nazmKuch Alfaaz

ख़ामुशी रेंगती है राहों पर एक अफ़्सूँ-ब-दोश ख़्वाब लिए रात रुक रुक के साँस लेती है अपनी ज़ुल्मत का बोझ उठाए हुए मुज़्महिल चाँद की शुआ'ओं में बीते लम्हों की याद रक़्साँ है जाने किन माह-ओ-साल का साया वक़्त की आहटों पे लर्ज़ां है एक याद इक तसव्वुर-ए-रफ़्ता सीना-ए-माह से उभरता है है ये सरशारी-ए-हयात का रंग दर्द किन मंज़िलों से गुज़रा है

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"सौदाई" अजब दिल है न जीता है न मरता है न सीने में ठहरता है न बाहर ही निकलता है अजब जाँ है तरसती है कि तू आए झिझकती है कि तू आए तो ना-मालूम क्या होगा परेशाँ है कि दुनिया क्या कहेगी पशेमाँ है कि अपने बा-हमी रिश्ते में वो दम है न वो ख़म है मगर फिर भी बिलखती है कि तन्हाई ने ऐसा मार रक्खा है न तू आई तो मेरा क्या बनेगा अजब तू है न अपनों में न ग़ैरों में न ग़म-अंदोज़ ख़ल्वत में न जाँ-अफ़रोज़ जल्वत में मुझे डर है कि तुझ सेे मेल होगा तो कहाँ होगा किसी सर-सब्ज़ वादी में के इस वीरान कुटिया में इसी दुनिया में या फिर सरहदों के पार उक़्बा में अजब मैं हूँ मुफ़क्किर भी मुहक़्क़िक़ भी मुसन्निफ़ भी मगर अफ़सोस आशिक़ भी गया-गुज़रा सा शाइ'र भी बईद-अज़-अक़्ल भी और रस्म-ए-दुनिया से भी बे-गाना जो अनजाने में तुझ सेे ढेर सारा प्यार कर बैठा ब-हर-सूरत अगर कुछ वाक़िया है तो फ़क़त ये है मिरा दिल तुझ पे शैदा है मिरी जाँ तुझ पे वारी है मगर फिर भी ये हसरत है कि कोई मरहम-ए-दिल दिल को समझाए कोई गिरवीदा-ए-जाँ जाँ को बतलाए कि तू इक पैकर-ए-दिलकश नहीं है एक नागन है जो अपनों ही को डसने के लिए बेताब रहती है ये सब कुछ जान कर भी मैं तिरे इन गेसुओं के पेच-ओ-ख़म का सिर-फिरा क़ैदी तड़पता रहता हूँ मैं इस लिए शायद के तू आए तू आ कर मुझ को पहले की तरह दोबारा डस जाए

Dharmesh bashar

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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है

Akhtar Payami

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'हम लड़के हैं' आज आप को सब सच-सच बताते हैं हम किस लिए इतना मुस्कुराते हैं हम को रोना भी आए तो कहाँ रो पाते हैं कोई देख न ले रोता हुआ ये सोच कर डर जाते हैं दर्द सहते हैं और अपने आसुओं को पी जाते हैं हम वो हैं जिन्हें अपने अश्क बहाने से रोका जाता है जिन्हें अपना दर्द सुनाने से रोका जाता है हम वो हैं जो ख़ुद ही ख़ुद का मज़ाक़ बनाते हैं और फिर एक दूजे से सच छिपाते हैं हम सब कुछ कर सकते हैं मगर कभी खुल कर रो नहीं सकते हमारा दर्द हमारे सिवा इस दुनिया में कहाँ कोई समझ पाता है सुख में खुल के हँसते हैं और दुख में झूठ-मूठ का मुस्कुराना आता है हम लड़के हैं साहब हमें बचपन से बस यही सिखाया गया है लड़के रोते नहीं हैं ये बोल-बोल कर पत्थर दिल बनाया गया है अपने मन की करने वाला इस समाज की नज़र में हर लड़का बुरा है अपने आसुओं को पी जाओ दोस्तों हम लड़के हैं हमें रोना मना है

ABhishek Parashar

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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं

Tehzeeb Hafi

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"शाइराना मिज़ाज" अबकि पास आए हो ख़ुश्बूओं के साए हो कल तलक तो मेरे थे आज तुम पराए हो उम्र भर की चाहत की रुख़्सती नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते सादगी से आओगे बे-रुखी से जाओगे मेरे पास आए हो किस का दिल दुखाओगे दिलजलों से जान-ए-जानाँ दिल-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार मुस्कुराए थे फूल मुँह बनाए थे मैं ने ख़्वाब बेंचा था मैं ने दिल उगाए थे मैं कि जैसे करता था आदमी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते बे-वफ़ाई आदत है बे-हयाई फ़ितरत है मेरे जैसे आशिक़ हैं आशिक़ी पे लानत है जानाँ मेरे जैसों से मुँह-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते हुस्न पे लिबादा है दर्द भी कुशादा है ज़ेहन का तो फिर भी ठीक दिल नहीं अमादा है यूँँ पराई रौशनी से रौशनी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार बोए जाएँगे ख़ाक अब उड़ाएँगे मैं ने तुम को चाहा था और अब भुलाएँगे तुम सेे बैर नहीं करते प्यार भी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते दिल से आगे जाना है पेट चुन के आना है हाथ जिस का थामा है उम्र भर निभाना है उम्र भर के साथी को यूँँ दुखी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते

Rakesh Mahadiuree

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खुली आँखों को कोई बंद कर दो खुली आँखों की वीरानी से हौल आता है कोई इन खुली आँखों को बढ़ कर बंद कर दो ये आँखें इक अनोखी यख़-ज़दा दुनिया की साकित रौशनी में खो गई हैं अब इन आँखों में कोई रंग पैदा है न कोई रंग पिन्हाँ है न कोई अक्स-ए-गुल-बन है न कोई दाग़-ए-हिर्मां है न गंज-ए-शाएगाँ की आरज़ू-ए-बे-निहायत है न रंज-ए-राएगाँ का अक्स-ए-लर्ज़ां है अगर कुछ है तो बस इक यख़-ज़दा नया का नक़्श-ए-जावेदाँ है ये आँखें अब शुआ-ए-आरज़ू की हर किरन से यूँँ गुरेज़ाँ हैं कि पत्थर बन गई हैं ये आँखें मर गई हैं

Mahmood Ayaz

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रात भर नर्म हवाओं के झोंके वक़्त की मौज रवाँ पर बहते तेरी यादों के सफ़ीने लाए कि जज़ीरों से निकल कर आए गुज़रा वक़्त का दामन था में तिरी यादें तिरे ग़म के साए एक इक हर्फ़-ए-वफ़ा की ख़ुश्बू मौजा-ए-गुल में सिमट कर आए एक इक अहद-ए-वफ़ा का मंज़र ख़्वाब की तरह गुज़रते बादल तेरी क़ुर्बत के महकते हुए पल मेरे दामन से लिपटने आए नींद के बार से बोझल आँखें गर्द-ए-अय्याम से धुँदलाए हुए एक इक नक़्श को हैरत से तकें लेकिन अब उन से मुझे क्या लेना मेरे किस काम के ये नज़राने एक छोड़ी हुई दुनिया के सफ़ीर मेरे ग़म-ख़ाने में फिर क्यूँँ आए दर्द का रिश्ता रिफ़ाक़त की लगन रूह की प्यास मोहब्बत के चलन मैं ने मुँह मोड़ लिया है सब से मैं ने दुनिया के तक़ाज़े समझे अब मेरे पास कोई क्यूँँ आए रात भर नौहा-कुनाँ याद की बिफरी मौजें मेरे ख़ामोश दर ओ बाम से टकराती हैं मेरे सीने के हर इक ज़ख़्म को सहलाती है मुझे एहसास की उस मौत पर सह दे कर सुब्ह के साथ निगूँ सार पलट जाती है

Mahmood Ayaz

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सारे अफ़्क़ार-ओ-अक़ाएद के तिलिस्म सारे असनाम-ए-ख़याल हम ने वो बुत-शिकनी की है कि मिस्मार हैं सब अपने घर बार की महफ़ूज़ फ़सीलें हम ने यूँँ गिराई हैं कि अब दूर-ओ-नज़दीक की हर तुंद हवा सब चराग़ों को बस इक फूँक में गुल कर जाए हम कि हर सिलसिला-ओ-क़ैद की ज़ंजीर से आज़ाद हुए ऐसे मज्लिस के मकीं हैं कि जहाँ कोई दरवाज़ा कोई रौज़न-ए-दीवार नहीं या ख़ुदा कोई ग़म ऐसा कि हर ग़म को सुबुकसार करे कोई आग ऐसी कि हर आग को ख़ाशाक करे कोई मफ़्हूम कोई नक़्श-ए-तमन्ना कि जिसे अपने दिल-ओ-जाँ का लहू नज़्र करूँँ सुर्ख़-रू हो के कहूँ ज़ीस्त की ये मोहलत दो-एक नफ़स इतनी बे-रंग न थी इतनी फ़रोमाया न थी

Mahmood Ayaz

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गुज़रे हुए माह ओ साल के ग़म तन्हाई शब में जाग उट्ठे हैं उम्र-ए-रफ़्ता की जुस्तुजू में अश्कों के चराग़ जल रहे हैं आसाइश-ए-ज़िंदगी की हसरत माज़ी का नक़्श बन चुकी है हालात की ना-गुज़ीर तल्ख़ी एक एक नफ़स में बस गई है नाकामी-ए-आरज़ू को दिल ने तस्लीम ओ रज़ा के नाम बख़्शे मिलने की ख़ुशी बिछड़ने का ग़म क्या क्या थे फ़रेब-ए-ज़िंदगी के इक उम्र में अब समझ सके हैं ख़ुशियों का फ़ुसूँ गुरेज़ पा है अब तर्क दुआ की मंज़िलें हैं दामान-ए-तलब सिमट चुका है नाकामी-ए-शौक़ मिटते मिटते जीने का शुऊर दे गई है ये ग़म है नवाए शब का हासिल ये दर्द मता-ए-ज़िंदगी है उजड़ी हुई हर रविश चमन की देती है सुराग़ रंग ओ बू का वीरान हैं ज़िंदगी की राहें रौशन है चराग़ आरज़ू का

Mahmood Ayaz

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तुम ने मुझ से कोई इक़रार‌‌‌‌-ए-रिफ़ाक़त न किया ये न कहा तुम से बिछड़ जाऊँ तो ज़िंदा न रहूँ मैं ने तुम्हें ज़ीस्त का सरमाया मिरा हासिल-ए-यक-उम्र-ए-तमन्ना न कहा इस क़दर झूट से दहशत-ज़दा थे हम कि कोई सच न कहा मैं ने बस इतना कहा देखो हम और तुम इस आग का हिस्सा हैं जो ख़ाशाक की मानिंद जलाती है हमें तुम ने बस इतना कहा देखो इस आग में हम दोनों अकेले भी हैं साथी भी हैं और हम करते रहे उम्र-ए-मह-ओ-साल के ज़ख़्मों का शुमार कहकशाँ फीकी है कुछ देर का मेहमान है चाँद डूबती रात में ढलते हुए साए चुप हैं मेरी शिरयानों में यख़-बस्ता लहू हैराँ है अव्वलीं क़ुर्ब की ये आँच कहाँ से आई अजनबी कैसे कहूँ तुम तो मिरे दिल के निहाँ-ख़ाने में सोए हुए हर ख़्वाब का चेहरा निकले

Mahmood Ayaz

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