ईमान की शम्अ' ऐ मेरे दोस्त मोहब्बत को बचाए रखना दिल में ईमान कि शम्ओं को जलाए रखना इस नए साल में ख़ुशियों का चमन खिल जाए सब को मनचाही मुरादों का सिला मिल जाए इस नए साल में ख़ुशियों की हो बारिश घर घर इस नए साल को ख़ुश-रंग बनाए रखना जान पुरखों ने लुटाई है वतन की ख़ातिर गोलियाँ सीने में खाई है वतन की ख़ातिर सारे धर्मों से ही ताक़त है वतन की मेरे सारे धर्मों की मोहब्बत को बनाए रखना ज़ात के नाम पे दंगों को कराने वालो बाज़ आ जाओ मोहब्बत को मिटाने वालो धर्म के नाम पे यूँँ आग लगाने वालो ख़ुद के दामन को भी जलने से बचाए रखना क्यूँँ मिटाने में लगे हो ये चमन की ख़ुशबू ख़ून से सींचा तो पाई है वतन की ख़ुशबू हर तरफ़ जलने लगा है ये वतन का आँचल लाज इस माँ की मेरे यार बचाए रखना सारी दुनिया में मोहब्बत की ज़बाँ हो जाए सारी दुनिया में ख़ुशी अम्न-ओ-अमाँ हो जाए भूल कर भी न कोई भूल हो हरगिज़ मुझ सेे मुझ पे भी नज़्र-ए-करम अपनी बनाए रखना दिल से नफ़रत की मिनारों को गिराना होगा दोस्त बनकर के गले सब को लगाना होगा जिन की ख़ुशबू से महक जाए वतन का आँगन ऐसे फूलों को भी गुलशन में लगाए रखना
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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वतन ये हमारा ज़मीं ये हमारी वतन ये हमारा उजड़ने न देंगे चमन ये हमारा वतन के लिए जो मेरी जान जाए ख़ुदारा यहीं फिर जनम लें दुबारा जो सरहद पे अपने सरों को कटा कर अमर हो गए जो वतन को बचाकर वो ख़ुशबू के जैसे महकते रहेंगे चमकते रहेंगे वो बनकर सितारा भगत बोस सुखदेव बलिदानियों को न भूलेंगे हम उन की क़ुर्बानियों को वो फाँसी में भी चढ़ गए हँसते हँसते वतन के लिए हर सितम था गवारा तुम्हें याद करते हैं ये चाँद-तारे तुम्हें सरहदों की है मिट्टी पुकारे चराग़-ए-मोहब्बत जलाते रहेंगे न टूटेगा रिश्ता हमारा तुम्हारा न मज़हब सिखाता है तकरार बाँटो अगर बाँटना हो सदा प्यार बाँटो रज़ा हो अमन सारी दुनिया में क़ाएम ज़माने में हो हर तरफ़ भाई चारा
SALIM RAZA REWA
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“बेटी बचाइए” बेटी से ये जहान है बेटी बचाइए माँ बाप की ये जान है बेटी बचाइए ये सारी काइनात बदौलत इसी से है सारे जहाँ में फैली मोहब्बत इसी से है बेटी चमेली बनके चमन में महक रही बातों से यूँँ लगे है कि बुलबुल चहक रही बेटी से ख़ानदान है बेटी बचाइए बेटी कहीं पे माँ कही बहना के रूप में पत्नी बहु ये बनके निकलती है धूप में हर काम में हैं हाथ बटातीं ये बेटियाँ हर रूप में हैं प्यार लुटातीं ये बेटियाँ ये घर की आन बान है बेटी बचाइए बेटी को मारिए न बहू को जलाइए बेटी बहन किसी कि हो इज़्ज़त बचाइए बनकर दुल्हन जो आई तो ख़ुशियाँ भी लाएगी माँ बन के एक रोज़ ये ममता लुटाएगी ये दो कुलों की शान है बेटी बचाइए
SALIM RAZA REWA
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होली रुठो नईं सरकार कि होली आई है झूम रहा संसार कि होली आई है होली के दिन बड़ों का आशीर्वाद रहे छोटों के संग होली के पल याद रहे हर मज़हब के लोग ख़ुशी में खोए हैं रंगों का त्योहार कि होली आई है साजन हैं परदेश न भाए रंग अबीर गोरी के आँखों से बहते झर-झर नीर सजनी ने साजन को लिखकर भेजा है तुम बिन नहीं क़रार कि होली आई है होली के दिन बदला हर रुख़सार लगे रंग -बिरंगा आज मेरा दिलदार लगे पी कर भांग हैं झू में फाग की टोली में उड़ती रंग फुहार कि होली आई है
SALIM RAZA REWA
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"कहीं और चल" मेरे दिल कहीं और चल ज़माने में तेरा ठिकाना नहीं वफ़ा तू करेगा मिलेगी जफ़ाएँ ज़माने की ऐसी लगी बद्दुआएँ नज़र तू उठा कर के जी न सकेगा जुदाई का तू ज़हर पी न सकेगा मेरे दिल न इतना मचल कि रो रो के जाँ को गँवाना नहीं तुझे तेरे अपने ही छलने लगे हैं तेरे सारे सपने बिखरने लगे हैं अरे बेख़बर इतना हैरान क्यूँँ है ज़माने से इतना परेशान क्यूँँ है मेरे दिल तू ख़ुद को बदल तड़प कर के दिल को जलाना नहीं तेरे प्यार ने तुझ को धोका दिया है सुना है कोई उन का साथी नया है मगर तेरे बिन कैसे ख़ुश वो रहेंगे तेरी याद आई तो तड़पा करेंगे मेरे दिल अब तो सँभल जफ़ाओं को उन के भुलाना नहीं
SALIM RAZA REWA
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