nazmKuch Alfaaz

वो जा रही हैं सरों पे पत्थर उठाए मज़दूर औरतें कुछ ये खुरदुरे हाथ मैले पाँव जमी हैं होंटों पे पपड़ियाँ सी और पसीने में हैं शराबोर सुलगती दोपहर में वो मिल कर एक दीवार चुन रही हैं हिसार-ए-संगीं बनेगा कोई ये देख कर हाल उन का मुझ को ख़याल रह रह के आ रहा है कहाँ हैं वो मरमरीं सी बाहें वो गुदगुदे हाथ नर्म-ओ-नाज़ुक वो गेसू-ए-अम्बरीं-ओ-मुश्कीं वो तीर-ए-मिज़्गाँ कमान-ए-अबरू वो ला'ल लब और वो रू-ए-ज़ेबा वो नाज़नीं औरतें कहाँ हैं वो मह-जबीं औरतें कहाँ हैं वो जिन की ता'रीफ़ करते करते अदीब-ओ-शाइर नहीं हैं थकते

Related Nazm

उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

475 likes

"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

191 likes

राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

73 likes

"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

158 likes

तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

117 likes

More from Fakhr Zaman

तंग-ओ-तारीक सी कोठरी में मोटी मोटी सलाख़ों के पीछे ग़लीज़ से फ़र्श पर पड़ा है वो एक क़ैदी परेशाँ बाल हैं और ज़र्द चेहरा हो जैसे हड्डियों का एक ढाँचा पड़ी हैं बेड़ियाँ पाँव में उस के है जुर्म उस का अपना फ़क़त इस क़दर कि रह रह के वो सोचता है यही वो ज़िंदाँ में किस जुर्म पर बंद है सोचे वो क्यूँँ न आख़िर उस की रगों में भी तो दूसरे आज़ाद लोगों की तरह दौड़ता है ज़िंदगी का गर्म ख़ून

Fakhr Zaman

0 likes

पतझड़ आया पतझड़ आया पेड़ों से पत्ते टूटेंगे और बिखरेंगे इक इक कर के शाह-राहों पर पगडंडियों पर ज़ालिम राही बेहिस राही पत्तों को पाँव के नीचे रौंदेंगे और पत्ते पाँव के नीचे चीख़ेंगे चिल्लाएँंगे पैहम पिसते जाएँगे

Fakhr Zaman

0 likes

ऐ हम-सफ़रो क्यूँँ न यहीं शहर बसा लें अपने ही उसूल अपनी ही अक़दार बना लें वो लोग जिन्हों ने मिरे होंटों को सिया है सोज़न से मिरी सोच का काँटा भी निकालें इस बज़्म से उट्ठेगा न शो'ला कोई हरगिज़ यारो चलो क़िंदील से क़िंदील जला लें हर शहर में हैं फ़स्ल-ए-जुनूँ आने के चर्चे शोरीदा-सरो आओ गरेबान सिला लें यूँँ ज़ेहन पे है ख़ौफ़ के सायों का तसल्लुत हम आई हुई बात को होंटों में दबा लें कहने को तो बाज़ार में हम-जिंस गराँ हैं अमलन हमीं कौड़ी पे ख़रीदार उठा लें बोझ अपना भी हम से तो उठाया नहीं जाता और आप मुसिर आप का भी बोझ उठा लें शायद कोई चिंगारी सुलगती हुई मिल जाए आओ तो ज़रा राख का ये ढेर खंगालें

Fakhr Zaman

1 likes

मेरे गाँव में मेरे घर के क़रीब झील है एक ख़ूब-सूरत सी उस का शफ़्फ़ाफ़ नीलगूँ पानी कितना ख़ामोश और साकिन है बैठ कर मैं कभी किनारे पर उस के पानी में फेंक कर पत्थर उस में हलचल मचाता रहता हूँ और इस वक़्त उस की वो हलचल दिल को कितना सुकून देती है लेकिन अफ़सोस थोड़ी देर के बा'द ख़त्म हो जाता है वो मद्द-ओ-जज़्र और मैं पत्थर तलाश करता हूँ ताकि मच जाए फिर वही हलचल मैं ने फेंके हैं इस क़दर पत्थर अब तो मुश्किल से कोई मिलता है और वो भी बड़ी तलाश के बा'द

Fakhr Zaman

0 likes

मैं देख रहा हूँ पत्ते के हाथों पर जाल लकीरों का मैं देख रहा हूँ पत्ते की आँखों में शबनम के आँसू मैं देख रहा हूँ पत्ते की रग रग में तड़पता सब्ज़ लहू मैं देख रहा हूँ पत्ते के चेहरे पे नदामत के क़तरे मा'लूम नहीं लेकिन मुझ को इन रूपों में से कौन सा है पत्ते का अपना असली रूप

Fakhr Zaman

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Fakhr Zaman.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Fakhr Zaman's nazm.