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मैं देख रहा हूँ पत्ते के हाथों पर जाल लकीरों का मैं देख रहा हूँ पत्ते की आँखों में शबनम के आँसू मैं देख रहा हूँ पत्ते की रग रग में तड़पता सब्ज़ लहू मैं देख रहा हूँ पत्ते के चेहरे पे नदामत के क़तरे मा'लूम नहीं लेकिन मुझ को इन रूपों में से कौन सा है पत्ते का अपना असली रूप

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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ऐ हम-सफ़रो क्यूँँ न यहीं शहर बसा लें अपने ही उसूल अपनी ही अक़दार बना लें वो लोग जिन्हों ने मिरे होंटों को सिया है सोज़न से मिरी सोच का काँटा भी निकालें इस बज़्म से उट्ठेगा न शो'ला कोई हरगिज़ यारो चलो क़िंदील से क़िंदील जला लें हर शहर में हैं फ़स्ल-ए-जुनूँ आने के चर्चे शोरीदा-सरो आओ गरेबान सिला लें यूँँ ज़ेहन पे है ख़ौफ़ के सायों का तसल्लुत हम आई हुई बात को होंटों में दबा लें कहने को तो बाज़ार में हम-जिंस गराँ हैं अमलन हमीं कौड़ी पे ख़रीदार उठा लें बोझ अपना भी हम से तो उठाया नहीं जाता और आप मुसिर आप का भी बोझ उठा लें शायद कोई चिंगारी सुलगती हुई मिल जाए आओ तो ज़रा राख का ये ढेर खंगालें

Fakhr Zaman

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पतझड़ आया पतझड़ आया पेड़ों से पत्ते टूटेंगे और बिखरेंगे इक इक कर के शाह-राहों पर पगडंडियों पर ज़ालिम राही बेहिस राही पत्तों को पाँव के नीचे रौंदेंगे और पत्ते पाँव के नीचे चीख़ेंगे चिल्लाएँंगे पैहम पिसते जाएँगे

Fakhr Zaman

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तंग-ओ-तारीक सी कोठरी में मोटी मोटी सलाख़ों के पीछे ग़लीज़ से फ़र्श पर पड़ा है वो एक क़ैदी परेशाँ बाल हैं और ज़र्द चेहरा हो जैसे हड्डियों का एक ढाँचा पड़ी हैं बेड़ियाँ पाँव में उस के है जुर्म उस का अपना फ़क़त इस क़दर कि रह रह के वो सोचता है यही वो ज़िंदाँ में किस जुर्म पर बंद है सोचे वो क्यूँँ न आख़िर उस की रगों में भी तो दूसरे आज़ाद लोगों की तरह दौड़ता है ज़िंदगी का गर्म ख़ून

Fakhr Zaman

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वो जा रही हैं सरों पे पत्थर उठाए मज़दूर औरतें कुछ ये खुरदुरे हाथ मैले पाँव जमी हैं होंटों पे पपड़ियाँ सी और पसीने में हैं शराबोर सुलगती दोपहर में वो मिल कर एक दीवार चुन रही हैं हिसार-ए-संगीं बनेगा कोई ये देख कर हाल उन का मुझ को ख़याल रह रह के आ रहा है कहाँ हैं वो मरमरीं सी बाहें वो गुदगुदे हाथ नर्म-ओ-नाज़ुक वो गेसू-ए-अम्बरीं-ओ-मुश्कीं वो तीर-ए-मिज़्गाँ कमान-ए-अबरू वो ला'ल लब और वो रू-ए-ज़ेबा वो नाज़नीं औरतें कहाँ हैं वो मह-जबीं औरतें कहाँ हैं वो जिन की ता'रीफ़ करते करते अदीब-ओ-शाइर नहीं हैं थकते

Fakhr Zaman

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मेरे गाँव में मेरे घर के क़रीब झील है एक ख़ूब-सूरत सी उस का शफ़्फ़ाफ़ नीलगूँ पानी कितना ख़ामोश और साकिन है बैठ कर मैं कभी किनारे पर उस के पानी में फेंक कर पत्थर उस में हलचल मचाता रहता हूँ और इस वक़्त उस की वो हलचल दिल को कितना सुकून देती है लेकिन अफ़सोस थोड़ी देर के बा'द ख़त्म हो जाता है वो मद्द-ओ-जज़्र और मैं पत्थर तलाश करता हूँ ताकि मच जाए फिर वही हलचल मैं ने फेंके हैं इस क़दर पत्थर अब तो मुश्किल से कोई मिलता है और वो भी बड़ी तलाश के बा'द

Fakhr Zaman

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