nazmKuch Alfaaz

सुर्ख़ आँखें घुमाते हुए भेड़िये रात का हुस्न हैं सरसराते हुए शाख़चों में छुपे माँदा पंछी मुसल्ले पे बैठे हुए रीश-दार अहल-ए-बातिन पिंघूड़े में किलकारते नूर चेहरे ये बिस्तर बदलती हुई लड़कियाँ ज़हर उगलते हुए साँप दीवार पर जस्त करते हुए साए लड़ती हुई बिल्लियाँ रात का हुस्न हैं अपने सर पर ये सदियों से फैला हुआ बे-मह-ओ-नज्म गर्दूं सर-ए-शाम रंग अपना तब्दील करता है तो रात का आईना जागता है अँधेरों भरे आईने में सदाएँ हैं, सूरत नहीं सामेआ शक्ल तरतीब देता है सुनते हुए जगमगाते हैं आवाज़ के ख़ाल-ओ-ख़द मैं ने सरगोशियों क़हक़हों मंज़िलों आहटों और आहों में देखा है हुस्न एक पैराए में सर उठाती हैं गुर्राहटें, वस्ल-आसार साँसें ये पलकें जो आहिस्ता आहिस्ता ढलने लगी हैं शफ़क़ जो अँधेरे में घुलने लगी है यही रात का हुस्न है रात आँखों में है

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ

Lal Chand Falak

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"जन्मदिन मुबारक" दिन ये सोने से, रातें ये रंगीन मुबारक ऐ मेरी साँसों की रवानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक भवरें मुस्काएँ, फूलों की डाली-डाली हँसें जब तू मुस्काए, तेरे होंठों की लाली हँसें मेरा कत़्ल करे, तेरे नैन कजरारे काले मजरूह हुए ना जाने कितने मतवाले तुझ को ये बहारें शौकीन मुबारक ऐ मेरी तसव्वुर की रानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक

Vikas Sangam

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चाय की भाप में घुलते, मादूम होते हुए क़हक़हे शाम का बाँकपन कोई मिस्रा धुएँ के बगूलों में कम्पोज़ होता हुआ कोई नुक्ता जो असरार के घुप अँधेरे से शोला-सिफ़त सर उठाए अजब धीमा धीमा नशा इख़्तिलाफ़ात का अपने निचले सुरों में कोई फ़िक्र मरबूत करता हुआ ज़ाविया तंज़ के नावक-ए-ख़ुश-सलीक़ा की सन-सन हवाओं से महफ़ूज़ साँसों में आरास्ता मुख़्तलिफ़ सिगरेटों की महक शाम के सुरमई बाँकपन में किसी कोट, मफ़लर, स्वेटर से उठती हुई ख़ुश्बू-ए-आश्ना जोड़ती है हमें इक समय से जो मुद्दत से इक ना-मुलाएम ज़माने में महकूम है कौन लहज़े को वापस बुलाए समय को मुकम्मल करे अपनी नज़्में उसी इक तसलसुल-ज़दा दाएरे में हैं पुरकार जिन की रिहाई पे माइल नहीं रेस्तुरानों के कोनों में सहमी हुई कितनी शामों का जादू यहाँ सत्र-दर-सत्र महबूस है हम जो क़ैद-ए-ज़माँ-ओ-मकाँ से निकलने को पर मारते हैं भला शाम ढलने पे अल्फ़ाज़ के पंछियों को जकड़ते हैं क्यूँँ दाम-ए-तस्वीर में ये बगूले, धुआँ, भाप असीरी के आदी नहीं शाम ख़ुद रात की गोद में जा के गिरने को बे-ताब है

Tabish Kamal

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अज़ीज़ो! अगर रात रस्ते में आए अगर दाना ओ दाम का सेहर जागे अगर उड़ते उड़ते किसी रोज़ तुम आशियाँ भूल जाओ तो पिछली कहानी में मौजूद जुगनू से धोका न खाना कहानी, नहीं देखती ग़म के नम को कहानी नहीं जानती कैफ़-ओ-कम को कहानी को वहम-ओ-गुमाँ की कठिन राह से कौन रोके कहानी का पैराया ख़्वाहिश का क़ैदी नहीं पैरहन कोई बदले तो बदले, कहानी बदलती नहीं है अज़ीज़ो! अगर रात आए तो रस्ते में पड़ती मिरी झोंपड़ी का दिया देख लेना मैं ख़ुद अड़े उड़ते यहीं पर गिरा था

Tabish Kamal

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ग़ुबार-ए-शाम के बे-अक्स मंज़र में हवा की साएँ साएँ पंछियों को हाँकती है दूर चरवाहे की बंसी में मिलन-रस का सुरीला ज़ाइक़ा है, रात रस्ते में कहाँ से तुम मुझे आवाज़ देती हो! मुसलसल आहटें मेरी समा'अत ही न ले जाएँ बचा रक्खे हुए आँसू की बीनाई टपकती है इन्हीं लफ़्ज़ों की लौ में रात कटती है जिन्हें आँखों ने तस्वीर शब-ए-व'अदा की संगीनी रिवायत है मिरे इमरोज़ के चूल्हे में भी अब तक वही ईंधन भड़कता है अगर आवाज़-ए-रिवायत हूँ अगर आवाज़ देती हो तो आओ सुब्ह के साहिल को चलते हैं लहू में कसमसाते क़हक़हे होंटों तक आने दो मुझे भी मुस्कुराने दो

Tabish Kamal

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घड़ी दो घड़ी की मसर्रत ये सदियों पे फैला हुआ देव-क़िस्सा हमारे लहू में रवाँ है किसी घोंसले में से अंडे चुराता हुआ सूरमा एक चीते से गुर सीखता कोई बच्चा कमाँ खींचता और मादा को नावक से नीचे गिराता हुआ आग दरयाफ़्त करता हुआ कोई लड़का अजब सूरतें हैं शब-ए-दास्ताँ-गोई सदियों पे फैली हुई है हवा मर्ग़-ज़ारों की यख़-बस्तगी में नहीं रह सकी सो यहाँ आ गई है कि अपना बदन गर्म कर ले ये आग अब जिबिल्लत की तरतीब का लाज़िमा है बहीमाना ख़सलत को तस्कीन देता हुआ एक उंसुर हवा देव-मालाओं के दौर की एक बुढ़िया है जिस को हर इक दास्ताँ याद है ये घड़ी दो घड़ी की मसर्रत जिसे दास्ताँ-गो की बातों से हम ने किया है कशीद एक दिन आएगा जब हवा अपने क़िस्से में वो सूरतें लाएगी जिन का आईना हम हैं शब-ए-दास्ताँ-गोई में हम जो मबहूत ओ हैरान बैठे हुए दास्तान सुन रहे हैं कभी एक ठिठुरी हुई रात में हम कहानी का मरकज़ बनेंगे जो बच्चे अदम हैं हमें दास्ताँ में घिरा देख कर खिलखिलाएँगे मबहूत-ओ-हैराँ होंगे

Tabish Kamal

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गए बरसों इक हासिल क्या! फ़क़त इक मोम-बत्ती तीन-सौ-पैंसठ दिनों में केक के ज़ीने पे चढ़ती है ज़रा सी फूँक पर हम-राहियों के साथ बुझती है धुआँ चकरा के रोशन-दान से बाहर निकलता है छुरी की धार से कितने बरस काटूँ! हवा का आश्ना चेहरा मिरी आँखों में रहता है गए लम्हों को दोहराती हवा तर्ज़-ए-मोहब्बत है वो आए तो नए लम्हों की रस्सी थाम कर चल दूँ कहीं अंदर रुकी फूंकें लबों तक आएँ तो ये बत्तियाँ गुल हों अभी कल के दरीचे खुल नहीं पाए मनाज़िर धुँद में हैं आँसुओं से धुल नहीं पाए

Tabish Kamal

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