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“बेटी बचाइए” बेटी से ये जहान है बेटी बचाइए माँ बाप की ये जान है बेटी बचाइए ये सारी काइनात बदौलत इसी से है सारे जहाँ में फैली मोहब्बत इसी से है बेटी चमेली बनके चमन में महक रही बातों से यूँँ लगे है कि बुलबुल चहक रही बेटी से ख़ानदान है बेटी बचाइए बेटी कहीं पे माँ कही बहना के रूप में पत्नी बहु ये बनके निकलती है धूप में हर काम में हैं हाथ बटातीं ये बेटियाँ हर रूप में हैं प्यार लुटातीं ये बेटियाँ ये घर की आन बान है बेटी बचाइए बेटी को मारिए न बहू को जलाइए बेटी बहन किसी कि हो इज़्ज़त बचाइए बनकर दुल्हन जो आई तो ख़ुशियाँ भी लाएगी माँ बन के एक रोज़ ये ममता लुटाएगी ये दो कुलों की शान है बेटी बचाइए

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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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"सुनो शादी मुबारक हो" सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब बता भी दो कि सुनने को वो ख़ुश-ख़बरी मैं आऊँ अब किसी दिन छोड़ जाएगी तेरे बेटे को कोई जब किसी आशिक़ की माँ का दुख समझ पाए तू शायद तब इसे इंसाफ़ कहते हैं इसी से भागते हैं सब इसी को पूजता हूँ मैं इसी से काँपते हैं रब मगर तब तक मुनासिब है तड़प को बोलना करतब सुनो शादी मुबारक हो दुल्हन तो बन चुकी हो अब

Anant Gupta

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इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है इस के साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे ख़त्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ताज वो शम्अ' है उल्फ़त के सनम-ख़ाने की जिस के परवानों में मुफ़्लिस भी हैं ज़रदार भी हैं संग-ए-मरमर में समाए हुए ख़्वाबों की क़सम मरहले प्यार के आसाँ भी हैं दुश्वार भी हैं दिल को इक जोश इरादों को जवानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ताज इक ज़िंदा तसव्वुर है किसी शाएर का उस का अफ़्साना हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं इस के आग़ोश में आ कर ये गुमाँ होता है ज़िंदगी जैसे मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं ताज ने प्यार की मौजों को रवानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ये हसीं रात ये महकी हुई पुर-नूर फ़ज़ा हो इजाज़त तो ये दिल इश्क़ का इज़हार करे इश्क़ इंसान को इंसान बना देता है किस की हिम्मत है मोहब्बत से जो इनकार करे आज तक़दीर ने ये रात सुहानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज महल सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल

Shakeel Badayuni

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"याद-ए-बेवफ़ा" बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा ऐ मेरी बे वफ़ा याद आएँगी मुझ को तेरी हर जफ़ा क्या से क्या हो गया मैं तेरे प्यार में दिल लगाया था तुझ सेे यूँँ बेकार में प्यार करना भी इक ज़ुर्म है और ख़ता प्यार ज़्यादा मैं करता हूँ तुझ सेे फ़क़त मैं ने नफ़रत न की तुझ सेे जाँ आज तक वो सबब तू बता क्यूँ किया अलविदा सर झुका कर के माँगा था तुझ को सनम तू न मुझ को मिला हो गई आँखें नम तुझ को आबाद रक्खे मेरा वो ख़ुदा तेरी यादों को दिल में बसाऊँगा मैं ये तो मुमकिन नहीं भूल जाऊँगा मैं याद करता है 'दानिश' ये तुझ को सदा

Danish Balliavi

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वतन ये हमारा ज़मीं ये हमारी वतन ये हमारा  उजड़ने न देंगे चमन ये हमारा  वतन के लिए जो मेरी जान जाए ख़ुदारा यहीं  फिर जनम लें दुबारा  जो सरहद पे अपने सरों को कटा कर अमर हो गए जो वतन को बचाकर वो ख़ुशबू के जैसे महकते रहेंगे चमकते रहेंगे वो बनकर सितारा भगत बोस सुखदेव बलिदानियों को न भूलेंगे हम उन की क़ुर्बानियों को वो फाँसी में भी चढ़ गए हँसते हँसते वतन के लिए हर सितम था गवारा  तुम्हें याद करते हैं ये चाँद-तारे तुम्हें  सरहदों की है मिट्टी पुकारे चराग़-ए-मोहब्बत जलाते रहेंगे न टूटेगा रिश्ता हमारा तुम्हारा न मज़हब सिखाता है तकरार बाँटो अगर बाँटना हो सदा प्यार बाँटो  रज़ा हो अमन सारी दुनिया में क़ाएम ज़माने में हो हर तरफ़ भाई चारा

SALIM RAZA REWA

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"कहीं और चल" मेरे दिल कहीं और चल ज़माने में तेरा ठिकाना नहीं वफ़ा तू करेगा मिलेगी जफ़ाएँ ज़माने की ऐसी लगी बद्दुआएँ नज़र तू उठा कर के जी न सकेगा जुदाई का तू ज़हर पी न सकेगा मेरे दिल न इतना मचल कि रो रो के जाँ को गँवाना नहीं तुझे तेरे अपने ही छलने लगे हैं तेरे सारे सपने बिखरने लगे हैं अरे बेख़बर इतना हैरान क्यूँँ है ज़माने से इतना परेशान क्यूँँ है मेरे दिल तू ख़ुद को बदल तड़प कर के दिल को जलाना नहीं तेरे प्यार ने तुझ को धोका दिया है सुना है कोई उन का साथी नया है मगर तेरे बिन कैसे ख़ुश वो रहेंगे तेरी याद आई तो तड़पा करेंगे मेरे दिल अब तो सँभल जफ़ाओं को उन के भुलाना नहीं

SALIM RAZA REWA

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होली रुठो नईं सरकार कि होली आई है झूम रहा संसार कि होली आई है होली के दिन बड़ों का आशीर्वाद रहे छोटों के संग होली के पल याद रहे हर मज़हब के लोग ख़ुशी में खोए हैं रंगों का त्योहार कि होली आई है साजन हैं परदेश न भाए रंग अबीर गोरी के आँखों से बहते झर-झर नीर सजनी ने साजन को लिखकर भेजा है तुम बिन नहीं क़रार कि होली आई है होली के दिन बदला हर रुख़सार लगे रंग -बिरंगा आज मेरा दिलदार लगे पी कर भांग हैं झू में फाग की टोली में उड़ती रंग फुहार कि होली आई है

SALIM RAZA REWA

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ईमान की शम्अ' ऐ मेरे दोस्त मोहब्बत को बचाए रखना दिल में ईमान कि शम्ओं को जलाए रखना इस नए साल में ख़ुशियों का चमन खिल जाए सब को मनचाही मुरादों का सिला मिल जाए इस नए साल में ख़ुशियों की हो बारिश घर घर इस नए साल को ख़ुश-रंग बनाए रखना जान पुरखों ने लुटाई है वतन की ख़ातिर गोलियाँ सीने में खाई है वतन की ख़ातिर सारे धर्मों से ही ताक़त है वतन की मेरे सारे धर्मों की मोहब्बत को बनाए रखना ज़ात के नाम पे दंगों को कराने वालो बाज़ आ जाओ मोहब्बत को मिटाने वालो धर्म के नाम पे यूँँ आग लगाने वालो ख़ुद के दामन को भी जलने से बचाए रखना क्यूँँ मिटाने में लगे हो ये चमन की ख़ुशबू ख़ून से सींचा तो पाई है वतन की ख़ुशबू हर तरफ़ जलने लगा है ये वतन का आँचल लाज इस माँ की मेरे यार बचाए रखना सारी दुनिया में मोहब्बत की ज़बाँ हो जाए सारी दुनिया में ख़ुशी अम्न-ओ-अमाँ हो जाए भूल कर भी न कोई भूल हो हरगिज़ मुझ सेे मुझ पे भी नज़्र-ए-करम अपनी बनाए रखना दिल से नफ़रत की मिनारों को गिराना होगा दोस्त बनकर के गले सब को लगाना होगा जिन की ख़ुशबू से महक जाए वतन का आँगन ऐसे फूलों को भी गुलशन में लगाए रखना

SALIM RAZA REWA

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