nazmKuch Alfaaz

बजा है कि बारिशों से पहले भी उदास था जंगल और अब भी है जब हो चुकी है बारिश लगता है ठहर गया है मौसम अंदर का हो गई है जामिद समाअ'त और बसारत देखते सुनते हुए भी जो नज़र आता नहीं है बदलाओ

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"सुनो शादी मुबारक हो" सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब बता भी दो कि सुनने को वो ख़ुश-ख़बरी मैं आऊँ अब किसी दिन छोड़ जाएगी तेरे बेटे को कोई जब किसी आशिक़ की माँ का दुख समझ पाए तू शायद तब इसे इंसाफ़ कहते हैं इसी से भागते हैं सब इसी को पूजता हूँ मैं इसी से काँपते हैं रब मगर तब तक मुनासिब है तड़प को बोलना करतब सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब

Anant Gupta

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रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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'मतलबी' तेरा हुनर-ए-बेवफ़ाई अच्छा था वादों से मुकरना वाकई अच्छा था आज ये सब कैसे अरे बस ऐसे ही तुझे तो मालूम है न मैं कैसा हूँ , शायद अब मैं बिल्कुल तेरे जैसा हूँ मतलब पड़ने पर मैं तेरा हूँ मतलब ख़त्म होने पर ज़माने जैसा हूँ मैं ज़माने जैसा न बनता तो क्या करता मैं तुझ सा नहीं बनता तो क्या करता मैं कब तक तेरे लिए रोता रहता मैं आख़िर कब तक गलियों में, कूचों में, गाँव में, शहरों में, बाज़ारों में, खुले मैदानों में , जंगलों में, चर्च में, गुरुद्वारों में मस्जिदों में, मंदिरों में तुझे ढूँढ़ता रहता मैं अपनी ज़िन्दगी तेरे लिए क्यूँ बर्बाद करता फिर ज़ेहन में आया कि बदलना ही ठीक है तेरे हर वादों को भूलना ही ठीक है तेरी यादों को दिल से मिटाना ही ठीक है ज़माना मतलबी , दुनिया मतलबी हर शख़्स मतलबी तू भी मतलबी और अब मैं भी मतलबी

Rovej sheikh

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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ

Ammar Iqbal

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जहाँ से हुआ था शुरूअ' सफ़र देखा वहाँ कोई नहीं था सामने था मुंतज़िर सहरा सफ़र का और साए ख़ार-दार देखते रुकते ठीक वैसे ही जो मेरे आगे के पाएदानों पर खड़े सायों ने सोचा चाहा और किया मैं जो उन का पेश-रौ हूँ

Aadil Raza Mansoori

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लटका दिया दिन खूँटी पर हैंगर से उतारी रात पहनने के लिए दिन और रात हो गए कितने पुराने अगले सफ़र के लिए मुनासिब होगा कौन सा लिबास

Aadil Raza Mansoori

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नहीं मिटती किसी की भूक रोटी से नहीं करते किसी के दर्द का दरमाँ आँसू कहीं होता असर दी हुई दु'आओं का नहीं उठता कोई इंक़लाब लहू से नहीं उगता कोई सब्ज़ा पसीने से फलता ही नहीं कोई भी काम बाँधा ही नहीं गया प्रेम सूत हमारी 'उम्रें गुज़र चुकी हैं

Aadil Raza Mansoori

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इक पत्ती के टूटने गिरने की आवाज़ से सिहर उठा है सहेमता पेड़ बे-तअल्लुक़ शाख़ पर बैठी है चिड़िया नाक के नीचे पड़ा है घोंसला बिखरा हुआ जिस के गिरने और बिखरने की सदास बे-ख़बर है पेड़ मुद्दतों से वो हमारी ही तरह हैं साथ साथ

Aadil Raza Mansoori

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पसंद आएगा आहंग अक्स पैकर निकालोगे जो भी मअ'नी वो सब तुम्हारे हैं मेरा क्या मैं तो हूँ लफ़्ज़

Aadil Raza Mansoori

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