(तीसरी दुनिया के तमाम लोगों के नाम) अजब हादसा है कि बचपन में हम जिन खिलौनों से खेले थे अब वो खिलौने हमारे ही हालात से खेलते हैं वो नाज़ुक मुजस्स में वो रंगीन गुड़ियाएँ तय्यारे पिस्तौल फ़ौजी सिपाही कभी जो हमारे इशारों के मोहताज थे आफ़रीं तुझ पे मेयार-ए-गर्दिश कि अब वो खिलौने हमें चाबियाँ भर रहे हैं हमारे मवेशी हमारे ही बाग़ात को चर रहे हैं खिलौनों के इस खेल में हम तो यूँँ खो गए हैं कि हर काम की हम से उम्मीद रख लो अगर कोई तकवे की चाबी घुमा दे तो दाढ़ी बढ़ा लें अगर कोई थोड़ी सी क़ीमत लगा कर किसी शख़्स का घर बता दे तो अगले ही पल में उस की गर्दन उड़ा दें हमारा है क्या हम तो अंधे मुअज़्ज़िन हैं बाज़ू पकड़ के जो गरजे में ले जाओगे तो भी मर्यम की तस्वीर के सामने उँगलियाँ कान में ठूँस लेंगे हमारा है क्या हम तो पत्थर की वो मूर्ती हैं जिसे चाहे सज्दा करो या तमाचा लगा दो मगर वो तो हाथों से छाती छुपाए सदा मुस्कुराती रहेगी
Related Nazm
"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
20 likes
"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
16 likes
"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा
Rakesh Mahadiuree
22 likes
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
73 likes
मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
37 likes
More from Waheed Ahmad
हरी मस्जिद की हल्की धूप में ताज़ा वज़ू से गीले पाँव और टपकती आस्तीनों की चमक में लोग थे जो सफ़-ब-सफ़ अपना जनाज़ा पढ़ रहे थे सदर दरवाज़े से इक बारूद में डूबा हुआ जन्नत का सट्टा-बाज़ और हूरों का सौदागर अचानक सहव का सज्दा अदा करने को आया और हरी मस्जिद ने अपना रंग बदला क़ुर्मुज़ी दहलीज़ पर जितने भी जूते थे वो ताज़ा ख़ून पर पहले तो तेरे और फिर जमते लहू पर जम गए मैं बचपन में कई मुल्कों के सिक्के और टिकटें जमा करता था बयाज़-ए-ज़हन के तारीक पन्नों पर मैं अब जिस्मों के टुकड़े जमा करता हूँ मिरी एल्बम के सफ़्हों की तहों से ख़ूँ निकलता है मिरी आँखों से रिसता है
Waheed Ahmad
0 likes
(गेब्रियल गर्सिमक्रूज़ के अंदाज़ में) जब वो पैदा हुआ तो उस की दोनों आँखें दहक रही थीं दोनों पपोटे फटे हुए थे पुतली की दीवार से लटके आँखों के पर्दे आगे से हटे हुए थे जब उस की आँखें हिलतीं तो दीवारों पे उन की लौ हिलने लगती थी वो पैदा होने से पहले सारे धोने धो आया था अपने जन्म का सारा रोना रो आया था
Waheed Ahmad
0 likes
नश्तर ज़ख़्म लगाता है तो नश्तर से खुलवाता हूँ सिलवाता हूँ फनेर नील उतारता है तो मनके में रिसवाता हूँ खिंचवाता हूँ पानी में गर्मी घोलता है तो पानी का ठंडा प्याला मँगवाता हूँ जब शब-ए-ज़िंदा-दारी में मय चढ़ती है तो सुब्ह सुबूही की सीढ़ी लगवाता हूँ औरत चरका देती है तो औरत को बुलवाता हूँ दिखलाता हूँ इक आदत के घाव पे दूसरी आदत बाँधा करता हूँ मैं औरत के ज़ख़्म के ऊपर औरत बाँधा करता हूँ
Waheed Ahmad
1 likes
मैं आख़िर किस की जागत जागता हूँ पपोटों में ये किस पानी का नमकीं ज़ाइक़ा है मिरी पुतली में किस की रात है और कार्निया में कौन से युग का सवेरा है ये दिन भर कौन मिज़्गानी किवाड़ों को मुसलसल खोलता और बंद करता है मिरी तार-ए-नज़र पर बैठ कर आख़िर ज़माने में नज़र किस की उतरती है मैं आँखों से ये किस मंज़र के अंदर भागता हूँ मैं आख़िर किस की जागत जागता हूँ? भला मैं किस का सोना सो रहा हूँ ये रेग-ख़्वाब पर बनते बिगड़ते क्या निशाँ हैं मिरे अंदर तो जितने क़ाफ़िले चलते हैं सारे अजनबी हैं मैं हर इक ख़्वाब में कोई शनासा ढूँडता हूँ ये कैसी औरतें हैं जो सर में रेत का अफ़्शाँ भरे मुझ को जकड़ती हैं जो बाद-अज़-इख़्तिलात आहों से चीख़ों से पिघल कर रेत हो जाती हैं गीली रेत में!! ये बच्चे किस सदी के हैं जो अपने क़हक़हा-आवर खिलौने मेरे हाथों में थमा कर भाग जाते हैं ये किस माबद के जोगी हैं सहीफ़ों की ज़बाँ में बोलते हैं इन के फ़र्ग़ुल फड़फड़ाते हैं हवा में रीश उड़ती है ये मैं किस की ख़ुशी को हँस रहा हूँ किस का रोना रो रहा हूँ भला मैं किस का सोना सो रहा हूँ? मैं आख़िर किस का जीना जी रहा हूँ मैं सहरा का शजर हूँ जिस की शाख़ें घोंसलों से झुक गई हैं किराए का मकाँ हूँ जिस के कमरों में पराए लोग रहते हैं फ़राज़-ए-कोह पर कोई पुराना ग़ार हूँ मैं हवा से गूँजता साया-ज़दा वीराँ खंडर हूँ कभी हूँ ईस्तादा और कभी मिस्मार हूँ मैं फ़सील-ए-शहर हों या साया-ए-दीवार हूँ मैं मिरे अंदर से ही कोई मुझे बतलाए मैं क्या हूँ? मिरे ख़लियों के गीले मरकज़ों में बंद डी-एन-ए मिरे माँ बाप का है जो इस के गिर्द पानी है वो किस बेचैन सय्यारे के सागर से उठा है मैं किस को भोगता हूँ ये आख़िर कौन मुझ में गूँजता है सनसनाता है मैं आख़िर किस का होना हो रहा हूँ
Waheed Ahmad
1 likes
ये होता है कोई माने न माने ये तो होता है किसी फैले हुए लम्हे किसी सिमटे हुए दिन या अकेली रात में होता है सब के साथ होता है बदन के ख़ून का लोहा ख़यालों के अलाव में उबल कर सुर्ख़ नेज़े की अनी को सर की जानिब फेंकता है और फिर शहतीर गिर जाता है जिस पर ख़ुद फ़रेबी पतली ईंटों की चिनाई करती रहती थी ये मेरा माल फ़ित्ना है मिरे माँ बाप साया हैं मिरी औलाद फ़ित्ना है बहुत तन्हा है इंसाँ कीमिया-गर के प्याले से गिरे क़तरे के पारे की तरह तन्हा सफ़र करते हुए तारों के झुरमुट में खड़े क़ुत्बी सितारे की तरह तन्हा ये सब हँसते हुए लब रोती आँखें हंजरे के जोफ़ से लहरा के निकली सारी आवाज़ें ये गाते नाचते लोगों के झुरमुट इश्वा ओ नाज़ ओ अदास खींचते पैकर ये सारी सैर-बीनी ख़ुद-फ़रेबी है ये सारी यार-बाशी और सब सहरा-नशीनी ख़ुद-फ़रेबी है मैं अपनी माँ के पहले दूध से दर्द-ए-तह हर जाम तक तन्हाई के इक ख़त पे चलता जा रहा हूँ मैं अकेला हूँ मैं बज़्म दोस्ताँ के क़हक़हों के गूँज में डूबे सराबी दश्त की लर्ज़िश में पानी ढूँडता हूँ मैं अकेला हूँ मिरी तन्हाई माँ जाई जो मेरे साथ पैदा हो के मेले में कहीं गुम हो गई थी मेरी बू की ढूँडती मेरे लहू को सूँघती वापस चली आई है मेरे सामने बैठी है मुझ को देखती है उस का हर तार-ए-नज़र आँखों से दाख़िल हो के मेरी खोपड़ी की पुश्त से बाहर निकलता है मिरी तन्हाई सनअत-कार है वो मेरी शिरयानों से लहू छान कर नेज़े बनाती है
Waheed Ahmad
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Waheed Ahmad.
Similar Moods
More moods that pair well with Waheed Ahmad's nazm.







