nazmKuch Alfaaz

अज़ीज़ो! अगर रात रस्ते में आए अगर दाना ओ दाम का सेहर जागे अगर उड़ते उड़ते किसी रोज़ तुम आशियाँ भूल जाओ तो पिछली कहानी में मौजूद जुगनू से धोका न खाना कहानी, नहीं देखती ग़म के नम को कहानी नहीं जानती कैफ़-ओ-कम को कहानी को वहम-ओ-गुमाँ की कठिन राह से कौन रोके कहानी का पैराया ख़्वाहिश का क़ैदी नहीं पैरहन कोई बदले तो बदले, कहानी बदलती नहीं है अज़ीज़ो! अगर रात आए तो रस्ते में पड़ती मिरी झोंपड़ी का दिया देख लेना मैं ख़ुद अड़े उड़ते यहीं पर गिरा था

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं

Tehzeeb Hafi

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ग़ुबार-ए-शाम के बे-अक्स मंज़र में हवा की साएँ साएँ पंछियों को हाँकती है दूर चरवाहे की बंसी में मिलन-रस का सुरीला ज़ाइक़ा है, रात रस्ते में कहाँ से तुम मुझे आवाज़ देती हो! मुसलसल आहटें मेरी समा'अत ही न ले जाएँ बचा रक्खे हुए आँसू की बीनाई टपकती है इन्हीं लफ़्ज़ों की लौ में रात कटती है जिन्हें आँखों ने तस्वीर शब-ए-व'अदा की संगीनी रिवायत है मिरे इमरोज़ के चूल्हे में भी अब तक वही ईंधन भड़कता है अगर आवाज़-ए-रिवायत हूँ अगर आवाज़ देती हो तो आओ सुब्ह के साहिल को चलते हैं लहू में कसमसाते क़हक़हे होंटों तक आने दो मुझे भी मुस्कुराने दो

Tabish Kamal

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चाय की भाप में घुलते, मादूम होते हुए क़हक़हे शाम का बाँकपन कोई मिस्रा धुएँ के बगूलों में कम्पोज़ होता हुआ कोई नुक्ता जो असरार के घुप अँधेरे से शोला-सिफ़त सर उठाए अजब धीमा धीमा नशा इख़्तिलाफ़ात का अपने निचले सुरों में कोई फ़िक्र मरबूत करता हुआ ज़ाविया तंज़ के नावक-ए-ख़ुश-सलीक़ा की सन-सन हवाओं से महफ़ूज़ साँसों में आरास्ता मुख़्तलिफ़ सिगरेटों की महक शाम के सुरमई बाँकपन में किसी कोट, मफ़लर, स्वेटर से उठती हुई ख़ुश्बू-ए-आश्ना जोड़ती है हमें इक समय से जो मुद्दत से इक ना-मुलाएम ज़माने में महकूम है कौन लहज़े को वापस बुलाए समय को मुकम्मल करे अपनी नज़्में उसी इक तसलसुल-ज़दा दाएरे में हैं पुरकार जिन की रिहाई पे माइल नहीं रेस्तुरानों के कोनों में सहमी हुई कितनी शामों का जादू यहाँ सत्र-दर-सत्र महबूस है हम जो क़ैद-ए-ज़माँ-ओ-मकाँ से निकलने को पर मारते हैं भला शाम ढलने पे अल्फ़ाज़ के पंछियों को जकड़ते हैं क्यूँँ दाम-ए-तस्वीर में ये बगूले, धुआँ, भाप असीरी के आदी नहीं शाम ख़ुद रात की गोद में जा के गिरने को बे-ताब है

Tabish Kamal

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सुर्ख़ आँखें घुमाते हुए भेड़िये रात का हुस्न हैं सरसराते हुए शाख़चों में छुपे माँदा पंछी मुसल्ले पे बैठे हुए रीश-दार अहल-ए-बातिन पिंघूड़े में किलकारते नूर चेहरे ये बिस्तर बदलती हुई लड़कियाँ ज़हर उगलते हुए साँप दीवार पर जस्त करते हुए साए लड़ती हुई बिल्लियाँ रात का हुस्न हैं अपने सर पर ये सदियों से फैला हुआ बे-मह-ओ-नज्म गर्दूं सर-ए-शाम रंग अपना तब्दील करता है तो रात का आईना जागता है अँधेरों भरे आईने में सदाएँ हैं, सूरत नहीं सामेआ शक्ल तरतीब देता है सुनते हुए जगमगाते हैं आवाज़ के ख़ाल-ओ-ख़द मैं ने सरगोशियों क़हक़हों मंज़िलों आहटों और आहों में देखा है हुस्न एक पैराए में सर उठाती हैं गुर्राहटें, वस्ल-आसार साँसें ये पलकें जो आहिस्ता आहिस्ता ढलने लगी हैं शफ़क़ जो अँधेरे में घुलने लगी है यही रात का हुस्न है रात आँखों में है

Tabish Kamal

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चंद साल उस तरफ़ हम शनासा निगाहों से बचते-बचाते यहीं पर मिले थे तुम्हें याद है काएनात एक टेबल के चारों तरफ़ घूमती थी हमें देख कर कितने बूढ़ों की आँखें किसी याद-ए-रफ़्ता में नम हो रही थी मगर मैं ने आँखों में अपने लिए और तुम्हारे लिए मछलियों की तरह तैरते आँसुओं में तमन्नाएँ देखीं मुझे याद है जब किसी अजनबी मेहरबाँ ने हमें फूल भेजे तो तुम कितनी नर्वस हुईं जल्द ही ख़ौफ़, ख़दशे हवा हो गए दूसरी टेबलों पर भी गुल-दस्ते हँसने लगे अब मोहब्बत का मस्कन कहीं और है ये जगह अब ज़बाँ-बंद दुश्मन का मुँह खोलने के लिए है जहाँ अपनी टेबल थी अब उस जगह एक फंदा लगा है कहाँ आ गई हो मोहब्बत का कतबा उठाए हुए आओ आगे चलें

Tabish Kamal

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गए बरसों इक हासिल क्या! फ़क़त इक मोम-बत्ती तीन-सौ-पैंसठ दिनों में केक के ज़ीने पे चढ़ती है ज़रा सी फूँक पर हम-राहियों के साथ बुझती है धुआँ चकरा के रोशन-दान से बाहर निकलता है छुरी की धार से कितने बरस काटूँ! हवा का आश्ना चेहरा मिरी आँखों में रहता है गए लम्हों को दोहराती हवा तर्ज़-ए-मोहब्बत है वो आए तो नए लम्हों की रस्सी थाम कर चल दूँ कहीं अंदर रुकी फूंकें लबों तक आएँ तो ये बत्तियाँ गुल हों अभी कल के दरीचे खुल नहीं पाए मनाज़िर धुँद में हैं आँसुओं से धुल नहीं पाए

Tabish Kamal

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