nazmKuch Alfaaz

गाँव में शे'र का इक शिकारी भी था खाता था दश्त की वो हमेशा हवा शे'र को उस ने क़ब्ज़े में इक दिन किया शाम होती गई बढ़ गया धुँदलका बकरियों को भी वो पालता था सदा घास भी दश्त से साथ वो लाता था घास और बकरी भी उस के हमराह थे शे'र के साथ देखो ये दोनों चले राह में उन की पुल एक हाइल हुआ धुँदलका गहरा होने लगा शाम का पुल के रखवाले ने उस को रोका कहा पार तुम पुल को कर सकते हो बरमला सिर्फ़ इक चीज़ को साथ ले जाओगे अपनी मंज़िल को फिर देख लो पाओगे तुम जो चाहो तो वापस भी आ सकते हो एक शय साथ अपने भी ला सकते हो सोच में पड़ गया अब शिकारी बहुत शर्त थी वाक़ई आज भारी बहुत घास को साथ ले जाना मुश्किल ही था क्यूँँ कि ख़ुद शे'र बकरी को खा जाएगा हाँ अगर शे'र को साथ ले जाऊँगा बकरी चारा बना डालेगी घास का कश्मकश में शिकारी अभी पड़ गया कैसे हल होगा है ये बड़ा मसअला अब उसे कुछ समझ में तो आया नहीं सोचते सोचते झुक गई थी जबीं एक तरकीब आख़िर को सूझी उसे पुल से गुज़रा वो अब बच्चो बकरी लिए पार बकरी ने ऐ बच्चो पुल जो किया घास को शे'र बस सूँघ कर रह गया आया वापस पलट कर शिकारी अभी उस की आँखों में बच्चो चमक जाग उठी इस तरफ़ शे'र और उस तरफ़ बकरी थी घास ले जाने की बारी अब आ गई घास का गट्ठा साथ अपने वो ले गया शे'र बस मुँह शिकारी का तकता रहा घास को बकरी के पास उस ने रक्खा और बकरी को ख़ुद उस ने वापस लिया इस तरफ़ घास का सिर्फ़ गठा रहा क्यूँँ कि ख़तरा मिलन शे'र ओ बकरी का था इस लिए शे'र को साथ ले कर चला शे'र को घास के पास छोड़ा गया सोचिए घास को शे'र खाएगा क्या घास को शे'र बस सूँघ कर रह गया अब शिकारी चला बकरी लाने को साथ अब के बकरी की रस्सी पे था उस का हाथ अब वो बकरी के हमराह आ ही गया शे'र दिल में ही ख़ुद ग़ुर्राता रहा एक जानिब थी बकरी तो इक सम्त शे'र की नहीं अब शिकारी ने जाने में देर घास का गठा सर पर शिकारी के था गाँव का अपने अब उस ने रस्ता लिया यूँँ शिकारी ने गुत्थी को सुलझा लिया उन के जाने का भी मसअला हल हुआ

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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है कठिन बच्चो ये जीवन का सफ़र है निहायत पुर-ख़तर इक इक डगर राहबर के भेस में हैं राहज़न इस सफ़र की हैं फ़ज़ाएँ पुर-फ़ितन आँधियाँ ग़म की उठेंगी हर क़दम रखना अपने हौसलों का तुम भरम ग़म को साँचे में ख़ुशी के ढालना हर बला को मुस्कुरा कर टालना कारवाँ को भी पराया मानिए इस सफ़र में ख़ुद को तन्हा जानिए थक गए हों तो ज़रा सुसताइए मंज़िलों की सम्त फिर बढ़ जाइए चाहिए तुम को ख़ुदी की रौशनी है मुसलसल इक सफ़र ये ज़िंदगी रहिए दुनिया में मुसाफ़िर की तरह देखिए दुनिया को नाज़िर की तरह तुम मुसाफ़िर ही अगर दुनिया में हो क़द्र बच्चो वक़्त की करते रहो होते हैं बच्चो सफ़र में तजरबे लोग मिलते हैं मुसाफ़िर को नए इक वसीला है सफ़र तफ़रीह का गूँजती है हर तरफ़ उस की सदा मा'लूमात अफ़ज़ा न हो क्यूँँ कर सफ़र हो मुसाफ़िर की मगर गहरी नज़र है मुसाफ़िर-ख़ाना ये दुनिया सुनो हम मुसाफ़िर हैं सभी ऐ दोस्तो क़ौल तुम अपने बुज़ुर्गों का सुनो इस के आमिल ऐ मिरे बच्चो बनो सुब्ह जल्दी से सफ़र पर चल पड़ो शब से पहले घर को तुम लौट आइयो हल्का कुछ सामाँ सफ़र में चाहिए दीद का अरमाँ सफ़र में चाहिए ज़िंदगी में है सफ़र का अपना रोल बढ़ता है लोगों से बच्चो मेल-जोल इन दिनों अपना सफ़र आसान है और तय्यारों पे अपना ध्यान है तेज़ है अपनी उड़ानों का असर मिनटों में मेलों का तय होगा सफ़र हर मुसाफ़िर को सफ़र से प्यार है अज़्म कामिल हो तो बेड़ा पार है रहता है 'हाफ़िज़' सफ़र में रोज़-ओ-शब वो सफ़र का करता है दिल से अदब

Amjad Husain Hafiz Karnataki

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अहमद बब्लू बाबू सलमा एक जमाअत के ये बच्चे अख़लाक़ी घंटे में देखो जम्अ'' हुए हैं इक इक कर के नज़्म-ओ-ज़ब्त जमाअत में था उफ़ नहीं करता था कोई बच्चा ये जो कहानी का था घंटा सब को शौक़ कहानी का था देखो क्लास में उस्ताद आए उठ के खड़े हुए सारे बच्चे सब ने किया सलाम अब उन को बच्चे थे सब मन के अच्छे हम आवाज़ था हर इक बच्चा हम हैं कहानी के सब शैदा सब ने मिल कर किया तक़ाज़ा हम को सुनाइए अच्छा क़िस्सा सुन कर बच्चों से ये बातें हो गए ख़ुश उस्ताद इसी दम मुन्नू चुन्नू मन्नू ख़ुश थे क़ाबिल-ए-दीद है शौक़ का आलम टीचर ने जो छेड़ी कहानी बच्चे हमा-तन गोश हुए सब ख़ामोशी थी हर चेहरे पर सब से कहा ये टीचर ने अब एक पहाड़ी के दामन में क़र्या इक शादाब था बच्चो गाँव में इक चरवाहा भी था हाँ वो बहुत नादान था प्यारो रोज़ पहाड़ी पर वो जाता बकरियाँ अपनी ख़ुद ही चराता दिन भर हाँकता वो गले को शाम ढले घर वापस आता इक दिन उस को सूझी शरारत रह रह कर उस ने चिल्लाया लोगों आओ मुझ को बचाओ शे'र ने बोला है अब धावा लट्ठे भाले बर्छियाँ ले कर भागे आए लोग बराबर पाया सलामत चरवाहे को कहने लगा चरवाहा हँस कर शे'र यहाँ आया नहीं कोई यूँँ ही शरारत मैं ने की थी शुक्रिया आप यहाँ सब आए आप की हमदर्दी है सच्ची मैं ने सब को यूँँ ही परखा इम्तिहाँ आप की चाहत का था ख़ुश हूँ आप की हमदर्दी पर मैं ने प्यार सभों का पाया था ये कर्तब चरवाहे का उस ने उल्लू सब को बनाया मायूसी के साथ वो लौटे झूटा चरवाहे को पाया इज़्ज़त चरवाहे ने गँवाई अब के मुँह की उस ने खाई चरवाहे की नादानी पर दी क़र्ये वालों ने दहाई हरियाली का मौसम आया ग़ल्ले ने भी चारा पाया था मसरूर बहुत चरवाहा उस ने ख़ुशी का नग़्मा गाया उस ने अब मंज़र ये देखा शे'र है ग़ल्ले में आ धमका घबरा कर फिर वो चिल्लाया देखो शे'र ने कर दिया हमला गाँव में चीख़ें सुनीं लोगों ने एक मज़ाक़ उसे सब समझे आया न कोई उस की मदद को पड़ गए जान के लाले देखो शे'र का बन गया बच्चो निवाला चरवाहे का सारा गिला फिर चरवाहे पर हुआ जो हमला ख़ात्मा हो गया चरवाहे का शब का हुआ गहरा सन्नाटा चरवाहा अब घर नहीं आया उस की माँ बहनें थीं परेशाँ बढ़ गया उन पर ख़ौफ़ का साया दूसरे दिन का सूरज निकला गाँव में चरवाहे का था चर्चा सब ने पहाड़ी पर जा देखा ग़म था पता अब चरवाहे का क़िस्सा ख़त्म हुआ ये बच्चो तुम हो क्यूँँ ग़मगीं ये बोलो चरवाहे की फ़िक्र को छोड़ो चरवाहे से सबक़ ये सीखो झूट से जान गई थी उस की बात हमेशा कहना सच्ची मानो झूट बला है बच्चो उस से हमेशा बच कर रहियो झूट से जान भी जा सकती है झूट तो इक अंधी शक्ति है झूट गुनाह है जानो बच्चो दोज़ख़ मिलती है झूटों को प्यारो छोड़ो शरारत सारी छोड़ो सच्चाई को बस अपनाओ

Amjad Husain Hafiz Karnataki

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"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा

Amjad Husain Hafiz Karnataki

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गर्मी का जो मौसम आया जलने लगी पेड़ों की छाया सूख गई थी डाली डाली और पत्तों से भी थी ख़ाली नंगे पेड़ पे बैठा कव्वा हाँप रहा था जो प्यासा था पानी को वो ढूँढ़ता निकला घर के इक छज्जे पर बैठा हर सू काल था पानी का जो गाँव में भी था सूखा प्यारो आँगन में थी एक सुराही उस में था थोड़ा सा पानी कव्वा सुराही तक जा पहुँचा लेकिन पानी तह में ही था चोंच को अपनी अंदर डाला पानी तक वो पहुँच न पाया हो गया देख के ये ख़ुश कव्वा बाज़ू ढेर था कंकरियों का लाया इक इक को ये चुन कर डालता जाता था यूँँ कंकर उस में डाले इतने कंकर पानी उभर कर आया ऊपर फिर कव्वे ने प्यास बुझाई उस की जान में जान अब आई उड़ गया फुरती से अब कव्वा चुनने लगा फिर दाना दुन्का अक़्ल का खोलो तुम दरवाज़ा हल मुश्किल का ख़ुद निकलेगा

Amjad Husain Hafiz Karnataki

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