अहमद बब्लू बाबू सलमा एक जमाअत के ये बच्चे अख़लाक़ी घंटे में देखो जम्अ'' हुए हैं इक इक कर के नज़्म-ओ-ज़ब्त जमाअत में था उफ़ नहीं करता था कोई बच्चा ये जो कहानी का था घंटा सब को शौक़ कहानी का था देखो क्लास में उस्ताद आए उठ के खड़े हुए सारे बच्चे सब ने किया सलाम अब उन को बच्चे थे सब मन के अच्छे हम आवाज़ था हर इक बच्चा हम हैं कहानी के सब शैदा सब ने मिल कर किया तक़ाज़ा हम को सुनाइए अच्छा क़िस्सा सुन कर बच्चों से ये बातें हो गए ख़ुश उस्ताद इसी दम मुन्नू चुन्नू मन्नू ख़ुश थे क़ाबिल-ए-दीद है शौक़ का आलम टीचर ने जो छेड़ी कहानी बच्चे हमा-तन गोश हुए सब ख़ामोशी थी हर चेहरे पर सब से कहा ये टीचर ने अब एक पहाड़ी के दामन में क़र्या इक शादाब था बच्चो गाँव में इक चरवाहा भी था हाँ वो बहुत नादान था प्यारो रोज़ पहाड़ी पर वो जाता बकरियाँ अपनी ख़ुद ही चराता दिन भर हाँकता वो गले को शाम ढले घर वापस आता इक दिन उस को सूझी शरारत रह रह कर उस ने चिल्लाया लोगों आओ मुझ को बचाओ शे'र ने बोला है अब धावा लट्ठे भाले बर्छियाँ ले कर भागे आए लोग बराबर पाया सलामत चरवाहे को कहने लगा चरवाहा हँस कर शे'र यहाँ आया नहीं कोई यूँँ ही शरारत मैं ने की थी शुक्रिया आप यहाँ सब आए आप की हमदर्दी है सच्ची मैं ने सब को यूँँ ही परखा इम्तिहाँ आप की चाहत का था ख़ुश हूँ आप की हमदर्दी पर मैं ने प्यार सभों का पाया था ये कर्तब चरवाहे का उस ने उल्लू सब को बनाया मायूसी के साथ वो लौटे झूटा चरवाहे को पाया इज़्ज़त चरवाहे ने गँवाई अब के मुँह की उस ने खाई चरवाहे की नादानी पर दी क़र्ये वालों ने दहाई हरियाली का मौसम आया ग़ल्ले ने भी चारा पाया था मसरूर बहुत चरवाहा उस ने ख़ुशी का नग़्मा गाया उस ने अब मंज़र ये देखा शे'र है ग़ल्ले में आ धमका घबरा कर फिर वो चिल्लाया देखो शे'र ने कर दिया हमला गाँव में चीख़ें सुनीं लोगों ने एक मज़ाक़ उसे सब समझे आया न कोई उस की मदद को पड़ गए जान के लाले देखो शे'र का बन गया बच्चो निवाला चरवाहे का सारा गिला फिर चरवाहे पर हुआ जो हमला ख़ात्मा हो गया चरवाहे का शब का हुआ गहरा सन्नाटा चरवाहा अब घर नहीं आया उस की माँ बहनें थीं परेशाँ बढ़ गया उन पर ख़ौफ़ का साया दूसरे दिन का सूरज निकला गाँव में चरवाहे का था चर्चा सब ने पहाड़ी पर जा देखा ग़म था पता अब चरवाहे का क़िस्सा ख़त्म हुआ ये बच्चो तुम हो क्यूँँ ग़मगीं ये बोलो चरवाहे की फ़िक्र को छोड़ो चरवाहे से सबक़ ये सीखो झूट से जान गई थी उस की बात हमेशा कहना सच्ची मानो झूट बला है बच्चो उस से हमेशा बच कर रहियो झूट से जान भी जा सकती है झूट तो इक अंधी शक्ति है झूट गुनाह है जानो बच्चो दोज़ख़ मिलती है झूटों को प्यारो छोड़ो शरारत सारी छोड़ो सच्चाई को बस अपनाओ
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नज़्म: मज़दूर कौन है यहाँ हमारा किस के हैं हम ख़जालत है हम को कि मज़दूर हैं हम तपा तपाकर जिस्म अपना आहनों पर पिघलाया हम ने नसों से टपकता था लहू जब मिट्टी के घरौंदे बनाए हम ने लिए बदन पे छाले अब दश्त-ए-ला-मकाँ फिरते हैं हम कौन है यहाँ हमारा किस के हैं हम ख़जालत है हम को कि मज़दूर हैं हम सुब्ह होते ही नमक छिड़कता है सूरज जिन के ज़ख़्मों पे और रात तंज़ करती हो मुफ़्लिसी पे जिन की आसमाँ की थाली में एक रोटी समझे बच्चे तकते रहते हों चाँद को ऐसे बद-क़िस्मत बच्चों के माँ-बाप हैं हम कौन है यहाँ हमारा किस के हैं हम ख़जालत है हम को कि मज़दूर हैं हम
Sagar Agrawal
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आएँगे, अच्छे दिन आएँगे गर्दिश के दिन ये कट जाएँगे सूरज झोपड़ियों में चमकेगा बच्चे सब दूध में नहाएँगे जालिम के पुर्जे उड़ जाएँगे मिल-जुल के प्यार सभी गाएँगे मेहनत के फूल उगाने वाले दुनिया के मालिक बन जाएँगे दुख की रेखाएँ मिट जाएँगी ख़ुशियों के होंठ मुस्कुराएँगे सपनों की सतरंगी डोरी पर मुक्ति के फरहरे लहराएँगे
Gorakh Pandey
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उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली मैं 'मीर' की हमराज़ हूँ 'ग़ालिब' की सहेली दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया 'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ाया है 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखाया मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली 'ग़ालिब' ने बुलंदी का सफ़र मुझ को सिखाया 'हाली' ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया 'इक़बाल' ने आईना-ए-हक़ मुझ को दिखाया 'मोमिन' ने सजाई मिरे ख़्वाबों की हवेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली है 'ज़ौक़' की अज़्मत कि दिए मुझ को सहारे 'चकबस्त' की उल्फ़त ने मिरे ख़्वाब सँवारे 'फ़ानी' ने सजाए मिरी पलकों पे सितारे 'अकबर' ने रचाई मिरी बे-रंग हथेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली क्यूँ मुझ को बनाते हो तअस्सुब का निशाना मैं ने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना देखा था कभी मैं ने भी ख़ुशियों का ज़माना अपने ही वतन में हूँ मगर आज अकेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली
Iqbal Ashhar
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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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ऐ सिपहर-ए-बरीं के सय्यारो ऐ फ़ज़ा-ए-ज़मीं के गुल-ज़ारो ऐ पहाड़ों की दिल-फ़रेब फ़ज़ा ऐ लब-ए-जू की ठंडी ठंडी हवा ऐ अनादिल के नग़मा-ए-सहरी ऐ शब-ए-माहताब तारों भरी ऐ नसीम-ए-बहार के झोंको दहर-ए-ना-पाएदार के धोको तुम हर इक हाल में हो यूँँ तो अज़ीज़ थे वतन में मगर कुछ और ही चीज़ जब वतन में हमारा था रमना तुम से दिल बाग़ बाग़ था अपना तुम मिरी दिल-लगी के सामाँ थे तुम मिरे दर्द-ए-दिल के दरमाँ थे तुम से कटता था रंज-ए-तन्हाई तुम से पाता था दिल शकेबाई आन इक इक तुम्हारी भाती थी जो अदा थी वो जी लुभाती थी करते थे जब तुम अपनी ग़म-ख़्वारी धोई जाती थीं कुलफ़तें सारी जब हवा खाने बाग़ जाते थे हो के ख़ुश-हाल घर में आते थे बैठ जाते थे जब कभी लब-ए-आब धो के उठते थे दिल के दाग़ शिताब कोह ओ सहरा ओ आसमान ओ ज़मीं सब मिरी दिल-लगी की शक्लें थीं पर छुटा जिस से अपना मुल्क ओ दयार जी हुआ तुम से ख़ुद-ब-ख़ुद बेज़ार न गुलों की अदा ख़ुश आती है न सदा बुलबुलों की भाती है सैर-ए-गुलशन है जी का इक जंजाल शब-ए-महताब जान को है वबाल कोह ओ सहरा से ता लब-ए-दरिया जिस तरफ़ जाएँ जी नहीं लगता क्या हुए वो दिन और वो रातें तुम में अगली सी अब नहीं बातें हम ही ग़ुर्बत में हो गए कुछ और या तुम्हारे बदल गए कुछ तौर गो वही हम हैं और वही दुनिया पर नहीं हम को लुत्फ़ दुनिया का ऐ वतन ऐ मिरे बहिश्त-ए-बरीँ क्या हुए तेरे आसमान ओ ज़मीं रात और दिन का वो समाँ न रहा वो ज़मीं और वो आसमाँ न रहा तेरी दूरी है मोरिद-ए-आलाम तेरे छुटने से छुट गया आराम काटे खाता है बाग़ बिन तेरे गुल हैं नज़रों में दाग़ बिन तेरे मिट गया नक़्श कामरानी का तुझ से था लुत्फ़ ज़िंदगानी का जो कि रहते हैं तुझ से दूर सदा इन को क्या होगा ज़िंदगी का मज़ा हो गया याँ तो दो ही दिन में ये हाल तुझ बिन एक एक पल है इक इक साल सच बता तो सभी को भाता है या कि मुझ से ही तेरा नाता है मैं ही करता हूँ तुझ पे जान निसार या कि दुनिया है तेरी आशिक़-ए-ज़ार क्या ज़माने को तू अज़ीज़ नहीं ऐ वतन तू तो ऐसी चीज़ नहीं जिन ओ इंसान की हयात है तू मुर्ग़ ओ माही की काएनात है तू है नबातात का नुमू तुझ से रूख तुझ बिन हरे नहीं होते सब को होता है तुझ से नश्व-ओ-नुमा सब को भाती है तेरी आब-ओ-हवा तेरी इक मुश्त-ए-ख़ाक के बदले लूँ न हरगिज़ अगर बहिश्त मिले जान जब तक न हो बदन से जुदा कोई दुश्मन न हो वतन से हवा हमला जब क़ौम-ए-आर्या ने किया और बजा उन का हिन्द में डंका मुल्क वाले बहुत से काम आए जो बचे वो ग़ुलाम कहलाए शुद्र कहलाए राक्षस कहलाए रंज परदेस के मगर न उठाए गो ग़ुलामी का लग गया धब्बा न छुटा उन से देस पर न छुटा क़द्र ऐ दिल वतन में रहने की पूछे परदेसियों के जी से कोई जब मिला राम-चंद्र को बन-बास और निकला वतन से हो के उदास बाप का हुक्म रख लिया सर पर पर चला साथ ले के दाग़-ए-जिगर पाँव उठता था उस का बन की तरफ़ और खिंचता था दिल वतन की तरफ़ गुज़रे ग़ुर्बत में इस क़दर मह-ओ-साल पर न भोला अयोध्या का ख़याल देस को बन में जी भटकता रहा दिल में काँटा सा इक खटकता रहा तीर इक दिल में आ के लगता था आती थी जब अयोध्या की हवा कटने चौदह बरस हुए थे मुहाल गोया एक एक जुग था एक इक साल हुए यसरिब की सम्त जब राही सय्यद-ए-अबतही के हमराही रिश्ते उल्फ़त के सारे तोड़ चले और बिल्कुल वतन को छोड़ चले गो वतन से चले थे हो के ख़फ़ा पर वतन में था सब का जी अटका दिल-लगी के बहुत मिले सामान पर न भूले वतन के रेगिस्तान दिल में आठों पहर खटकते थे संग-रेज़े ज़मीन-ए-बतहा के घर जफ़ाओं से जिन की छूटा था दिल से रिश्ता न उन का टूटा था हुईं यूसुफ़ की सख़्तियाँ जब दूर और हुआ मुल्क-ए-मिस्र पर मामूर मिस्र में चार सू था हुक्म रवाँ आँख थी जानिब-ए-वतन निगराँ याद-ए-कनआँ जब उस को आती थी सल्तनत सारी भूल जाती थी दुख उठाए थे जिस वतन में सख़्त ताज भाता न उस बग़ैर न तख़्त जिन से देखी थी सख़्त बे-मेहरी लौ थी उन भाइयों की दिल को लगी हम भी हुब्ब-ए-वतन में हैं गो ग़र्क़ हम में और उन में है मगर ये फ़र्क़ हम हैं नाम-ए-वतन के दीवाने वो थे अहल-ए-वतन के परवाने जिस ने यूसुफ़ की दास्ताँ है सुनी जानता होगा रूएदाद उस की मिस्र में क़हत जब पड़ा आ कर और हुई क़ौम भूक से मुज़्तर कर दिया वक़्फ़ उन पे बैतुलमाल लब तक आने दिया न हर्फ़-ए-सवाल खतियाँ और कोठे खोल दिए मुफ़्त सारे ज़ख़ीरे तोल दिए क़ाफ़िले ख़ाली हाथ आते थे और भरपूर याँ से जाते थे यूँँ गए क़हत के वो साल गुज़र जैसे बच्चों की भूक वक़्त-ए-सहर ऐ दिल ऐ बंदा-ए-वतन होशियार ख़्वाब-ए-ग़फ़लत से हो ज़रा बेदार ओ शराब-ए-ख़ुदी के मतवाले घर की चौखट के चूमने वाले नाम है क्या इसी का हुब्ब-ए-वतन जिस की तुझ को लगी हुई है लगन कभी बच्चों का ध्यान आता है कभी यारों का ग़म सताता है याद आता है अपना शहर कभी लौ कभी अहल-ए-शहर की है लगी नक़्श हैं दिल पे कूचा-ओ-बाज़ार फिरते आँखों में हैं दर-ओ-दीवार क्या वतन क्या यही मोहब्बत है ये भी उल्फ़त में कोई उल्फ़त है इस में इंसाँ से कम नहीं हैं दरिंद इस से ख़ाली नहीं चरिंद ओ परिंद टुकड़े होते हैं संग ग़ुर्बत में सूख जाते हैं रूख फ़ुर्क़त में जा के काबुल में आम का पौदा कभी परवान चढ़ नहीं सकता आ के काबुल से याँ बिही-ओ-अनार हो नहीं सकते बारवर ज़िन्हार मछली जब छूटती है पानी से हाथ धोती है ज़िंदगानी से आग से जब हुआ समुंदर दूर उस को जीने का फिर नहीं मक़्दूर घोड़े जब खेत से बिछड़ते हैं जान के लाले उन के पड़ते हैं गाए, भैंस ऊँट हो या बकरी अपने अपने ठिकाने ख़ुश हैं सभी कहिए हुब्ब-ए-वतन इसी को अगर हम से हैवाँ नहीं हैं कुछ कम-तर है कोई अपनी क़ौम का हमदर्द नौ-ए-इंसाँ का समझें जिस को फ़र्द जिस पे इतलाक़-ए-आदमी हो सहीह जिस को हैवाँ पे दे सकें तरजीह क़ौम पर कोई ज़द न देख सके क़ौम का हाल-ए-बद न देख सके क़ौम से जान तक अज़ीज़ न हो क़ौम से बढ़ के कोई चीज़ न हो समझे उन की ख़ुशी को राहत-ए-जाँ वाँ जो नौ-रोज़ हो तो ईद हो याँ रंज को उन के समझे माया-ए-ग़म वाँ अगर सोग हो तो याँ मातम भूल जाए सब अपनी क़द्र-ए-जलील देख कर भाइयों को ख़्वार-ओ-ज़लील जब पड़े उन पे गर्दिश-ए-अफ़्लाक अपनी आसाइशों पे डाल दे ख़ाक बैठे बे-फ़िक्र क्या हो हम-वतनो उठो अहल-ए-वतन के दोस्त बनो मर्द हो तुम किसी के काम आओ वर्ना खाओ पियो चले जाओ जब कोई ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाओ दिल को दुख भाइयों के याद दिलाओ पहनो जब कोई उम्दा तुम पोशाक करो दामन से ता गरेबाँ चाक खाना खाओ तो जी में तुम शरमाओ ठंडा पानी पियो तो अश्क बहाओ कितने भाई तुम्हारे हैं नादार ज़िंदगी से है जिन का दिल बेज़ार नौकरों की तुम्हारे जो है ग़िज़ा उन को वो ख़्वाब में नहीं मिलता जिस पे तुम जूतियों से फिरते हो वाँ मुयस्सर नहीं वो ओढ़ने को खाओ तो पहले लो ख़बर उन की जिन पे बिपता है नीस्ती की पड़ी पहनो तो पहले भाइयों को पहनाओ कि है उतरन तुम्हारी जिन का बनाव एक डाली के सब हैं बर्ग-ओ-समर है कोई उन में ख़ुश्क और कोई तर सब को है एक अस्ल से पैवंद कोई आज़ुर्दा है कोई ख़ुरसंद मुक़बिलो! मुदब्बिरों को याद करो ख़ुश-दिलो ग़म-ज़दों को शाद करो जागने वाले ग़ाफ़िलों को जगाओ तैरने वालो डूबतों को तिराओ हैं मिले तुम को चश्म ओ गोश अगर लो जो ली जाए कोर-ओ-कर की ख़बर तुम अगर हाथ पाँव रखते हो लंगड़े लूलों को कुछ सहारा दो तंदुरुस्ती का शुक्र किया है बताओ रंज बीमार भाइयों का हटाओ तुम अगर चाहते हो मुल्क की ख़ैर न किसी हम-वतन को समझो ग़ैर हो मुसलमान उस में या हिन्दू बोध मज़हब हो या कि हो ब्रहमू जाफ़री होवे या कि हो हनफ़ी जीन-मत होवे या हो वैष्णवी सब को मीठी निगाह से देखो समझो आँखों की पुतलियाँ सब को मुल्क हैं इत्तिफ़ाक़ से आज़ाद शहर हैं इत्तिफ़ाक़ से आबाद हिन्द में इत्तिफ़ाक़ होता अगर खाते ग़ैरों की ठोकरें क्यूँँकर क़ौम जब इत्तिफ़ाक़ खो बैठी अपनी पूँजी से हात धो बैठी एक का एक हो गया बद-ख़्वाह लगी ग़ैरों की पड़ने तुम पे निगाह फिर गए भाइयों से जब भाई जो न आनी थी वो बला आई पाँव इक़बाल के उखड़ने लगे मुल्क पर सब के हाथ पड़ने लगे कभी तूरानियों ने घर लूटा कभी दुर्रानियों ने ज़र लूटा कभी नादिर ने क़त्ल-ए-आम किया कभी महमूद ने ग़ुलाम किया सब से आख़िर को ले गई बाज़ी एक शाइस्ता क़ौम मग़रिब की ये भी तुम पर ख़ुदा का था इनआ'म कि पड़ा तुम को ऐसी क़ौम से काम वर्ना दुम मारने न पाते तुम पड़ती जो सर पे वो उठाते तुम मुल्क रौंदे गए हैं पैरों से चैन किस को मिला है ग़ैरों से क़ौम से जो तुम्हारे बरताव सोचो ऐ मेरे प्यारो और शरमाओ अहल-ए-दौलत को है ये इस्तिग़्ना कि नहीं भाइयों की कुछ पर्वा शहर में क़हत की दुहाई है जान-ए-आलम लबों पे आई है बच्चे इक घर में बिलबिलाते हैं रो के माँ बाप को रुलाते हैं कोई फिरता है माँगता दर दर है कहीं पेट से बँधा पत्थर पर जो हैं उन में साहिब-ए-मक़्दूर उन में गिनती के होंगे ऐसे ग़यूर कि जिन्हें भाइयों का ग़म होगा अपनी राहत का ध्यान कम होगा जितने देखोगे पाओगे बे-दर्द दिल के नामर्द और नाम के मर्द ऐश में जिन के कटते हैं औक़ात ईद है दिन तो शब्बरात है रात क़ौम मरती है भूक से तो मरे काम उन्हें अपने हलवे-मांडे से इन को अब तक ख़बर नहीं असलन शहर में भाव क्या है ग़ल्ले का ग़ल्ला अर्ज़ां है इन दिनों कि गिराँ काल है शहर में पड़ा कि समाँ काल क्या शय है किस को कहते हैं भूक भूक में क्यूँँकि मरते हैं मफ़लूक सर भूके की क़द्र क्या समझे उस के नज़दीक सब हैं पेट भरे अहल-ए-दौलत का सुन चुके तुम हाल अब सुनो रुएदाद-ए-अहल-ए-कमाल फ़ाज़िलों को है फ़ाज़िलों से इनाद पंडितों में पड़े हुए हैं फ़साद है तबीबों में नोक-झोक सदा एक से एक का है थूक जुदा रहने दो अह-ए-इल्म हैं इस तरह पहलवानों में लाग हो जिस तरह ईदू वालों का है अगर पट्ठा शेख़ू वालों में जा नहीं सकता शाइरों में भी है यही तकरार ख़ुशनवेशों को है यही आज़ार लाख नेकों का क्यूँँ न हो इक नेक देख सकता नहीं है एक को एक इस पे तुर्रा ये है कि अहल-ए-हुनर दूर समझे हुए हैं अपना घर मिली इक गाँठ जिस को हल्दी की उस ने समझा कि मैं हूँ पंसारी नुस्ख़ा इक तिब का जिस को आता है सगे-भाई से वो छुपाता है जिस को आता है फूँकना कुश्ता है हमारी तरफ़ से वो गूँगा जिस को है कुछ रमल में मालूमात वो नहीं करता सीधे मुँह से बात बाप भाई हो या कि हो बेटा भेद पाता नहीं मुनज्जम का काम कंदले का जिस को है मालूम है ज़माने में उस की बुख़्ल की धूम अल-ग़रज़ जिस के पास है कुछ चीज़ जान से भी सिवा है उस को अज़ीज़ क़ौम पर उन का कुछ नहीं एहसाँ उन का होना न होना है यकसाँ सब कमालात और हुनर उन के क़ब्र में उन के साथ जाएँगे क़ौम क्या कह के उन को रोएगी नाम पर क्यूँँ कि जान खोएगी तरबियत-याफ़्ता हैं जो याँ के ख़्वाह बी-ए हों इस में या एम-ए भरते हुब्ब-ए-वतन का गो दम हैं पर मुहिब्ब-ए-वतन बहुत कम हैं क़ौम को उन से जो उमीदें थीं अब जो देखा तो सब ग़लत निकलीं हिस्ट्री उन की और जियोग्राफी सात पर्दे में मुँह दिए है पड़ी बंद उस क़ुफ़्ल में है इल्म उन का जिस की कुंजी का कुछ नहीं है पता लेते हैं अपने दिल ही दिल में मज़े गोया गूँगे का गुड़ हैं खाए हुए करते फिरते हैं सैर-ए-गुल तन्हा कोई पास उन के जा नहीं सकता अहल-ए-इंसाफ़ शर्म की जा है गर नहीं बुख़्ल ये तो फिर क्या है तुम ने देखा है जो वो सब को दिखाओ तुम ने चखा है जो वो सब को चखाओ ये जो दौलत तुम्हारे पास है आज हम-वतन इस के हैं बहुत मोहताज मुँह को एक इक तुम्हारे है तकता कि निकलता है मुँह से आप के क्या आप शाइस्ता हैं तो अपने लिए कुछ सुलूक अपनी क़ौम से भी किए मेज़ कुर्सी अगर लगाते हैं आप क़ौम से पूछिए तो पुन है न पाप मुँडा जूता गर आप को है पसंद क़ौम को इस से फ़ाएदा न गज़ंद क़ौम पर करते हो अगर एहसाँ तो दिखाओ कुछ अपना जोश-ए-निहाँ कुछ दिनों ऐश में ख़लल डालो पेट में जो है सब उगल डालो इल्म को कर दो कू-ब-कू अर्ज़ां हिन्द को कर दिखाओ इंगलिस्ताँ सुनते हो सामईन-ए-बा-तमकीं सुनते हो हाज़रीन-ए-सद्र-नशीं जो हैं दुनिया में क़ौम के हमदर्द बंदा-ए-क़ाैम उन के हैं ज़न ओ मर्द बाप की है दुआ ये बहर-ए-पिसर क़ौम की मैं बनाऊँ उस को सिपर माँ ख़ुदा से ये माँगती है मुराद क़ौम पर से निसार हो औलाद भाई आपस में करते हैं पैमाँ तू अगर माल दे तो मैं दूँ जाँ अहल-ए-हिम्मत कमा के लाते हैं हम-वतन फ़ाएदे उठाते हैं कहीं होते हैं मदरसे जारी दख़्ल और ख़र्ज जिन के हैं भारी और कहीं होते हैं कलब क़ाएम मबहस-ए-हिकमत और अदब क़ाएम नित-नए खुलते हैं दवा-ख़ाने बनते हैं सैकड़ों शिफ़ा-ख़ाने मुल्क में जो मरज़ हैं आलम-गीर क़ौम पर उन की फ़र्ज़ है तदबीर हैं सदा इस उधेड़-बुन में तबीब कि कोई नुस्ख़ा हाथ आए अजीब क़ौम को पहुँचे मंफ़अत जिस से मुल्क में फैलें फ़ाएदे जिस के खप गए कितने बन के झाड़ों में मर गए सैकड़ों पहाड़ों में लिखे जब तक जिए सफ़र-ना में चल दिए हाथ में क़लम था में गो सफ़र में उठाए रंज-ए-कमाल कर दिया पर वतन को अपने निहाल हैं अब इन के गवाह हुब्ब-ए-वतन दर-ओ-दीवार-ए-पैरिस ओ लंदन काम हैं सब बशर के हम-वतनों तुम से भी हो सके तो मर्द बनो छोड़ो अफ़्सुर्दगी को जोश में आओ बस बहुत सोए उट्ठो होश में आओ क़ाफ़िले तुम से बढ़ गए कोसों रहे जाते हो सब से पीछे क्यूँँ क़ाफ़िलों से अगर मिला चाहो मुल्क और क़ौम का भला चाहो गर रहा चाहते हो इज़्ज़त से भाइयों को निकालो ज़िल्लत से उन की इज़्ज़त तुम्हारी इज़्ज़त है उन की ज़िल्लत तुम्हारी ज़िल्लत है क़ौम का मुब्तदिल है जो इंसाँ बे-हक़ीक़त है गरचे है सुल्ताँ क़ौम दुनिया में जिस की है मुम्ताज़ है फ़क़ीरी में भी वो बा-एज़ाज़ इज़्ज़त-ए-क़ौम चाहते हो अगर जा के फैलाओ उन में इल्म-ओ-हुनर ज़ात का फ़ख़्र और नसब का ग़ुरूर उठ गए अब जहाँ से ये दस्तूर अब न सय्यद का इफ़्तिख़ार सहीह न बरहमन को शुद्र पर तरजीह हुई तुर्की तमाम ख़ानों में कट गई जड़ से ख़ानदानों में क़ौम की इज़्ज़त अब हुनर से है इल्म से या कि सीम-ओ-ज़र से है कोई दिन में वो दौर आएगा बे-हुनर भीक तक न पाएगा न रहेंगे सदा यही दिन रात याद रखना हमारी आज की बात गर नहीं सुनते क़ौल 'हाली' का फिर न कहना कि कोई कहता था
Altaf Hussain Hali
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है कठिन बच्चो ये जीवन का सफ़र है निहायत पुर-ख़तर इक इक डगर राहबर के भेस में हैं राहज़न इस सफ़र की हैं फ़ज़ाएँ पुर-फ़ितन आँधियाँ ग़म की उठेंगी हर क़दम रखना अपने हौसलों का तुम भरम ग़म को साँचे में ख़ुशी के ढालना हर बला को मुस्कुरा कर टालना कारवाँ को भी पराया मानिए इस सफ़र में ख़ुद को तन्हा जानिए थक गए हों तो ज़रा सुसताइए मंज़िलों की सम्त फिर बढ़ जाइए चाहिए तुम को ख़ुदी की रौशनी है मुसलसल इक सफ़र ये ज़िंदगी रहिए दुनिया में मुसाफ़िर की तरह देखिए दुनिया को नाज़िर की तरह तुम मुसाफ़िर ही अगर दुनिया में हो क़द्र बच्चो वक़्त की करते रहो होते हैं बच्चो सफ़र में तजरबे लोग मिलते हैं मुसाफ़िर को नए इक वसीला है सफ़र तफ़रीह का गूँजती है हर तरफ़ उस की सदा मा'लूमात अफ़ज़ा न हो क्यूँँ कर सफ़र हो मुसाफ़िर की मगर गहरी नज़र है मुसाफ़िर-ख़ाना ये दुनिया सुनो हम मुसाफ़िर हैं सभी ऐ दोस्तो क़ौल तुम अपने बुज़ुर्गों का सुनो इस के आमिल ऐ मिरे बच्चो बनो सुब्ह जल्दी से सफ़र पर चल पड़ो शब से पहले घर को तुम लौट आइयो हल्का कुछ सामाँ सफ़र में चाहिए दीद का अरमाँ सफ़र में चाहिए ज़िंदगी में है सफ़र का अपना रोल बढ़ता है लोगों से बच्चो मेल-जोल इन दिनों अपना सफ़र आसान है और तय्यारों पे अपना ध्यान है तेज़ है अपनी उड़ानों का असर मिनटों में मेलों का तय होगा सफ़र हर मुसाफ़िर को सफ़र से प्यार है अज़्म कामिल हो तो बेड़ा पार है रहता है 'हाफ़िज़' सफ़र में रोज़-ओ-शब वो सफ़र का करता है दिल से अदब
Amjad Husain Hafiz Karnataki
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"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा
Amjad Husain Hafiz Karnataki
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गाँव में शे'र का इक शिकारी भी था खाता था दश्त की वो हमेशा हवा शे'र को उस ने क़ब्ज़े में इक दिन किया शाम होती गई बढ़ गया धुँदलका बकरियों को भी वो पालता था सदा घास भी दश्त से साथ वो लाता था घास और बकरी भी उस के हमराह थे शे'र के साथ देखो ये दोनों चले राह में उन की पुल एक हाइल हुआ धुँदलका गहरा होने लगा शाम का पुल के रखवाले ने उस को रोका कहा पार तुम पुल को कर सकते हो बरमला सिर्फ़ इक चीज़ को साथ ले जाओगे अपनी मंज़िल को फिर देख लो पाओगे तुम जो चाहो तो वापस भी आ सकते हो एक शय साथ अपने भी ला सकते हो सोच में पड़ गया अब शिकारी बहुत शर्त थी वाक़ई आज भारी बहुत घास को साथ ले जाना मुश्किल ही था क्यूँँ कि ख़ुद शे'र बकरी को खा जाएगा हाँ अगर शे'र को साथ ले जाऊँगा बकरी चारा बना डालेगी घास का कश्मकश में शिकारी अभी पड़ गया कैसे हल होगा है ये बड़ा मसअला अब उसे कुछ समझ में तो आया नहीं सोचते सोचते झुक गई थी जबीं एक तरकीब आख़िर को सूझी उसे पुल से गुज़रा वो अब बच्चो बकरी लिए पार बकरी ने ऐ बच्चो पुल जो किया घास को शे'र बस सूँघ कर रह गया आया वापस पलट कर शिकारी अभी उस की आँखों में बच्चो चमक जाग उठी इस तरफ़ शे'र और उस तरफ़ बकरी थी घास ले जाने की बारी अब आ गई घास का गट्ठा साथ अपने वो ले गया शे'र बस मुँह शिकारी का तकता रहा घास को बकरी के पास उस ने रक्खा और बकरी को ख़ुद उस ने वापस लिया इस तरफ़ घास का सिर्फ़ गठा रहा क्यूँँ कि ख़तरा मिलन शे'र ओ बकरी का था इस लिए शे'र को साथ ले कर चला शे'र को घास के पास छोड़ा गया सोचिए घास को शे'र खाएगा क्या घास को शे'र बस सूँघ कर रह गया अब शिकारी चला बकरी लाने को साथ अब के बकरी की रस्सी पे था उस का हाथ अब वो बकरी के हमराह आ ही गया शे'र दिल में ही ख़ुद ग़ुर्राता रहा एक जानिब थी बकरी तो इक सम्त शे'र की नहीं अब शिकारी ने जाने में देर घास का गठा सर पर शिकारी के था गाँव का अपने अब उस ने रस्ता लिया यूँँ शिकारी ने गुत्थी को सुलझा लिया उन के जाने का भी मसअला हल हुआ
Amjad Husain Hafiz Karnataki
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गर्मी का जो मौसम आया जलने लगी पेड़ों की छाया सूख गई थी डाली डाली और पत्तों से भी थी ख़ाली नंगे पेड़ पे बैठा कव्वा हाँप रहा था जो प्यासा था पानी को वो ढूँढ़ता निकला घर के इक छज्जे पर बैठा हर सू काल था पानी का जो गाँव में भी था सूखा प्यारो आँगन में थी एक सुराही उस में था थोड़ा सा पानी कव्वा सुराही तक जा पहुँचा लेकिन पानी तह में ही था चोंच को अपनी अंदर डाला पानी तक वो पहुँच न पाया हो गया देख के ये ख़ुश कव्वा बाज़ू ढेर था कंकरियों का लाया इक इक को ये चुन कर डालता जाता था यूँँ कंकर उस में डाले इतने कंकर पानी उभर कर आया ऊपर फिर कव्वे ने प्यास बुझाई उस की जान में जान अब आई उड़ गया फुरती से अब कव्वा चुनने लगा फिर दाना दुन्का अक़्ल का खोलो तुम दरवाज़ा हल मुश्किल का ख़ुद निकलेगा
Amjad Husain Hafiz Karnataki
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