"भरोसा" जहाँ में अब किसी का भी नहीं यूँँ साथ होता है अकेले लोग मर जाते हैं यादों में खो कर रौनक हमें मुहब्बत थी हाँ हाँ थी सब मुकर गए अब क्या चला चल ज़िन्दगी के साथ खो कर बस अकेले अब न कर तू अब भरोसा इस जहाँ भर से मेरे रौनक
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"दिखावा अब नहीं करना" किसी अंजान पे ये जज़्बें ज़ाया' अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना कभी पागल नहीं होना कभी दिल भी नहीं देना कभी हँसते ही रहना है कभी मर मर के जीना है कभी इज़हार मत करना कभी तुम साथ मत रहना कभी मिलना अगर ख़ुद से तो तुम सेे बात कहनी है किसी को दिल नहीं देना अकेला अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना कभी जो छोड़ दे कोई बहुत तकलीफ़ होती है उसी की याद में ये आँख सारी रात रोती है ज़रा ख़ुद को निखारो अब बनाओ नाम अब अपना कभी मिलना अगर ख़ुद से तो तुम सेे बात कहनी है सताए तुम को कोई ख़ुद को आधा अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना हमारे पास तो घर भी नहीं है यार रहने को कोई पूछे हमारे पास क्या ही होगा कहने को कभी हम रो नहीं सकते कभी कुछ कह नहीं सकते कभी मिलना अगर ख़ुद से तो तुम सेे बात कहनी है अकेले घुट के मरने का इरादा अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना किसी से कोई झूठा सच्चा वा'दा अब नहीं करना किसी को जान या अपना पराया अब नहीं करना किसी अंजान पे ये जज़्बें ज़ाया' अब नहीं करना मुहब्बत दिल में रखनी है दिखावा अब नहीं करना
Raunak Karn
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नज़्म- क्या लिखूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को शाम, तुम को रात, तुम को चाँद, तुम को राह, तुम को चाह, तुम को शाह, तुम को बाह, तुम को नाह, बोलो मैं लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें जीवन लिखूँ अपना या फिर लोबान मैं लिख दूँ लिखूँ महफ़िल तुम्हें अपना या फिर सुनसान मैं लिख दूँ लिखूँ दिलबर तुम्हें अपना या फिर मेहमान मैं लिख दूँ लिखूँ आँसू तुम्हें अपना या फिर मुस्कान मैं लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को तुम्हें नादान, या अंजान या साथी, या लिख दूँ राह का रहबर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर मैं तुम को धूप सूरज सा या शामों सा सुकूँ लिख दूँ लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मैं अपना दिल मैं अपनी जान या धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को क़लम लिख दूँ किताबें भी लिखूँ तुम को नयन की मैं चमक या फूल की धड़कन लिखूँ तुम को लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को लिखूँ तुम को मैं ठंडी रात का चादर या लिख दूँ नींद का बिस्तर, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर तुम्हें झुमका, तुम्हें आँचल, तुम्हें धड़कन तुम्हें चाँदी, तुम्हें सोना, तुम्हें हीरा तुम्हें पायल, तुम्हें कोमल, तुम्हें मूरत तुम्हें पीतल, तुम्हें जल थल, बता भी दो लिखूँ तो क्या लिखूँ तुम को मेरे दिलबर
Raunak Karn
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"दिलबर" तुम पास अब आ जाओ, दिल में मिरे आ जाओ छोड़ो न बात ये सब, तुम बस मुझे सताओ कुछ बात मैं बताऊँ, कुछ बात तुम बताओ अब तो कहो न कुछ तुम, यूँँ दूर अब न जाओ आँखों में तुम आ जाओ, साँसों में तुम आ जाओ दिलबर मिरे आ जाओ, दिलबर मिरे आ जाओ
Raunak Karn
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लाख तकलीफ़ें लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना सर्द रातों में कभी जो ख़्वाब टूटे ज़िंदगी गर जो कभी भी तुम सेे रूठे याद रखना आस का दामन न छूटे तोड़ देना पिंजरा तुम चाहे सपन का हौसला ख़ुद का ही ख़ुद से तुम बढ़ाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना पीठ पीछे कर के देखो तुम न चलना वक़्त के जैसे कभी भी तुम न ढलना कोशिशों के साथ जीना कर न मलना राग गाना तुम ख़ुशी के तब मिलन का बारिशों के बूंदों से ख़ुद को भिगाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना क़ाफ़िला होगा तिरे पीछे चलेंगे वक़्त ले कर के सभी तुझ सेे मिलेंगे दर्द सारे घाव सब के सब भरेंगे साथ ये मत छोड़ना तुम बस जतन का दिल के रिश्ते को ज़रा दिल से निभाना नाम ऊँचा ख़ूब ऊँचा तुम बनाना रूठे लोगों को कभी दिल से मनाना लाख तकलीफ़ें हों फिर भी मुस्कुराना सीख लो हम सेे ज़रा सा गुनगुनाना
Raunak Karn
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"यादों के सहारे" वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे चाहे आँसू आँखों के दोनों किनारे काट लेंगे अपनी अपनी बात है होगा कहीं वो भी अकेले याद करता हो कहीं यूँँ ही अकेली रातों में भी पर ये मेरा ही भरम है वो बहुत ख़ुश हो कहीं पे और हो तो बात अच्छी है कि सबकी ज़िंदगी है अपना क्या है यार तन्हाई बहारें काट लेंगे ख़ूब-सूरत होश वाले सब इशारे काट लेंगे होंठों पे मुस्कान ले के सब शरारे काट लेंगे वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे वो न होगी उस की यादों के सहारे काट लेंगे
Raunak Karn
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