nazmKuch Alfaaz

ऐ हम-सफ़रो क्यूँँ न यहीं शहर बसा लें अपने ही उसूल अपनी ही अक़दार बना लें वो लोग जिन्हों ने मिरे होंटों को सिया है सोज़न से मिरी सोच का काँटा भी निकालें इस बज़्म से उट्ठेगा न शो'ला कोई हरगिज़ यारो चलो क़िंदील से क़िंदील जला लें हर शहर में हैं फ़स्ल-ए-जुनूँ आने के चर्चे शोरीदा-सरो आओ गरेबान सिला लें यूँँ ज़ेहन पे है ख़ौफ़ के सायों का तसल्लुत हम आई हुई बात को होंटों में दबा लें कहने को तो बाज़ार में हम-जिंस गराँ हैं अमलन हमीं कौड़ी पे ख़रीदार उठा लें बोझ अपना भी हम से तो उठाया नहीं जाता और आप मुसिर आप का भी बोझ उठा लें शायद कोई चिंगारी सुलगती हुई मिल जाए आओ तो ज़रा राख का ये ढेर खंगालें

Related Nazm

"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र

ZafarAli Memon

14 likes

"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

37 likes

"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे

Rohit tewatia 'Ishq'

10 likes

नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....

Ankit Maurya

12 likes

“ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है” न आराम अब मुझ को इक पल भी यारों मुझे याद आया था वो कल भी यारों वो यारों मेरे साथ क्यूँँ कर गया ये कोई तो दवा हो जो आराम दे दे मैं दफ़्तर के पहिये में पिसने लगा हूँ हैं हाथों में पत्थर मैं ख़ुद आइना हूँ वो तारों से आगे मैं धरती के अंदर बना है वो पागल जो कल था सिकंदर वो कल था जहाँ पर वो अब भी वहीं है ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है मैं बरसों से दर दर भटकता रहा हूँ मैं बेचैन भी हूँ मैं बे-आसरा हूँ नए ज़ख़्म फिर से है लाई मोहब्बत कि जब से हुई है परायी मोहब्बत मोहब्बत का मुझ को सिला ये मिला है दिवानों का अब साथ में क़ाफ़िला है सुकूँ ढूँढ़ते ढूँढ़ते थक गया हूँ मैं दुनिया से आगे फ़लक तक गया हूँ ये दिल है कहीं और धड़कन कहीं है ख़ुदा अब मुझे चैन मिलता नहीं है

Amaan Pathan

7 likes

More from Fakhr Zaman

तंग-ओ-तारीक सी कोठरी में मोटी मोटी सलाख़ों के पीछे ग़लीज़ से फ़र्श पर पड़ा है वो एक क़ैदी परेशाँ बाल हैं और ज़र्द चेहरा हो जैसे हड्डियों का एक ढाँचा पड़ी हैं बेड़ियाँ पाँव में उस के है जुर्म उस का अपना फ़क़त इस क़दर कि रह रह के वो सोचता है यही वो ज़िंदाँ में किस जुर्म पर बंद है सोचे वो क्यूँँ न आख़िर उस की रगों में भी तो दूसरे आज़ाद लोगों की तरह दौड़ता है ज़िंदगी का गर्म ख़ून

Fakhr Zaman

0 likes

पतझड़ आया पतझड़ आया पेड़ों से पत्ते टूटेंगे और बिखरेंगे इक इक कर के शाह-राहों पर पगडंडियों पर ज़ालिम राही बेहिस राही पत्तों को पाँव के नीचे रौंदेंगे और पत्ते पाँव के नीचे चीख़ेंगे चिल्लाएँंगे पैहम पिसते जाएँगे

Fakhr Zaman

0 likes

मेरे गाँव में मेरे घर के क़रीब झील है एक ख़ूब-सूरत सी उस का शफ़्फ़ाफ़ नीलगूँ पानी कितना ख़ामोश और साकिन है बैठ कर मैं कभी किनारे पर उस के पानी में फेंक कर पत्थर उस में हलचल मचाता रहता हूँ और इस वक़्त उस की वो हलचल दिल को कितना सुकून देती है लेकिन अफ़सोस थोड़ी देर के बा'द ख़त्म हो जाता है वो मद्द-ओ-जज़्र और मैं पत्थर तलाश करता हूँ ताकि मच जाए फिर वही हलचल मैं ने फेंके हैं इस क़दर पत्थर अब तो मुश्किल से कोई मिलता है और वो भी बड़ी तलाश के बा'द

Fakhr Zaman

0 likes

वो जा रही हैं सरों पे पत्थर उठाए मज़दूर औरतें कुछ ये खुरदुरे हाथ मैले पाँव जमी हैं होंटों पे पपड़ियाँ सी और पसीने में हैं शराबोर सुलगती दोपहर में वो मिल कर एक दीवार चुन रही हैं हिसार-ए-संगीं बनेगा कोई ये देख कर हाल उन का मुझ को ख़याल रह रह के आ रहा है कहाँ हैं वो मरमरीं सी बाहें वो गुदगुदे हाथ नर्म-ओ-नाज़ुक वो गेसू-ए-अम्बरीं-ओ-मुश्कीं वो तीर-ए-मिज़्गाँ कमान-ए-अबरू वो ला'ल लब और वो रू-ए-ज़ेबा वो नाज़नीं औरतें कहाँ हैं वो मह-जबीं औरतें कहाँ हैं वो जिन की ता'रीफ़ करते करते अदीब-ओ-शाइर नहीं हैं थकते

Fakhr Zaman

0 likes

मैं देख रहा हूँ पत्ते के हाथों पर जाल लकीरों का मैं देख रहा हूँ पत्ते की आँखों में शबनम के आँसू मैं देख रहा हूँ पत्ते की रग रग में तड़पता सब्ज़ लहू मैं देख रहा हूँ पत्ते के चेहरे पे नदामत के क़तरे मा'लूम नहीं लेकिन मुझ को इन रूपों में से कौन सा है पत्ते का अपना असली रूप

Fakhr Zaman

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Fakhr Zaman.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Fakhr Zaman's nazm.