nazmKuch Alfaaz

साक़ी कुछ आज तुझ को ख़बर है बसंत की हर सू बहार पेश-ए-नज़र है बसंत की सरसों जो फूल उट्ठी है चश्म-ए-क़यास में फूले-फले शामिल हैं बसंती लिबास में पत्ते जो ज़र्द ज़र्द हैं सोने के पात हैं सदबर्ग से तलाई किरन फूल मात हैं हैं चूड़ियों की जोड़ बसंती कलाई में बन के बहार आई है दस्त-ए-हिनाई में मस्ती भरे दिलों की उमंगें न पूछिए क्या मंतिक़ें हैं क्या हैं तरंगें न पूछिए माथे पे हुस्न-ख़ेज़ है जल्वा गुलाल का बिंदी से औज पर है सितारा जमाल का गेंदों से माइल-ए-गुल-ए-बाज़ी हसीन हैं सर के उभार पर से दुपट्टे महीन हैं अक्स-ए-नक़ाब ज़ीनत-ए-रुख़्सार हो गया ज़ेवर जो सीम का था तला-कार हो गया सरसों के लहलहाते हैं खेत इस बहार में नर्गिस के फूल फूल उठे लाला-ज़ार में आवाज़ है पपीहों की मस्ती भरी हुई तूती के बोल सुन के तबीअ'त हरी हुई कोयल के जोड़े करते हैं चुहलें सुरूर से आते हैं तान उड़ाते हुए दूर दूर से बौर आम के हैं यूँँ चमन-ए-काएनात में मोती के जैसे गुच्छे हों ज़र-कार पात में भेरों की गूँज मस्त है हर किश्त-ज़ार में बंसी बजाते किश्न है गोया बहार में केसर कुसूम की ख़ूब दिल-अफ़ज़ा बहार है गेंदों की हर चमन में दो-रूया क़तार है इक आग सी लगाई है टेसू ने फूल के क्या ज़र्द ज़र्द फूल खिले हैं बबूल के है इष्ट देवताओ के मंदिर सजे हुए हैं ज़र्द ज़र्द फूलों से कुल दर सजे हुए बस देव-जी के लाल की झाँकी अजीब है आनंद बे-हिसाब दिलों को नसीब है बंसी जड़ाव सोने की लब से मिली हुई दिल की कली कली है नज़र में खिली हुई पीताम्बर नफ़ीस कमर में कसा हुआ ख़ुशबू से हार फूल की मंदिर बसा हुआ शानों पे बल पड़े हुए ज़ुल्फ़-ए-सियाह के राधा से बार बार इशारे निगाह के बाँकी अदाएँ देख के दिल लोट-पोट है रुतकाम इस्त्री के कलेजे पे चोट है कानों में कुण्डलों की चमक है जड़ाव से राधा लजाई जाती है चंचल सुभाव से प्यारी का हाथ अपनी बग़ल में लिए हुए आँखें शराब-ए-हुस्न-ए-जवानी पिए हुए दिल राधिका का बादा-ए-उल्फ़त से चूर है कुहनी से ठेलने की अदा का ज़ुहूर है चुपकी खड़ी है किश्न के रुख़ पर निगाह है है पहलू-ए-जिगर में जगह दिल में राह है उल्फ़त भरी जो बंसी की जानिब नज़र गई गोया बसंत की राग की धुन मस्त कर गई इस छब पे इस सिंगार पे दिल से निसार 'उफ़ुक़' क़ुर्बान एक बार नहीं लाख बार 'उफ़ुक़' ऐ किश्न नाज़िरीं को मुबारक बसंत हो खेला जो अपने वो अबद तक बसंत हो

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र

ZafarAli Memon

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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फ़ख़्र-ए-वतन हैं दोनों और दोनों मुक़्तदर हैं हैं फूल इक चमन के इक नख़्ल के समर हैं ऐ क़ौम तेरे दुख के दोनों ही चारा-गर हैं दोनों जिगर जिगर हैं लेकिन दिगर दिगर हैं आपस के तफ़रक़ों से हैं आह ख़ार दोनों अग़्यार की नज़र में हैं बे-वक़ार दोनों मिल कर चलो कि आख़िर दोनों हो भाई भाई भाई से क्या लड़ाई भाई से क्या बुराई कब तक ये ख़ाना-जंगी कब तक ये ख़ुद-सिताई दो भाइयों को हरगिज़ ज़ेबा नहीं जुदाई मिल कर गले निकालो दिल का ग़ुबार दोनों इस ख़ाक के हो पुतले पायान-ए-कार दोनों रश्क-ए-जिनाँ बनाओ हिन्दोस्ताँ को मिल कर ख़ून-ए-जिगर से सींचो इस गुलिस्ताँ को मिल कर लहराओ आसमाँ पर क़ौमी निशाँ को मिल कर दो आब-ए-जाँ-निसारी नोक-ए-सिनाँ को मिल कर

Ufuq Lakhnavi

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