रूह बेचैन है इक दिल की अज़िय्यत क्या है दिल ही शो'ला है तो ये सोज़-ए-मोहब्बत क्या है वो मुझे भूल गई इस की शिकायत क्या है रंज तो ये है कि रो रो के भुलाया होगा वो कहाँ और कहाँ काहिश-ए-ग़म, सोज़िश-ए-जाँ उस की रंगीन नज़र और नुक़ूश-ए-हिरमाँ उस का एहसास-ए-लतीफ़ और शिकस्त-ए-अरमाँ त'अना-ज़न एक ज़माना नज़र आया होगा झुक गई होगी जवाँ-साल उमंगों की जबीं मिट गई होगी ललक, डूब गया होगा यक़ीं छा गया होगा धुआँ, घूम गई होगी ज़मीं अपने पहले ही घरौंदे को जो ढाया होगा दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़्साने सुनाए होंगे अश्क आँखों ने पिए और न बहाए होंगे बंद कमरे में जो ख़त मेरे जलाए होंगे एक इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा उस ने घबरा के नज़र लाख बचाई होगी मिट के इक नक़्श ने सौ शक्ल दिखाई होगी मेज़ से जब मिरी तस्वीर हटाई होगी हर तरफ़ मुझ को तड़पता हुआ पाया होगा बे-महल छेड़ पे जज़्बात उबल आए होंगे ग़म पशेमान-ए-तबस्सुम में ढल आए होंगे नाम पर मेरे जब आँसू निकल आए होंगे सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा ज़ुल्फ़ ज़िद कर के किसी ने जो हटाई होगी रूठे जल्वों पे ख़िज़ाँ और भी छाई होगी बर्क़ अश़्वों ने कई दिन न गिराई होगी रंग चेहरे पे कई रोज़ न आया होगा
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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ऐ हमा-रंग हमा-नूर हमा-सोज़-ओ-गुदाज़ बज़्म-ए-महताब से आने की ज़रूरत क्या थी तू जहाँ थी उसी जन्नत में निखरता तिरा रूप इस जहन्नम को बसाने की ज़रूरत क्या थी ये ख़द-ओ-ख़ाल ये ख़्वाबों से तराशा हुआ जिस्म और दिल जिस पे ख़द-ओ-ख़ाल की नर्मी भी निसार ख़ार ही ख़ार शरारे ही शरारे हैं यहाँ और थम थम के उठा पाँव बहारों की बहार तिश्नगी ज़हर भी पी जाती है अमृत की तरह जाने किस जाम पे रुक जाए निगाह-ए-मासूम डूबते देखा है जिन आँखों में मय-ख़ाना भी प्यास उन आँखों की बुझे या न बुझे क्या मालूम हैं सभी हुस्न-परस्त अहल-ए-नज़र साहिब-ए-दिल कोई घर में कोई महफ़िल में सजाएगा तुझे तू फ़क़त जिस्म नहीं शे'र भी है गीत भी है कौन अश्कों की घनी छाँव में गाएगा तुझे तुझ से इक दर्द का रिश्ता भी है बस प्यार नहीं अपने आँचल पे मुझे अश्क बहा लेने दे तू जहाँ जाती है जा, रोकने वाला मैं कौन अपने रस्ते में मगर शम्अ' जला लेने दे
Kaifi Azmi
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मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझ को हवाओं में लहराता आता था दामन कि दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझ को क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे कि आवाज़ दे कर बुला लेगी मुझ को मगर उस ने रोका न मुझ को मनाया न दामन ही पकड़ा न मुझ को बिठाया न आवाज़ ही दी न मुझ को बुलाया मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया यहाँ तक कि उस से जुदा हो गया मैं
Kaifi Azmi
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ये बरसात ये मौसम-ए-शादमानी ख़स-ओ-ख़ार पर फट पड़ी है जवानी भड़कता है रह रह के सोज़-ए-मोहब्बत झमाझम बरसता है पुर-शोर पानी फ़ज़ा झूमती है घटा झूमती है दरख़्तों को ज़ौ बर्क़ की चूमती है थिरकते हुए अब्र का जज़्ब तौबा कि दामन उठाए ज़मीं घूमती है कड़कती है बिजली चमकती हैं बूँदें लपकता है कौंदा दमकती हैं बूँदें रग-ए-जाँ पे रह रह के लगती हैं चोटें छमा-छम ख़ला में खनकती हैं बूँदें फ़लक गा रहा है ज़मीं गा रही है कलेजे में हर लय चुभी जा रही है मुझे पा के इस मस्त शब में अकेला ये रंगीं घटा तीर बरसा रही है चमकता है बुझता है थर्रा रहा है भटकने की जुगनू सज़ा पा रहा है अभी ज़ेहन में था ये रौशन तख़य्युल फ़ज़ा में जो उड़ता चला जा रहा है लचक कर सँभलते हैं जब अब्र-पारे बरसते हैं दामन से दुम-दार तारे मचलती है रह रह के बालों में बिजली गुलाबी हुए जा रहे हैं किनारे फ़ज़ा झूम कर रंग बरसा रही है हर इक साँस शो'ला बनी जा रही है कभी इस तरह याद आती नहीं थी वो जिस तरह इस वक़्त याद आ रही है भला लुत्फ़ क्या मंज़र-ए-पुर-असर दे कि अश्कों ने आँखों पे डाले हैं पर्दे कहीं और जा कर बरस मस्त बादल ख़ुदा तेरा दामन जवाहिर से भर दे
Kaifi Azmi
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लो पौ फटी वो छुप गई तारों की अंजुमन लो जाम-ए-महरस वो छलकने लगी किरन खिचने लगा निगाह में फ़ितरत का बाँकपन जल्वे ज़मीं पे बरसे ज़मीं बन गई दुल्हन गूँजे तराने सुब्ह का इक शोर हो गया आलम मय-ए-बक़ा में शराबोर हो गया फूली शफ़क़ फ़ज़ा में हिना तिलमिला गई इक मौज-ए-रंग काँप के आलम पे छा गई कुल चाँदनी सिमट के गुलों में समा गई ज़र्रे बने नुजूम ज़मीं जगमगा गई छोड़ा सहर ने तीरगी-ए-शब को काट के उड़ने लगी हवा में किरन ओस चाट के मचली जबीन-ए-शर्क़ पे इस तरह मौज-ए-नूर लहरा के तैरने लगी आलम में बर्क़-ए-तूर उड़ने लगी शमीम छलकने लगा सुरूर खिलने लगे शगूफ़े चहकने लगे तुयूर झोंके चले हवा के शजर झूमने लगे मस्ती में फूल काँटों का मुँह चूमने लगे थम थम के ज़ौ-फ़िशाँ हुआ ज़र्रों पे आफ़्ताब छिड़का हवा ने सब्ज़ा-ए-ख़्वाबीदा पर गुलाब मुरझाई पत्तियों में मचलने लगा शबाब लर्ज़िश हुई गुलों को बरसने लगी शराब रिंदान-ए-मस्त और भी सरमस्त हो गए थर्रा के होंट जाम में पैवस्त हो गए दोशीज़ा एक ख़ुश-क़द ओ ख़ुश-रंग-ओ-ख़ूब-रू मालन की नूर-दीदा गुलिस्ताँ की आबरू महका रही है फूलों से दामान-ए-आरज़ू तिफ़्ली लिए है गोद में तूफ़ान-ए-रंग-ओ-बू रंगीनियों में खेली गुलों में पली हुई नौरस कली में क़ौस-ए-क़ुज़ह है ढली हुई मस्ती में रुख़ पे बाल परेशाँ किए हुए बादल में शम-ए-तूर फ़रोज़ाँ किए हुए हर सम्त नक़्श-ए-पास चराग़ाँ किए हुए आँचल को बार-ए-गुल से गुलिस्ताँ किए हुए लहरा रही है बाद-ए-सहर पाँव चूम के फिरती है तीतरी सी ग़ज़ब झूम झूम के ज़ुल्फ़ों में ताब-ए-सुम्बुल-ए-पेचाँ लिए हुए आरिज़ में शोख़ रंग-ए-गुलिस्ताँ लिए हुए आँखों में रूह-ए-बादा-ए-इरफ़ाँ लिए हुए होंटों में आब-ए-लाल-ए-बदख़्शाँ लिए हुए फ़ितरत ने तोल तोल के चश्म-ए-क़ुबूल में सारा चमन निचोड़ दिया एक फूल में ऐ हूर-ए-बाग़ इतनी ख़ुदी से न काम ले उड़ कर शमीम-ए-गुल कहीं आँचल न थाम ले कलियों का ले पयाम सहर का सलाम ले 'कैफ़ी' से हुस्न-ए-दोस्त का ताज़ा कलाम ले शाएर का दिल है मुफ़्त में क्यूँँ दर्द-मंद हो इक गुल इधर भी नज़्म अगर ये पसंद हो
Kaifi Azmi
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आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आएगी सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो, तुम भी उठो कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ये ज़मीं तब भी निगल लेने पे आमादा थी पाँव जब टूटती शाख़ों से उतारे हम ने उन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बर उन दिनों की जो गुफाओं में गुज़ारे हम ने हाथ ढलते गए साँचे में तो थकते कैसे नक़्श के बा'द नए नक़्श निखारे हम ने की ये दीवार बुलंद, और बुलंद, और बुलंद बाम ओ दर और, ज़रा और सँवारे हम ने आँधियाँ तोड़ लिया करती थीं शम्ओं की लवें जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हम ने बन गया क़स्र तो पहरे पे कोई बैठ गया सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिए अपनी नस नस में लिए मेहनत-ए-पैहम की थकन बंद आँखों में उसी क़स्र की तस्वीर लिए दिन पिघलता है उसी तरह सरों पर अब तक रात आँखों में खटकती है सियह तीर लिए आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आएगी सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो, तुम भी उठो कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी
Kaifi Azmi
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