गए बरसों इक हासिल क्या! फ़क़त इक मोम-बत्ती तीन-सौ-पैंसठ दिनों में केक के ज़ीने पे चढ़ती है ज़रा सी फूँक पर हम-राहियों के साथ बुझती है धुआँ चकरा के रोशन-दान से बाहर निकलता है छुरी की धार से कितने बरस काटूँ! हवा का आश्ना चेहरा मिरी आँखों में रहता है गए लम्हों को दोहराती हवा तर्ज़-ए-मोहब्बत है वो आए तो नए लम्हों की रस्सी थाम कर चल दूँ कहीं अंदर रुकी फूंकें लबों तक आएँ तो ये बत्तियाँ गुल हों अभी कल के दरीचे खुल नहीं पाए मनाज़िर धुँद में हैं आँसुओं से धुल नहीं पाए
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"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा
Amjad Husain Hafiz Karnataki
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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
ZafarAli Memon
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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
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"हिज्र" न जाने कैसे लोग थे वो जो उन के दिल को भा गए मैं ने मोहब्बत चाही तो वो यादें मुझ को थमा गए प्रेम जितना दिल में था ज़बाँ पर आ कर लफ़्ज़ हुआ जब तुम ने उन को सुना नहीं नम बनकर नयन में समा गए दिल में थी एक आस बची तेरी बे-रुख़ी से हार गई वो मोहब्बत थी मेरी जो तुम हँसी में उड़ा गए तुम ने आँखें जो फेरी हैं अब ऐसा शाम सवेरा है सूरज है जैसे बुझा हुआ चँदा तुम जैसे जला गए कानों को थे जो तीर लगे वो दिल पर आ कर ज़ख़्म हुए अब दर्द आँखों में रहता है ये क्या तुम मुझ को सुना गए सागर जो बादल बनकर साहिल से था जुदा हुआ पर्वत ने पूछा हाल ज़रा सारा मंज़र वो बहा गए नींद हटा कर आँखों से ये ख़्वाब तुम्हारे बैठे हैं याद उठी जब आँखों में तो ख़्वाब ये सारे नहा गए बस पैदल ही चल कर के कोई भव-सागर पार हुआ और इस ज़मीं पर डूब कर ये जान कितने गँवा गए अब बस अकेला रहता है और बात तुम्हारी करता है बस खोया सा रहता है क्या तुम दिल को सिखा गए जब साथ तुम्हारा छूटा तो सब ख़्वाब ये मेरे टूटे हैं जब ख़्वाब को पाना चाहा तो सब ज़िम्मेदारी बता गए
Divya 'Kumar Sahab'
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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चाय की भाप में घुलते, मादूम होते हुए क़हक़हे शाम का बाँकपन कोई मिस्रा धुएँ के बगूलों में कम्पोज़ होता हुआ कोई नुक्ता जो असरार के घुप अँधेरे से शोला-सिफ़त सर उठाए अजब धीमा धीमा नशा इख़्तिलाफ़ात का अपने निचले सुरों में कोई फ़िक्र मरबूत करता हुआ ज़ाविया तंज़ के नावक-ए-ख़ुश-सलीक़ा की सन-सन हवाओं से महफ़ूज़ साँसों में आरास्ता मुख़्तलिफ़ सिगरेटों की महक शाम के सुरमई बाँकपन में किसी कोट, मफ़लर, स्वेटर से उठती हुई ख़ुश्बू-ए-आश्ना जोड़ती है हमें इक समय से जो मुद्दत से इक ना-मुलाएम ज़माने में महकूम है कौन लहज़े को वापस बुलाए समय को मुकम्मल करे अपनी नज़्में उसी इक तसलसुल-ज़दा दाएरे में हैं पुरकार जिन की रिहाई पे माइल नहीं रेस्तुरानों के कोनों में सहमी हुई कितनी शामों का जादू यहाँ सत्र-दर-सत्र महबूस है हम जो क़ैद-ए-ज़माँ-ओ-मकाँ से निकलने को पर मारते हैं भला शाम ढलने पे अल्फ़ाज़ के पंछियों को जकड़ते हैं क्यूँँ दाम-ए-तस्वीर में ये बगूले, धुआँ, भाप असीरी के आदी नहीं शाम ख़ुद रात की गोद में जा के गिरने को बे-ताब है
Tabish Kamal
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अज़ीज़ो! अगर रात रस्ते में आए अगर दाना ओ दाम का सेहर जागे अगर उड़ते उड़ते किसी रोज़ तुम आशियाँ भूल जाओ तो पिछली कहानी में मौजूद जुगनू से धोका न खाना कहानी, नहीं देखती ग़म के नम को कहानी नहीं जानती कैफ़-ओ-कम को कहानी को वहम-ओ-गुमाँ की कठिन राह से कौन रोके कहानी का पैराया ख़्वाहिश का क़ैदी नहीं पैरहन कोई बदले तो बदले, कहानी बदलती नहीं है अज़ीज़ो! अगर रात आए तो रस्ते में पड़ती मिरी झोंपड़ी का दिया देख लेना मैं ख़ुद अड़े उड़ते यहीं पर गिरा था
Tabish Kamal
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ग़ुबार-ए-शाम के बे-अक्स मंज़र में हवा की साएँ साएँ पंछियों को हाँकती है दूर चरवाहे की बंसी में मिलन-रस का सुरीला ज़ाइक़ा है, रात रस्ते में कहाँ से तुम मुझे आवाज़ देती हो! मुसलसल आहटें मेरी समा'अत ही न ले जाएँ बचा रक्खे हुए आँसू की बीनाई टपकती है इन्हीं लफ़्ज़ों की लौ में रात कटती है जिन्हें आँखों ने तस्वीर शब-ए-व'अदा की संगीनी रिवायत है मिरे इमरोज़ के चूल्हे में भी अब तक वही ईंधन भड़कता है अगर आवाज़-ए-रिवायत हूँ अगर आवाज़ देती हो तो आओ सुब्ह के साहिल को चलते हैं लहू में कसमसाते क़हक़हे होंटों तक आने दो मुझे भी मुस्कुराने दो
Tabish Kamal
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सुर्ख़ आँखें घुमाते हुए भेड़िये रात का हुस्न हैं सरसराते हुए शाख़चों में छुपे माँदा पंछी मुसल्ले पे बैठे हुए रीश-दार अहल-ए-बातिन पिंघूड़े में किलकारते नूर चेहरे ये बिस्तर बदलती हुई लड़कियाँ ज़हर उगलते हुए साँप दीवार पर जस्त करते हुए साए लड़ती हुई बिल्लियाँ रात का हुस्न हैं अपने सर पर ये सदियों से फैला हुआ बे-मह-ओ-नज्म गर्दूं सर-ए-शाम रंग अपना तब्दील करता है तो रात का आईना जागता है अँधेरों भरे आईने में सदाएँ हैं, सूरत नहीं सामेआ शक्ल तरतीब देता है सुनते हुए जगमगाते हैं आवाज़ के ख़ाल-ओ-ख़द मैं ने सरगोशियों क़हक़हों मंज़िलों आहटों और आहों में देखा है हुस्न एक पैराए में सर उठाती हैं गुर्राहटें, वस्ल-आसार साँसें ये पलकें जो आहिस्ता आहिस्ता ढलने लगी हैं शफ़क़ जो अँधेरे में घुलने लगी है यही रात का हुस्न है रात आँखों में है
Tabish Kamal
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चंद साल उस तरफ़ हम शनासा निगाहों से बचते-बचाते यहीं पर मिले थे तुम्हें याद है काएनात एक टेबल के चारों तरफ़ घूमती थी हमें देख कर कितने बूढ़ों की आँखें किसी याद-ए-रफ़्ता में नम हो रही थी मगर मैं ने आँखों में अपने लिए और तुम्हारे लिए मछलियों की तरह तैरते आँसुओं में तमन्नाएँ देखीं मुझे याद है जब किसी अजनबी मेहरबाँ ने हमें फूल भेजे तो तुम कितनी नर्वस हुईं जल्द ही ख़ौफ़, ख़दशे हवा हो गए दूसरी टेबलों पर भी गुल-दस्ते हँसने लगे अब मोहब्बत का मस्कन कहीं और है ये जगह अब ज़बाँ-बंद दुश्मन का मुँह खोलने के लिए है जहाँ अपनी टेबल थी अब उस जगह एक फंदा लगा है कहाँ आ गई हो मोहब्बत का कतबा उठाए हुए आओ आगे चलें
Tabish Kamal
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