nazmKuch Alfaaz

इक प्रेम पुजारी आया है चरनों में ध्यान लगाने को भगवान तुम्हारी मूरत पर श्रधा के फूल चढ़ाने को वो प्रेम का तूफ़ाँ दिल में उठा कि ज़ब्त का यारा ही न रहा आँखों में अश्क उमँड आए प्रेमी का हाल बताने को तुम नंद को नैन के तारे हो तुम दीन दुखी के सहारे हो तुम नंगे पैरों ढाने हो भगतों का मान बढ़ाने को आँखों से ख़ून टपकता है सीने पर ख़ंजर चलता है मन-मोहन जल्द ख़बर लेना दीनों की जान बचाने को फ़ुर्क़त में तुम्हारी क़ल्ब के टुकड़े आँखों से बह जाते हैं ऐ कृष्ण मुरारी आओ भी रातों को धेर बँधाने को फिर साँवली छब दिखला दो ज़रा फिर प्रेम का रंग जमा दो ज़रा गोकुल में श्याम निकल आओ मुरली की टेर सुनाने को उपदेश धरम का दे कर फिर बलवान बना दो भगतों को ऐ मोहन जल्द ज़बाँ खोलो गीता के राज़ बताने को

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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नंद के लाल यशोदा के दुलारे मोहन हम तिरी याद में बेताब हैं सारे मोहन रोते रोते हुई भगतों की तिरे उम्र बसर किस मुसीबत में शब-ओ-रोज़ गुज़ारे मोहन नाम-लेवा तिरे दुनिया से मिटे जाते हैं जाँ-ब-लब हैं तिरी आँखों के सितारे मोहन जिस को करता था कलेजे से घड़ी भर न जुदा छोड़ रखा है उसे किस के सहारे मोहन फिर वही साँवली छब आए नज़र भगतों को नंद की गोद में जमुना के किनारे मोहन नंद बाबा की कुटी हो गई सूनी तुझ बिन फीके मथुरा के हुए सारे नज़ारे मोहन दर्द-मंदों को कलेजे से लगाने वाले 'आफ़्ताब' आज मुसीबत में पुकारे मोहन

Aaftab Rais Panipati

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आमद है साल-ए-नौ की समाँ है बहार का सरसब्ज़ गुलिस्ताँ है दिल-ए-दाग़-दार का इश्क़-ए-वतन में आशिक़-ए-सादिक़ है जाँ-ब-लब क्या हाल पूछते हो ग़रीब-उद-दयार का यारब कहेंगे किस तरह हम बेकसों के दिन याद आया है क़फ़स में ज़माना बहार का यूँँ अश्क-ए-ग़म टपकते हैं आँखों से क़ौम की मुमकिन नहीं है टूटना अश्कों के तार का इक बार क़त्ल-ए-आम करो तेग़-ए-ज़ुल्म से अच्छा नहीं है जौर-ओ-सितम बार बार का ऐ मादर-ए-वतन के सपूतो बढ़े चलो ये आज हो रहा है इशारा बहार का क़ातिल को नाज़ क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है अगर मज़लूम को भरोसा है परवरदिगार का ऐ मादर-ए-वतन ज़रा दस्त-ए-दुआ' उठा मक़्तल में इम्तिहाँ है तिरे ग़म-गुसार का गिरगिट की तरह रंग बदलता है दम-ब-दम क्या ए'तिबार ग़ैर के क़ौल-ओ-क़रार का अग़्यार से करम की तवक़्क़ो फ़ुज़ूल है अर्सा गुज़र चुका है बहुत इंतिज़ार का ऐ 'आफ़्ताब' दहर का शिकवा है क्यूँ तुझे होता नहीं है कोई दिल-ए-बे-क़रार का

Aaftab Rais Panipati

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"श्याम की याद" नंद के लाल यशोदा के दुलारे मोहन हम तिरी याद में बेताब हैं सारे मोहन रोते रोते हुई भगतों की तिरे उम्र बसर किस मुसीबत में शब-ओ-रोज़ गुज़ारे मोहन नाम-लेवा तिरे दुनिया से मिटे जाते हैं जाँ-ब-लब हैं तिरी आँखों के सितारे मोहन जिस को करता था कलेजे से घड़ी भर न जुदा छोड़ रखा है उसे किस के सहारे मोहन फिर वही साँवली छब आए नज़र भगतों को नंद की गोद में जमुना के किनारे मोहन नंद बाबा की कुटी हो गई सूनी तुझ बिन फीके मथुरा के हुए सारे नज़ारे मोहन दर्द-मंदों को कलेजे से लगाने वाले 'आफ़्ताब' आज मुसीबत में पुकारे मोहन

Aaftab Rais Panipati

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सरफ़रोशान-ए-वतन का ये ख़याल अच्छा है हिन्द के वास्ते मरने का मआल अच्छा है जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन हो न अगर दिल में निहाँ ऐसे जीने से तो मरने का ख़याल अच्छा है ज़र्रा-ए-ख़ाक-ए-वतन मेहर-ए-दरख़्शाँ है मुझे वो समझते रहें इंग्लैण्ड का माल अच्छा है जाँ-ब-लब है सितम-ईजाद के हाथों से वतन कौन कहता है मिरे हिन्द का हाल अच्छा है उन को पैरिस के नज़ारों पे फ़िदा होने दो मुझ को भारत के लिए रंज-ओ-मलाल अच्छा है करने देता नहीं जल्लाद ज़बाँ से उफ़ तक दिल में कहता है ग़रीबों का सवाल अच्छा है लाजपत-राय की शमशान से आती है सदा मुल्क की राह में मिटने का ख़याल अच्छा है अपने मतलब के लिए मुल्क का दुश्मन जो बने ऐसे कम्बख़्त का दुनिया में ज़वाल अच्छा है ज़र के थालों में मटन चाप उड़ाने दो उन्हें हम ग़रीबों को मगर जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है 'आफ़्ताब' आज फँसा जाता है फिर ताइर-ए-दिल हाए अफ़्सोस कि सय्याद का जाल अच्छा है

Aaftab Rais Panipati

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क्यूँ तअम्मुल है तुझे रोज़-ए-अजल आने में ज़ीस्त का लुत्फ़ मिलेगा मुझे मर जाने में न सुनो क़िस्सा-ए-आलाम तड़प जाओगे दर्द और सोज़ भरा है मिरे अफ़्साने में क़ल्ब-ए-मुज़्तर को बना रखा है घर हिरमाँ ने और क्या चीज़ है इस दिल के सियह-ख़ाने में अब छलकने को है साक़ी मिरे जीवन का गिलास भर गया आब-ए-फ़ना उम्र के पैमाने में ख़िर्मन-ए-सब्र-ओ-सुकूँ ख़ाक न हो क्यूँ जल कर बिजलियाँ कौंद रही हैं मिरे काशाने में पर्दा-ए-जहल उठा दीजिए आँखों से ज़रा जल्वा-ए-हक़ नज़र आएगा सनम-ख़ाने में 'आफ़्ताब' आ कि मुसीबत के हैं आसार अयाँ जोश-ए-वहशत है फ़ुज़ूँ और भी दीवाने में

Aaftab Rais Panipati

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