ये होता है कोई माने न माने ये तो होता है किसी फैले हुए लम्हे किसी सिमटे हुए दिन या अकेली रात में होता है सब के साथ होता है बदन के ख़ून का लोहा ख़यालों के अलाव में उबल कर सुर्ख़ नेज़े की अनी को सर की जानिब फेंकता है और फिर शहतीर गिर जाता है जिस पर ख़ुद फ़रेबी पतली ईंटों की चिनाई करती रहती थी ये मेरा माल फ़ित्ना है मिरे माँ बाप साया हैं मिरी औलाद फ़ित्ना है बहुत तन्हा है इंसाँ कीमिया-गर के प्याले से गिरे क़तरे के पारे की तरह तन्हा सफ़र करते हुए तारों के झुरमुट में खड़े क़ुत्बी सितारे की तरह तन्हा ये सब हँसते हुए लब रोती आँखें हंजरे के जोफ़ से लहरा के निकली सारी आवाज़ें ये गाते नाचते लोगों के झुरमुट इश्वा ओ नाज़ ओ अदास खींचते पैकर ये सारी सैर-बीनी ख़ुद-फ़रेबी है ये सारी यार-बाशी और सब सहरा-नशीनी ख़ुद-फ़रेबी है मैं अपनी माँ के पहले दूध से दर्द-ए-तह हर जाम तक तन्हाई के इक ख़त पे चलता जा रहा हूँ मैं अकेला हूँ मैं बज़्म दोस्ताँ के क़हक़हों के गूँज में डूबे सराबी दश्त की लर्ज़िश में पानी ढूँडता हूँ मैं अकेला हूँ मिरी तन्हाई माँ जाई जो मेरे साथ पैदा हो के मेले में कहीं गुम हो गई थी मेरी बू की ढूँडती मेरे लहू को सूँघती वापस चली आई है मेरे सामने बैठी है मुझ को देखती है उस का हर तार-ए-नज़र आँखों से दाख़िल हो के मेरी खोपड़ी की पुश्त से बाहर निकलता है मिरी तन्हाई सनअत-कार है वो मेरी शिरयानों से लहू छान कर नेज़े बनाती है
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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हरी मस्जिद की हल्की धूप में ताज़ा वज़ू से गीले पाँव और टपकती आस्तीनों की चमक में लोग थे जो सफ़-ब-सफ़ अपना जनाज़ा पढ़ रहे थे सदर दरवाज़े से इक बारूद में डूबा हुआ जन्नत का सट्टा-बाज़ और हूरों का सौदागर अचानक सहव का सज्दा अदा करने को आया और हरी मस्जिद ने अपना रंग बदला क़ुर्मुज़ी दहलीज़ पर जितने भी जूते थे वो ताज़ा ख़ून पर पहले तो तेरे और फिर जमते लहू पर जम गए मैं बचपन में कई मुल्कों के सिक्के और टिकटें जमा करता था बयाज़-ए-ज़हन के तारीक पन्नों पर मैं अब जिस्मों के टुकड़े जमा करता हूँ मिरी एल्बम के सफ़्हों की तहों से ख़ूँ निकलता है मिरी आँखों से रिसता है
Waheed Ahmad
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नश्तर ज़ख़्म लगाता है तो नश्तर से खुलवाता हूँ सिलवाता हूँ फनेर नील उतारता है तो मनके में रिसवाता हूँ खिंचवाता हूँ पानी में गर्मी घोलता है तो पानी का ठंडा प्याला मँगवाता हूँ जब शब-ए-ज़िंदा-दारी में मय चढ़ती है तो सुब्ह सुबूही की सीढ़ी लगवाता हूँ औरत चरका देती है तो औरत को बुलवाता हूँ दिखलाता हूँ इक आदत के घाव पे दूसरी आदत बाँधा करता हूँ मैं औरत के ज़ख़्म के ऊपर औरत बाँधा करता हूँ
Waheed Ahmad
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अभी लंगर नहीं डाला तिकोनी बादबाँ की रस्सियाँ ढीली नहीं कीं अभी मस्तूल अपने पाँव के ऊपर खड़ा है सफ़ीने के भरे सीने में साँसों का ज़ख़ीरा सरसराता है अभी हम नाक़िदाना फ़ासले से अजनबी साहिल के तेवर देखते हैं खुजूरों के दरख़्तों में छुपी सरगोशियाँ सुनने की ख़ातिर हम ने अपने कान ज़िंदा कर दिए हैं पहाड़ी में सरकते तीर-अंदाजों के कारोबार पे आँखें लगा दी हैं हमें तुम अपने साहिल पर पज़ीराई के किस अंदाज़ के क़ाबिल समझते हो ये तुम पर है अगर तुम तीर छोड़ोगे तो हम ने अपनी आँखों के सिवा सारा बदन पिघले हुए लोहे के पानी में डुबोया है हमारा हाथ तरकश के खुले मुँह पर धरा है कमाँ की ख़ुश्क और अकड़ी ज़बाँ तो मुद्दतों से तीर चखने के लिए बेचैन है तुम्हें ये इल्म होना चाहिए कि हम जब अपने तीर पे दुश्मन की बाएँ आँख लिखते हैं तो बाएँ आँख होती है कभी अबरू नहीं होता ये तुम पर है अगर तुम हम को सीने से लगाने के लिए साहिल पे आ कर अपने बाज़ू खोल दोगे तो हम भी फड़फड़ाते बादबाँ की रस्सियों को खोल देंगे अगर तुम तीर अंदाज़ों की टोली को पहाड़ी से उतारोगे तो हम भी जिस्म से लिपटा हुआ लोहा गिरा देंगे तुम्हारे हर अमल को हम बड़ी ईमान-दारी से, बड़े इंसाफ़ से रद्द-ए-अमल देंगे तुम्हें ये इल्म होना चाहिए कि आँख के बदले में आँख और दिल के बदले दिल हमारा ज़ाबता है तुम्हारा हुस्न-ए-ज़न है सोच के हर ज़ाविए से सोचना कि हम जो पानी पर खड़े हैं किस पज़ीराई के क़ाबिल हैं मगर कुछ भी करो मद्द-ए-नज़र रखना कि हम मद्द-ए-मुक़ाबिल हैं
Waheed Ahmad
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(तीसरी दुनिया के तमाम लोगों के नाम) अजब हादसा है कि बचपन में हम जिन खिलौनों से खेले थे अब वो खिलौने हमारे ही हालात से खेलते हैं वो नाज़ुक मुजस्स में वो रंगीन गुड़ियाएँ तय्यारे पिस्तौल फ़ौजी सिपाही कभी जो हमारे इशारों के मोहताज थे आफ़रीं तुझ पे मेयार-ए-गर्दिश कि अब वो खिलौने हमें चाबियाँ भर रहे हैं हमारे मवेशी हमारे ही बाग़ात को चर रहे हैं खिलौनों के इस खेल में हम तो यूँँ खो गए हैं कि हर काम की हम से उम्मीद रख लो अगर कोई तकवे की चाबी घुमा दे तो दाढ़ी बढ़ा लें अगर कोई थोड़ी सी क़ीमत लगा कर किसी शख़्स का घर बता दे तो अगले ही पल में उस की गर्दन उड़ा दें हमारा है क्या हम तो अंधे मुअज़्ज़िन हैं बाज़ू पकड़ के जो गरजे में ले जाओगे तो भी मर्यम की तस्वीर के सामने उँगलियाँ कान में ठूँस लेंगे हमारा है क्या हम तो पत्थर की वो मूर्ती हैं जिसे चाहे सज्दा करो या तमाचा लगा दो मगर वो तो हाथों से छाती छुपाए सदा मुस्कुराती रहेगी
Waheed Ahmad
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शाम में ग़ार था ग़ार में रात थी रात के नम अंधेरे में इक अजनबियत का एहसास था चलती साँसों की हिलती हुई सतह पर वक़्त की नाव ठहरी हुई थी सनसनाते हुए नम अंधेरे में पौरें धड़कने लगीं ग़ार में महव-ए-परवाज़ पलकों के पंछी उलझने लगे ग़ार में शाम थी चंद लम्हों में सदियाँ बसर कर के जब ग़ार के दौर से हम ज़माने में आए तो ढलते हुए दिन की गीली चमक पत्थरों पर जमी थी मुड़ के देखा तो पलकों को परवा लगी और मख़मूर आँखों को सपना लगा गूँजते ग़ार का नम अँधेरा हमें अपना अपना लगा ग़ार ने कुछ तो जाने दिया कुछ हमें रख लिया था निहायत सुबुकसार थे ऐसे चलते थे जैसे ज़मीं के मकीं कुर्रा-ए-माह पर चल रहे हों शाम के पेड़ पर इक परिंदा गजरतान भेरों में गाने लगा वक़्त का साँवला पेड़ है पेड़ के मल्गजे पात हैं दिल के अपने ज़मान ओ मकाँ शाम के अपने दिन रात हैं
Waheed Ahmad
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