज़माने में नज़र किस की उतरती है मैं आँखों से ये किस मंज़र के अंदर भागता हूँ मैं आख़िर किस की जागत जागता हूँ? भला मैं किस का सोना सो रहा हूँ ये रेग-ख़्वाब पर बनते बिगड़ते क्या निशाँ हैं मिरे अंदर तो जितने क़ाफ़िले चलते हैं सारे अजनबी हैं मैं हर इक ख़्वाब में कोई शनासा ढूँडता हूँ ये कैसी औरतें हैं जो सर में रेत का अफ़्शाँ भरे मुझ को जकड़ती हैं जो बाद-अज़-इख़्तिलात आहों से चीख़ों से पिघल कर रेत हो जाती हैं गीली रेत में!! ये बच्चे किस सदी के हैं जो अपने क़हक़हा-आवर खिलौने मेरे हाथों में थमा कर भाग जाते हैं ये किस माबद के जोगी हैं सहीफ़ों की ज़बाँ में बोलते हैं इन के फ़र्ग़ुल फड़फड़ाते हैं हवा में रीश उड़ती है ये मैं किस की ख़ुशी को हँस रहा हूँ किस का रोना रो रहा हूँ भला मैं किस का सोना सो रहा हूँ? मैं आख़िर किस का जीना जी रहा हूँ मैं सहरा का शजर हूँ जिस की शाख़ें घोंसलों से झुक गई हैं किराए का मकाँ हूँ जिस के कमरों में पराए लोग रहते हैं फ़राज़-ए-कोह पर कोई पुराना ग़ार हूँ मैं हवा से गूँजता साया-ज़दा वीराँ खंडर हूँ कभी हूँ ईस्तादा और कभी मिस्मार हूँ मैं फ़सील-ए-शहर हों या साया-ए-दीवार हूँ मैं मिरे अंदर से ही कोई मुझे बतलाए मैं क्या हूँ? मिरे ख़लियों के गीले मरकज़ों में बंद डी-एन-ए मिरे माँ बाप का है जो इस के गिर्द पानी है वो किस बेचैन सय्यारे के सागर से उठा है मैं किस को भोगता हूँ ये आख़िर कौन मुझ में गूँजता है सनसनाता है मैं आख़िर किस का होना हो रहा हूँ

Waheed Ahmad

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वो क्या था क़हक़हा था चीख़ थी चिंघाड़ थी या दहाड़ थी? उस ने समा'अत चीरती आवाज़ का गोला उतरती रात की भीगी हुई पहनाई में दाग़ा तो मेरे पाँव के नीचे ज़मीन चलने लगी ये तुम ने क्या किया मेरी दबी आवाज़ ने पूछा तो वो इक घूँट पानी से फटी आवाज़ को सी कर किसी अंधे कुएँ की तह से बोला मुझे जब भी मीरी बे-दर्द सोचें तंग करती हैं ज़माने की रविश से जब मिरी ख़ुर्द-रौ दलीलें जंग करती हैं किताबें जब मिरे सर का निशाना बाँध के अपनी इबारत संग करती हैं तो मुझ से और कुछ भी हो नहीं सकता मैं ये बे-दर्द आवाज़ा लगाता हूँ वगरना सो नहीं सकता

Waheed Ahmad

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अभी लंगर नहीं डाला तिकोनी बादबाँ की रस्सियाँ ढीली नहीं कीं अभी मस्तूल अपने पाँव के ऊपर खड़ा है सफ़ीने के भरे सीने में साँसों का ज़ख़ीरा सरसराता है अभी हम नाक़िदाना फ़ासले से अजनबी साहिल के तेवर देखते हैं खुजूरों के दरख़्तों में छुपी सरगोशियाँ सुनने की ख़ातिर हम ने अपने कान ज़िंदा कर दिए हैं पहाड़ी में सरकते तीर-अंदाजों के कारोबार पे आँखें लगा दी हैं हमें तुम अपने साहिल पर पज़ीराई के किस अंदाज़ के क़ाबिल समझते हो ये तुम पर है अगर तुम तीर छोड़ोगे तो हम ने अपनी आँखों के सिवा सारा बदन पिघले हुए लोहे के पानी में डुबोया है हमारा हाथ तरकश के खुले मुँह पर धरा है कमाँ की ख़ुश्क और अकड़ी ज़बाँ तो मुद्दतों से तीर चखने के लिए बेचैन है तुम्हें ये इल्म होना चाहिए कि हम जब अपने तीर पे दुश्मन की बाएँ आँख लिखते हैं तो बाएँ आँख होती है कभी अबरू नहीं होता ये तुम पर है अगर तुम हम को सीने से लगाने के लिए साहिल पे आ कर अपने बाज़ू खोल दोगे तो हम भी फड़फड़ाते बादबाँ की रस्सियों को खोल देंगे अगर तुम तीर अंदाज़ों की टोली को पहाड़ी से उतारोगे तो हम भी जिस्म से लिपटा हुआ लोहा गिरा देंगे तुम्हारे हर अमल को हम बड़ी ईमान-दारी से, बड़े इंसाफ़ से रद्द-ए-अमल देंगे तुम्हें ये इल्म होना चाहिए कि आँख के बदले में आँख और दिल के बदले दिल हमारा ज़ाबता है तुम्हारा हुस्न-ए-ज़न है सोच के हर ज़ाविए से सोचना कि हम जो पानी पर खड़े हैं किस पज़ीराई के क़ाबिल हैं मगर कुछ भी करो मद्द-ए-नज़र रखना कि हम मद्द-ए-मुक़ाबिल हैं

Waheed Ahmad

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