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आमद है साल-ए-नौ की समाँ है बहार का सरसब्ज़ गुलिस्ताँ है दिल-ए-दाग़-दार का इश्क़-ए-वतन में आशिक़-ए-सादिक़ है जाँ-ब-लब क्या हाल पूछते हो ग़रीब-उद-दयार का यारब कहेंगे किस तरह हम बेकसों के दिन याद आया है क़फ़स में ज़माना बहार का यूँँ अश्क-ए-ग़म टपकते हैं आँखों से क़ौम की मुमकिन नहीं है टूटना अश्कों के तार का इक बार क़त्ल-ए-आम करो तेग़-ए-ज़ुल्म से अच्छा नहीं है जौर-ओ-सितम बार बार का ऐ मादर-ए-वतन के सपूतो बढ़े चलो ये आज हो रहा है इशारा बहार का क़ातिल को नाज़ क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है अगर मज़लूम को भरोसा है परवरदिगार का ऐ मादर-ए-वतन ज़रा दस्त-ए-दुआ' उठा मक़्तल में इम्तिहाँ है तिरे ग़म-गुसार का गिरगिट की तरह रंग बदलता है दम-ब-दम क्या ए'तिबार ग़ैर के क़ौल-ओ-क़रार का अग़्यार से करम की तवक़्क़ो फ़ुज़ूल है अर्सा गुज़र चुका है बहुत इंतिज़ार का ऐ 'आफ़्ताब' दहर का शिकवा है क्यूँ तुझे होता नहीं है कोई दिल-ए-बे-क़रार का

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजयारे वतन हर आँख के तारे वतन गुल-पोश तेरी वादियाँ फ़रहत-निशाँ राहत-रसाँ तेरे चमन-ज़ारों पे है गुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँ हर शाख़ फूलों की छड़ी हर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँ कौसर के चश्में जा-ब-जा तसनीम हर आब-ए-रवाँ हर बर्ग रूह-ए-ताज़गी हर फूल जान-ए-गुल्सिताँ हर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशी हर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँ दिलकश चरागाहें तिरी ढोरों के जिन में कारवाँ अंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौ हर तख़्ता-ए-गुल आसमाँ नक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जा हर हर रविश इक कहकशाँ तेरी बहारें दाइमी तेरी बहारें जावेदाँ तुझ में है रूह-ए-ज़िंदगी पैहम रवाँ पैहम दवाँ दरिया वो तेरे तुंद-ख़ू झीलें वो तेरी बे-कराँ शाम-ए-अवध के लब पे है हुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँ कहती है राज़-ए-सरमदी सुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँ उड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक पर उन कार-ख़ानों का धुआँ जिन में हैं लाखों मेहनती सनअत-गरी के पासबाँ तेरी बनारस की ज़री रश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँ बीदर की फ़नकारी में हैं सनअत की सब बारीकियाँ अज़्मत तिरे इक़बाल की तेरे पहाड़ों से अयाँ दरियाओं का पानी, तरी तक़्दीस का अंदाज़ा-दाँ क्या 'भारतेंदु' ने किया गंगा की लहरों का बयाँ 'इक़बाल' और चकबस्त हैं अज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ 'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैं तेरे अदब के तर्जुमाँ 'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरी ता'रीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँ गाते हैं नग़्मा मिल के सब ऊँचा रहे तेरा निशाँ मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजियारे वतन हर आँख के तारे वतन तेरे नज़ारों के नगीं दुनिया की ख़ातम में नहीं सारे जहाँ में मुंतख़ब कश्मीर की अर्ज़-ए-हसीं फ़ितरत का रंगीं मोजज़ा फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं हाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमीं सरसब्ज़ जिस के दश्त हैं जिस के जबल हैं सुर्मगीं मेवे ब-कसरत हैं जहाँ शीरीं मिसाल-ए-अंग्बीं हर ज़ाफ़राँ के फूल में अक्स-ए-जमाल-ए-हूरईं वो मालवे की चाँदनी गुम जिस में हों दुनिया-ओ-दीं इस ख़ित्ता-ए-नैरंग में हर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रीं हर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगी दिलकश मकाँ दिलकश ज़मीं हर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रू हर एक औरत नाज़नीं वो ताज की ख़ुश-पैकरी हर ज़ाविए से दिल-नशीं सनअत-गरों के दौर की इक यादगार-ए-मरमरीं होती है जो हर शाम को फ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरीं दरिया की मौजों से अलग या इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बीं या ताएर-ए-नूरी कोई परवाज़ करने के क़रीं या अहल-ए-दुनिया से अलग इक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ी नक़्श-ए-अजंता की क़सम जचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चीं शान-ए-एलोरा देख कर झुकती है आज़र की जबीं चित्तौड़ हो या आगरा ऐसे नहीं क़िलए कहीं बुत-गर हो या नक़्क़ाश हो तू सब की अज़्मत का अमीं मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन दिलकश तिरे दश्त ओ चमन रंगीं तिरे शहर ओ चमन तेरे जवाँ राना जवाँ तेरे हसीं गुल पैरहन इक अंजुमन दुनिया है ये तू इस में सद्र-ए-अंजुमन तेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवा शाएर तिरे शीरीं-सुख़न हर ज़र्रा इक माह-ए-मुबीं हर ख़ार रश्क-ए-नस्तरीं ग़ुंचा तिरे सहरा का है इक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतन कंकर हैं तेरे बे-बहा पत्थर तिरे लाल-ए-यमन बस्ती से जंगल ख़ूब-तर बाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बन वो मोर वो कब्क-ए-दरी वो चौकड़ी भरते हिरन रंगीं-अदा वो तितलियाँ बाँबी में वो नागों के फन वो शे'र जिन के नाम से लरज़े में आए अहरमन खेतों की बरकत से अयाँ फ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिनन चश्मों के शीरीं आब से लज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहन ताबिंदा तेरा अहद-ए-नौ रौशन तिरा अहद-ए-कुहन कितनों ने तुझ पर कर दिया क़ुर्बान अपना माल धन कितने शहीदों को मिले तेरे लिए दार-ओ-रसन कितनों को तेरा इश्क़ था कितनों को थी तेरी लगन तेरे जफ़ा-कश मेहनती रखते हैं अज़्म-ए-कोहकन तेरे सिपाही सूरमा बे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन 'भीषम' सा जिन में हौसला 'अर्जुन' सा जिन में बाँकपन आलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैं फ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न 'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल' 'दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण' 'वलाठोल', 'माहिर', भारती 'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन' 'कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद' 'टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन' मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन खेती तिरी हर इक हरी दिलकश तिरी ख़ुश-मंज़री तेरी बिसात-ए-ख़ाक के ज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरी झेलम कावेरी नाग वो गंगा की वो गंगोत्री वो नर्बदा की तमकनत वो शौकत-ए-गोदावरी पाकीज़गी सरजू की वो जमुना की वो ख़ुश-गाैहरी दुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँ कश्मीर की नीलम-परी दिलकश पपीहे की सदा कोयल की तानें मद-भरी तीतर का वो हक़ सिर्रहु तूती का वो विर्द-ए-हरी सूफ़ी तिरे हर दौर में करते रहे पैग़म्बरी 'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिली फ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरी अदल-ए-जहाँगीरी में थी मुज़्मर रेआया-पर्वरी वो नव-रतन जिन से हुई तहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरी रखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़ल इक सौलत-ए-अस्कंदरी रानाओं के इक़बाल की होती है किस से हम-सरी सावंत वो योद्धा तिरे तेरे जियाले वो जरी नीती विदुर की आज तक करती है तेरी रहबरी अब तक है मशहूर-ए-ज़माँ 'चाणक्य' की दानिश-वरी वयास और विश्वामित्र से मुनियों की शान-ए-क़ैसरी पातंजलि ओ साँख से ऋषियों की हिकमत-पर्वरी बख़्शे तुझे इनआम-ए-नौ हर दौर चर्ख़-ए-चम्बरी ख़ुश-गाैहरी दे आब को और ख़ाक को ख़ुश-जौहरी ज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँ क़तरों को दरिया-गुस्तरी मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन तू रहबर-ए-नौ-ए-बशर तू अम्न का पैग़ाम-बर पाले हैं तू ने गोद में साहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़र अफ़ज़ल-तरीं इन सब में है बापू का नाम-ए-मो'तबर हर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशीं हर बात जिस की पुर-असर जिस ने लगाया दहर में नारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर बे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँ बे-सूद हैं तेग़-ओ-तबर हिंसा का रस्ता झूट है हक़ है अहिंसा की डगर दरमाँ है ये हर दर्द का ये हर मरज़ का चारा-गर जंगाह-ए-आलम में कोई इस से नहीं बेहतर सिपर करता हूँ मैं तेरे लिए अब ये दुआ-ए-मुख़्तसर रौनक़ पे हों तेरे चमन सरसब्ज़ हों तेरे शजर नख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरी हर फ़स्ल में हो बारवर कोशिश हो दुनिया में कोई ख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बर तेरा हर इक बासी रहे नेको-सिफ़त नेको-सियर हर ज़न सलीक़ा-मंद हो हर मर्द हो साहिब-हुनर जब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लक जब तक हैं ये शम्स ओ क़मर मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजयारे वतन हर आँख के तारे वतन

Arsh Malsiyani

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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“है एक ऐसी भी लड़की” वो इश्क़ है वो वफ़ा है वो आयत है, इबादत है वो दुआ है, वो आमीन है वो सच है, वो यक़ीन है वो मेरी धूप है, छाँव है आसमाँ है, ज़मीन है है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है वो थोड़ी सी पागल है थोड़ी थोड़ी ज़हीन है, उस की हरकतों में अल्हड़पन, जिस का नक़्श आ'ला जिस का चर्बा हसीन है, हर भौंरा दिवाना उस का जो बर्ग-ए-गुल पे नशीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो इस क़दर माहेरीन है वही मेरी दामन भी है वही मेरी आस्तीन है, वो इमली सी खट्टी है शहद सी मीठी है, कभी वो चटपटी सी कभी वो नमकीन है, वो एक उम्दा परवाज़ है एक आ'ला शाहीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो मेरी दुनिया है, जहान है मेरी पगड़ी है, ज़बीन है, मेरा क़लमा है, ईमान है वो एक तशरीह-ए-दीन है, वो बर्ग-ए-गुल है, काँटा है वो मतीन है, वो महीन है, वो नील-कँवल है, गुलाब है, एक गुलदस्ता रंगीन है, मैं अब क्या क्या लिखूँ सर से पाँव तक वो हसीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है।

Shivang Tiwari

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नज़्म: मज़दूर कौन है यहाँ हमारा किस के हैं हम ख़जालत है हम को कि मज़दूर हैं हम तपा तपाकर जिस्म अपना आहनों पर पिघलाया हम ने नसों से टपकता था लहू जब मिट्टी के घरौंदे बनाए हम ने लिए बदन पे छाले अब दश्त-ए-ला-मकाँ फिरते हैं हम कौन है यहाँ हमारा किस के हैं हम ख़जालत है हम को कि मज़दूर हैं हम सुब्ह होते ही नमक छिड़कता है सूरज जिन के ज़ख़्मों पे और रात तंज़ करती हो मुफ़्लिसी पे जिन की आसमाँ की थाली में एक रोटी समझे बच्चे तकते रहते हों चाँद को ऐसे बद-क़िस्मत बच्चों के माँ-बाप हैं हम कौन है यहाँ हमारा किस के हैं हम ख़जालत है हम को कि मज़दूर हैं हम

Sagar Agrawal

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नंद के लाल यशोदा के दुलारे मोहन हम तिरी याद में बेताब हैं सारे मोहन रोते रोते हुई भगतों की तिरे उम्र बसर किस मुसीबत में शब-ओ-रोज़ गुज़ारे मोहन नाम-लेवा तिरे दुनिया से मिटे जाते हैं जाँ-ब-लब हैं तिरी आँखों के सितारे मोहन जिस को करता था कलेजे से घड़ी भर न जुदा छोड़ रखा है उसे किस के सहारे मोहन फिर वही साँवली छब आए नज़र भगतों को नंद की गोद में जमुना के किनारे मोहन नंद बाबा की कुटी हो गई सूनी तुझ बिन फीके मथुरा के हुए सारे नज़ारे मोहन दर्द-मंदों को कलेजे से लगाने वाले 'आफ़्ताब' आज मुसीबत में पुकारे मोहन

Aaftab Rais Panipati

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सरफ़रोशान-ए-वतन का ये ख़याल अच्छा है हिन्द के वास्ते मरने का मआल अच्छा है जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन हो न अगर दिल में निहाँ ऐसे जीने से तो मरने का ख़याल अच्छा है ज़र्रा-ए-ख़ाक-ए-वतन मेहर-ए-दरख़्शाँ है मुझे वो समझते रहें इंग्लैण्ड का माल अच्छा है जाँ-ब-लब है सितम-ईजाद के हाथों से वतन कौन कहता है मिरे हिन्द का हाल अच्छा है उन को पैरिस के नज़ारों पे फ़िदा होने दो मुझ को भारत के लिए रंज-ओ-मलाल अच्छा है करने देता नहीं जल्लाद ज़बाँ से उफ़ तक दिल में कहता है ग़रीबों का सवाल अच्छा है लाजपत-राय की शमशान से आती है सदा मुल्क की राह में मिटने का ख़याल अच्छा है अपने मतलब के लिए मुल्क का दुश्मन जो बने ऐसे कम्बख़्त का दुनिया में ज़वाल अच्छा है ज़र के थालों में मटन चाप उड़ाने दो उन्हें हम ग़रीबों को मगर जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है 'आफ़्ताब' आज फँसा जाता है फिर ताइर-ए-दिल हाए अफ़्सोस कि सय्याद का जाल अच्छा है

Aaftab Rais Panipati

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गो ख़ाक हो चुका है हिन्दोस्ताँ हमारा फिर भी है कुल जहाँ में पल्ला गराँ हमारा मुँह तक रहा है अब तक सारा जहाँ हमारा है नाम किशवरों में विर्द-ए-ज़बाँ हमारा ज़रख़ेज़ है सरासर ये गुलिस्ताँ हमारा है ताइर-ए-तिलाई हिन्दोस्ताँ हमारा भारत में देखते थे हम सनअतें जहाँ की मशहूर थी जहाँ में कारीगरी यहाँ की वो बात हिन्दियों ने ग़ैरों के दरमियाँ की जिस पर झुकी है गर्दन अम्बोह-ए-सरकशाँ की मिलता था इल्म-ओ-फ़न में हम-सर कहाँ हमारा है ताइर-ए-तलाई हिन्दोस्ताँ हमारा तस्लीम कर रहे हैं एस्पेन और जापाँ सब मानते हैं लोहा जर्मन फ़्रांस-ओ-यूनाँ अमरीका में है चर्चा इस मुल्क का नुमायाँ भारत की सल्तनत पर बर्तानिया है नाज़ाँ ऊँचा है आसमाँ से ये आस्ताँ हमारा है ताइर-ए-तलाई हिन्दोस्ताँ हमारा पर्बत की चोटियाँ हैं दरबाँ हमारे दर की दामन में जिस के पिन्हाँ कानें हैं सीम-ओ-ज़र की गंग-ओ-जमन पे जिस दम सय्याद ने नज़र की सरसब्ज़ वादियों से इस की नज़र न सर की क्या ग़ैरत-ए-इरम है ये बोस्ताँ हमारा है ताइर-ए-तिलाई हिन्दोस्ताँ हमारा पैदा किए थे जिस ने अर्जुन कनाद गौतम आग़ोश में पले थे जिस की ब्यास-ओ-बिक्रम गोदी में जिस की खेले थे भीम राम भीषम जिन के सबब से अब तक है हिन्दियों में दम-ख़म वो मुल्क-ए-बे-बदल है जन्नत-निशाँ हमारा है ताइर-ए-तिलाई हिन्दोस्ताँ हमारा

Aaftab Rais Panipati

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क्यूँ तअम्मुल है तुझे रोज़-ए-अजल आने में ज़ीस्त का लुत्फ़ मिलेगा मुझे मर जाने में न सुनो क़िस्सा-ए-आलाम तड़प जाओगे दर्द और सोज़ भरा है मिरे अफ़्साने में क़ल्ब-ए-मुज़्तर को बना रखा है घर हिरमाँ ने और क्या चीज़ है इस दिल के सियह-ख़ाने में अब छलकने को है साक़ी मिरे जीवन का गिलास भर गया आब-ए-फ़ना उम्र के पैमाने में ख़िर्मन-ए-सब्र-ओ-सुकूँ ख़ाक न हो क्यूँ जल कर बिजलियाँ कौंद रही हैं मिरे काशाने में पर्दा-ए-जहल उठा दीजिए आँखों से ज़रा जल्वा-ए-हक़ नज़र आएगा सनम-ख़ाने में 'आफ़्ताब' आ कि मुसीबत के हैं आसार अयाँ जोश-ए-वहशत है फ़ुज़ूँ और भी दीवाने में

Aaftab Rais Panipati

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राम के हिज्र में इक रोज़ भरत ने ये कहा क़ल्ब-ए-मुज़्तर को शब-ओ-रोज़ नहीं चैन ज़रा दिल में अरमाँ है कि आ जाएँ वतन में रघुबिर याद में उन की कलेजे में चुभे हैं नश्तर कोई भाई से कहे ज़ख़्म-ए-जिगर भर दें मिरा ख़ाना-ए-दिल को ज़ियारत से मुनव्वर कर दें राम आएँ तो दिए घी के जलाऊँ घर घर दीप-माला का समाँ आज दिखाऊँ घर घर तेग़-ए-फ़ुर्क़त से जिगर पाश हुआ जाता है दिल ग़म-ए-रंज से पामाल हुआ जाता है दाग़ हैं मेरे जले दिल पे हज़ारों लाखों ग़म के नश्तर जो चले दिल पे हज़ारों लाखों कह रहे थे ये भरत जबकि सिरी-राम आए धूम दुनिया में मची नूर के बादल छाए अर्श तक फ़र्श से जय जय की सदा जाती थी ख़ुर्रमी अश्क हर इक आँख से बरसाती थी जल्वा-ए-रुख़ से हुआ राम के आलम रौशन पुर उमीदों के गुलों से हुआ सब का दामन मोहनी शक्ल जो रघुबिर की नज़र आती थी आँख ताज़ीम से ख़िल्क़त की झुकी जाती थी मुद्दतों बा'द भरत ने ये नज़ारा देखा कामयाबी के फ़लक पर था सितारा चमका दिल ख़ुशी से कभी पहलू में उछल पड़ता था हो मुबारक ये कभी मुँह से निकल पड़ता था होते रौशन हैं चराग़ आज जहाँ में यकसाँ गुल हुआ आज ही पर एक चराग़-ए-ताबाँ है मुराद उस से वो भारत का चराग़-ए-रौशन नाम है जिस का दयानंद जो था फ़ख़्र-ए-वतन जिस दयानंद ने भारत की पलट दी क़िस्मत जिस दयानंद ने दुनिया की बदल दी हालत जिस दयानंद ने गुलज़ार बनाए जंगल जिस दयानंद ने क़ौमों में मचा दी हलचल आज वो हिन्द का अफ़्सोस दुलारा न रहा ग़म-नसीबों के लिए कोई सहारा न रहा याद है उस की ज़माने में हर इक सू जारी उस की फ़ुर्क़त की लगी तेग़ जिगर पर कारी दिल ये कहता है कि इस वक़्त ज़बानें खोलें आओ मिल मिल के दयानंद की हम जय बोलें

Aaftab Rais Panipati

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