nazmKuch Alfaaz

फ़ख़्र-ए-वतन हैं दोनों और दोनों मुक़्तदर हैं हैं फूल इक चमन के इक नख़्ल के समर हैं ऐ क़ौम तेरे दुख के दोनों ही चारा-गर हैं दोनों जिगर जिगर हैं लेकिन दिगर दिगर हैं आपस के तफ़रक़ों से हैं आह ख़ार दोनों अग़्यार की नज़र में हैं बे-वक़ार दोनों मिल कर चलो कि आख़िर दोनों हो भाई भाई भाई से क्या लड़ाई भाई से क्या बुराई कब तक ये ख़ाना-जंगी कब तक ये ख़ुद-सिताई दो भाइयों को हरगिज़ ज़ेबा नहीं जुदाई मिल कर गले निकालो दिल का ग़ुबार दोनों इस ख़ाक के हो पुतले पायान-ए-कार दोनों रश्क-ए-जिनाँ बनाओ हिन्दोस्ताँ को मिल कर ख़ून-ए-जिगर से सींचो इस गुलिस्ताँ को मिल कर लहराओ आसमाँ पर क़ौमी निशाँ को मिल कर दो आब-ए-जाँ-निसारी नोक-ए-सिनाँ को मिल कर

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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साक़ी कुछ आज तुझ को ख़बर है बसंत की हर सू बहार पेश-ए-नज़र है बसंत की सरसों जो फूल उट्ठी है चश्म-ए-क़यास में फूले-फले शामिल हैं बसंती लिबास में पत्ते जो ज़र्द ज़र्द हैं सोने के पात हैं सदबर्ग से तलाई किरन फूल मात हैं हैं चूड़ियों की जोड़ बसंती कलाई में बन के बहार आई है दस्त-ए-हिनाई में मस्ती भरे दिलों की उमंगें न पूछिए क्या मंतिक़ें हैं क्या हैं तरंगें न पूछिए माथे पे हुस्न-ख़ेज़ है जल्वा गुलाल का बिंदी से औज पर है सितारा जमाल का गेंदों से माइल-ए-गुल-ए-बाज़ी हसीन हैं सर के उभार पर से दुपट्टे महीन हैं अक्स-ए-नक़ाब ज़ीनत-ए-रुख़्सार हो गया ज़ेवर जो सीम का था तला-कार हो गया सरसों के लहलहाते हैं खेत इस बहार में नर्गिस के फूल फूल उठे लाला-ज़ार में आवाज़ है पपीहों की मस्ती भरी हुई तूती के बोल सुन के तबीअ'त हरी हुई कोयल के जोड़े करते हैं चुहलें सुरूर से आते हैं तान उड़ाते हुए दूर दूर से बौर आम के हैं यूँँ चमन-ए-काएनात में मोती के जैसे गुच्छे हों ज़र-कार पात में भेरों की गूँज मस्त है हर किश्त-ज़ार में बंसी बजाते किश्न है गोया बहार में केसर कुसूम की ख़ूब दिल-अफ़ज़ा बहार है गेंदों की हर चमन में दो-रूया क़तार है इक आग सी लगाई है टेसू ने फूल के क्या ज़र्द ज़र्द फूल खिले हैं बबूल के है इष्ट देवताओ के मंदिर सजे हुए हैं ज़र्द ज़र्द फूलों से कुल दर सजे हुए बस देव-जी के लाल की झाँकी अजीब है आनंद बे-हिसाब दिलों को नसीब है बंसी जड़ाव सोने की लब से मिली हुई दिल की कली कली है नज़र में खिली हुई पीताम्बर नफ़ीस कमर में कसा हुआ ख़ुशबू से हार फूल की मंदिर बसा हुआ शानों पे बल पड़े हुए ज़ुल्फ़-ए-सियाह के राधा से बार बार इशारे निगाह के बाँकी अदाएँ देख के दिल लोट-पोट है रुतकाम इस्त्री के कलेजे पे चोट है कानों में कुण्डलों की चमक है जड़ाव से राधा लजाई जाती है चंचल सुभाव से प्यारी का हाथ अपनी बग़ल में लिए हुए आँखें शराब-ए-हुस्न-ए-जवानी पिए हुए दिल राधिका का बादा-ए-उल्फ़त से चूर है कुहनी से ठेलने की अदा का ज़ुहूर है चुपकी खड़ी है किश्न के रुख़ पर निगाह है है पहलू-ए-जिगर में जगह दिल में राह है उल्फ़त भरी जो बंसी की जानिब नज़र गई गोया बसंत की राग की धुन मस्त कर गई इस छब पे इस सिंगार पे दिल से निसार 'उफ़ुक़' क़ुर्बान एक बार नहीं लाख बार 'उफ़ुक़' ऐ किश्न नाज़िरीं को मुबारक बसंत हो खेला जो अपने वो अबद तक बसंत हो

Ufuq Lakhnavi

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