nazmKuch Alfaaz

गो ख़ाक हो चुका है हिन्दोस्ताँ हमारा फिर भी है कुल जहाँ में पल्ला गराँ हमारा मुँह तक रहा है अब तक सारा जहाँ हमारा है नाम किशवरों में विर्द-ए-ज़बाँ हमारा ज़रख़ेज़ है सरासर ये गुलिस्ताँ हमारा है ताइर-ए-तिलाई हिन्दोस्ताँ हमारा भारत में देखते थे हम सनअतें जहाँ की मशहूर थी जहाँ में कारीगरी यहाँ की वो बात हिन्दियों ने ग़ैरों के दरमियाँ की जिस पर झुकी है गर्दन अम्बोह-ए-सरकशाँ की मिलता था इल्म-ओ-फ़न में हम-सर कहाँ हमारा है ताइर-ए-तलाई हिन्दोस्ताँ हमारा तस्लीम कर रहे हैं एस्पेन और जापाँ सब मानते हैं लोहा जर्मन फ़्रांस-ओ-यूनाँ अमरीका में है चर्चा इस मुल्क का नुमायाँ भारत की सल्तनत पर बर्तानिया है नाज़ाँ ऊँचा है आसमाँ से ये आस्ताँ हमारा है ताइर-ए-तलाई हिन्दोस्ताँ हमारा पर्बत की चोटियाँ हैं दरबाँ हमारे दर की दामन में जिस के पिन्हाँ कानें हैं सीम-ओ-ज़र की गंग-ओ-जमन पे जिस दम सय्याद ने नज़र की सरसब्ज़ वादियों से इस की नज़र न सर की क्या ग़ैरत-ए-इरम है ये बोस्ताँ हमारा है ताइर-ए-तिलाई हिन्दोस्ताँ हमारा पैदा किए थे जिस ने अर्जुन कनाद गौतम आग़ोश में पले थे जिस की ब्यास-ओ-बिक्रम गोदी में जिस की खेले थे भीम राम भीषम जिन के सबब से अब तक है हिन्दियों में दम-ख़म वो मुल्क-ए-बे-बदल है जन्नत-निशाँ हमारा है ताइर-ए-तिलाई हिन्दोस्ताँ हमारा

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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आमद है साल-ए-नौ की समाँ है बहार का सरसब्ज़ गुलिस्ताँ है दिल-ए-दाग़-दार का इश्क़-ए-वतन में आशिक़-ए-सादिक़ है जाँ-ब-लब क्या हाल पूछते हो ग़रीब-उद-दयार का यारब कहेंगे किस तरह हम बेकसों के दिन याद आया है क़फ़स में ज़माना बहार का यूँँ अश्क-ए-ग़म टपकते हैं आँखों से क़ौम की मुमकिन नहीं है टूटना अश्कों के तार का इक बार क़त्ल-ए-आम करो तेग़-ए-ज़ुल्म से अच्छा नहीं है जौर-ओ-सितम बार बार का ऐ मादर-ए-वतन के सपूतो बढ़े चलो ये आज हो रहा है इशारा बहार का क़ातिल को नाज़ क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है अगर मज़लूम को भरोसा है परवरदिगार का ऐ मादर-ए-वतन ज़रा दस्त-ए-दुआ' उठा मक़्तल में इम्तिहाँ है तिरे ग़म-गुसार का गिरगिट की तरह रंग बदलता है दम-ब-दम क्या ए'तिबार ग़ैर के क़ौल-ओ-क़रार का अग़्यार से करम की तवक़्क़ो फ़ुज़ूल है अर्सा गुज़र चुका है बहुत इंतिज़ार का ऐ 'आफ़्ताब' दहर का शिकवा है क्यूँ तुझे होता नहीं है कोई दिल-ए-बे-क़रार का

Aaftab Rais Panipati

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नंद के लाल यशोदा के दुलारे मोहन हम तिरी याद में बेताब हैं सारे मोहन रोते रोते हुई भगतों की तिरे उम्र बसर किस मुसीबत में शब-ओ-रोज़ गुज़ारे मोहन नाम-लेवा तिरे दुनिया से मिटे जाते हैं जाँ-ब-लब हैं तिरी आँखों के सितारे मोहन जिस को करता था कलेजे से घड़ी भर न जुदा छोड़ रखा है उसे किस के सहारे मोहन फिर वही साँवली छब आए नज़र भगतों को नंद की गोद में जमुना के किनारे मोहन नंद बाबा की कुटी हो गई सूनी तुझ बिन फीके मथुरा के हुए सारे नज़ारे मोहन दर्द-मंदों को कलेजे से लगाने वाले 'आफ़्ताब' आज मुसीबत में पुकारे मोहन

Aaftab Rais Panipati

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सरफ़रोशान-ए-वतन का ये ख़याल अच्छा है हिन्द के वास्ते मरने का मआल अच्छा है जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन हो न अगर दिल में निहाँ ऐसे जीने से तो मरने का ख़याल अच्छा है ज़र्रा-ए-ख़ाक-ए-वतन मेहर-ए-दरख़्शाँ है मुझे वो समझते रहें इंग्लैण्ड का माल अच्छा है जाँ-ब-लब है सितम-ईजाद के हाथों से वतन कौन कहता है मिरे हिन्द का हाल अच्छा है उन को पैरिस के नज़ारों पे फ़िदा होने दो मुझ को भारत के लिए रंज-ओ-मलाल अच्छा है करने देता नहीं जल्लाद ज़बाँ से उफ़ तक दिल में कहता है ग़रीबों का सवाल अच्छा है लाजपत-राय की शमशान से आती है सदा मुल्क की राह में मिटने का ख़याल अच्छा है अपने मतलब के लिए मुल्क का दुश्मन जो बने ऐसे कम्बख़्त का दुनिया में ज़वाल अच्छा है ज़र के थालों में मटन चाप उड़ाने दो उन्हें हम ग़रीबों को मगर जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है 'आफ़्ताब' आज फँसा जाता है फिर ताइर-ए-दिल हाए अफ़्सोस कि सय्याद का जाल अच्छा है

Aaftab Rais Panipati

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"श्याम की याद" नंद के लाल यशोदा के दुलारे मोहन हम तिरी याद में बेताब हैं सारे मोहन रोते रोते हुई भगतों की तिरे उम्र बसर किस मुसीबत में शब-ओ-रोज़ गुज़ारे मोहन नाम-लेवा तिरे दुनिया से मिटे जाते हैं जाँ-ब-लब हैं तिरी आँखों के सितारे मोहन जिस को करता था कलेजे से घड़ी भर न जुदा छोड़ रखा है उसे किस के सहारे मोहन फिर वही साँवली छब आए नज़र भगतों को नंद की गोद में जमुना के किनारे मोहन नंद बाबा की कुटी हो गई सूनी तुझ बिन फीके मथुरा के हुए सारे नज़ारे मोहन दर्द-मंदों को कलेजे से लगाने वाले 'आफ़्ताब' आज मुसीबत में पुकारे मोहन

Aaftab Rais Panipati

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क्यूँ तअम्मुल है तुझे रोज़-ए-अजल आने में ज़ीस्त का लुत्फ़ मिलेगा मुझे मर जाने में न सुनो क़िस्सा-ए-आलाम तड़प जाओगे दर्द और सोज़ भरा है मिरे अफ़्साने में क़ल्ब-ए-मुज़्तर को बना रखा है घर हिरमाँ ने और क्या चीज़ है इस दिल के सियह-ख़ाने में अब छलकने को है साक़ी मिरे जीवन का गिलास भर गया आब-ए-फ़ना उम्र के पैमाने में ख़िर्मन-ए-सब्र-ओ-सुकूँ ख़ाक न हो क्यूँ जल कर बिजलियाँ कौंद रही हैं मिरे काशाने में पर्दा-ए-जहल उठा दीजिए आँखों से ज़रा जल्वा-ए-हक़ नज़र आएगा सनम-ख़ाने में 'आफ़्ताब' आ कि मुसीबत के हैं आसार अयाँ जोश-ए-वहशत है फ़ुज़ूँ और भी दीवाने में

Aaftab Rais Panipati

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